संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में एक बार फिर अमेरिका और क्यूबा के बीच कड़ा कूटनीतिक टकराव देखने को मिला है। ट्रंप प्रशासन ने हवाना पर लगे दशकों पुराने अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों की निंदा करने वाले वार्षिक प्रस्ताव के खिलाफ माहौल बनाने के लिए अपनी कोशिशें तेज कर दी हैं। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत माइक वाल्ट्ज ने सदस्य देशों को आगामी सप्ताह में पेश होने वाले इस प्रस्ताव का विरोध करने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया। दूसरी ओर, क्यूबा के राजनयिकों ने इसे पूरी तरह से ध्यान भटकाने वाला नाटक बताते हुए वाशिंगटन की आर्थिक नाकाबंदी को सामूहिक सजा करार दिया है।
माइक वाल्ट्ज का क्यूबा लिब्रे पैनल और मानवाधिकारों पर बहस
संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में माइक वाल्ट्ज ने असंतुष्टों और पूर्व बंदियों के साथ क्यूबा लिब्रे शीर्षक से एक चर्चा सत्र का आयोजन किया। इस सत्र के दौरान कुछ स्पष्ट वीडियो फुटेज दिखाए गए, जिनमें क्यूबा में लोगों को हिरासत में लेते हुए दर्शाया गया था। मंच पर आए वक्ताओं ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि सरकार की आलोचना करने पर उन्हें गंभीर यातनाओं और लंबे समय तक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। हालांकि हवाना प्रशासन राजनीतिक कैदियों को रखने की बात से लगातार इनकार करता रहा है, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि राजनीतिक कारणों से हजारों लोग जेलों में बंद हैं।
कार्यक्रम के दौरान माइक वाल्ट्ज ने कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि यह वही दमन है जिसे हवाना दुनिया से छिपाना चाहता है। उन्होंने विभिन्न सरकारों से आग्रह किया कि वे मतदान से पहले सात दशकों के दुष्प्रचार से परे जाकर सच्चाई को देखें। वाल्ट्ज ने सभी देशों से आने वाले सप्ताह के लिए प्रस्तावित मसौदे को खारिज करने की अपील की। ट्रंप प्रशासन ने लगातार दूसरे साल इस प्रस्ताव के विरोध में समर्थन जुटाने के लिए इस तरह का जोरदार अभियान चलाया है।
क्यूबा का पलटवार और कूटनीतिक विरोध
अमेरिकी राजदूत के कार्यक्रम के ठीक पास संयुक्त राष्ट्र में क्यूबा के राजदूत अर्नेस्टो सोबेरोन गुजमान ने अपने राजनयिकों और समर्थकों को एकत्र कर इस पैनल का कड़ा विरोध किया। गुजमान ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह तमाशा एक सीधी सच्चाई से ध्यान भटकाने का प्रयास है कि अमेरिका एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी की तरह काम कर रहा है और क्यूबा की जनता पर सामूहिक सजा थोप रहा है। गुजमान ने अमेरिकी कार्यक्रम को क्यूबा को निशाना बनाने वाला एक दिखावा करार दिया और आर्थिक पाबंदियों की निंदा की।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में मतदान का इतिहास और मौजूदा समीकरण
संयुक्त राष्ट्र महासभा पिछले चौंतीस वर्षों से लगातार हर साल इस आर्थिक नाकाबंदी के खिलाफ प्रस्ताव पर विचार करती रही है। हर बार एक सौ तिरानवे सदस्य देशों के बीच इस मसौदे को बहुत व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ है। पिछले वर्ष हुए मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में एक सौ पैंसठ वोट पड़े थे, जबकि केवल सात देशों ने इसका विरोध किया था और बारह देश मतदान से अनुपस्थित रहे थे। उस मतदान में अर्जेंटीना, यूक्रेन और हंगरी ने पहली बार इस प्रस्ताव का विरोध दर्ज कराया था।
हालांकि संयुक्त राष्ट्र महासभा के ये प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते हैं, लेकिन वे क्यूबा के प्रति अमेरिकी नीति पर वैश्विक राय का स्पष्ट संकेत देते हैं। यह प्रतिबंध पहली बार वर्ष 1960 में फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में हुई क्रांति के बाद शुरू हुआ था। उस क्रांति ने तानाशाह फुलगेंसियो बतिस्ता की सत्ता को उखाड़ फेंका था और उसके बाद हुए राष्ट्रीयकरण से अमेरिकी नागरिकों तथा कंपनियों पर सीधा असर पड़ा था।
ऊर्जा संकट, विरोध प्रदर्शन और बड़े पैमाने पर प्रवासन
आलोचकों का तर्क है कि वाशिंगटन का यह मौजूदा कूटनीतिक अभियान क्यूबा की राजनीतिक व्यवस्था पर दबाव बनाने के एक व्यापक प्रयास से जुड़ा हुआ है। इस नीति के तहत द्वीप तक पहुंचने वाले ईंधन को रोकने के कड़े कदम शामिल हैं। इसके चलते होने वाली ईंधन की किल्लत बड़े बिजली संकट का कारण बनी है, जिससे भोजन पकाने, पानी की आपूर्ति के साथ-साथ इंटरनेट और टेलीफोन सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।
दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों में वर्ष 2015 में बड़ा बदलाव देखा गया था, जब राउल कास्त्रो और बराक ओबामा ने औपचारिक संबंध बहाल किए थे। इसके बाद वर्ष 2016 में अमेरिका ने पहली बार संयुक्त राष्ट्र में इस प्रतिबंध विरोधी प्रस्ताव पर मतदान से परहेज किया था। हालांकि वर्ष 2020 के बाद से क्यूबा गंभीर आर्थिक और ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है। लगातार ब्लैकआउट, खाद्य पदार्थों की कमी और भीषण महंगाई के बीच देश की जीडीपी में गिरावट आई है। इस संकट ने द्वीप पर बार-बार विरोध प्रदर्शनों और बड़े पैमाने पर पलायन को जन्म दिया है, जिसके तहत लाखों की संख्या में क्यूबाई नागरिक देश छोड़कर जा चुके हैं और कई अमेरिका पहुंचे हैं। इसी पृष्ठभूमि के बीच संयुक्त राष्ट्र एक बार फिर वार्षिक मतदान की तैयारी कर रहा है, जहां दोनों देश अपने सहयोगियों और विरोधियों पर दबाव बना रहे हैं।



















