भारत सरकार ने अपने सरकारी बॉन्ड बाजार के दरवाजे विदेशी निवेशकों के लिए और चौड़े करने का ऐलान किया है। मकसद साफ है, देश के कर्ज बाजार यानी डेट मार्केट को गहरा बनाना और दुनिया भर की पूंजी को भारत की ओर खींचना। इन कदमों से बुनियादी ढांचे और जलवायु से जुड़ी परियोजनाओं जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के लिए ज्यादा स्थिर फंडिंग का रास्ता खुलेगा। भले ही ये बदलाव सीधे तौर पर बॉन्ड से जुड़े हैं, लेकिन इनका असर पूरे वित्तीय बाजार पर पड़ना तय माना जा रहा है।
सबसे बड़ा बदलाव टैक्स से जुड़ा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) को अब सरकारी प्रतिभूतियों से मिलने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन) पर टैक्स से छूट दी गई है। यह राहत 1 अप्रैल 2026 से लागू होगी। इसके साथ ही सरकार ने फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) का दायरा भी बढ़ा दिया है, ताकि ज्यादा से ज्यादा विदेशी निवेशक इसमें हिस्सा ले सकें।
FAR का दायरा और भी बड़ा
अब FAR के तहत 15 साल, 30 साल और 40 साल की नई सरकारी प्रतिभूतियां भी शामिल कर ली गई हैं। इतना ही नहीं, FAR के तहत आने वाली अवधि में जारी होने वाले सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स (SGrBs) को भी इसमें जगह दी गई है। निवेश को आसान बनाने के लिए सरकार ने कई पुरानी अड़चनें हटा दी हैं। विदेशी निवेशकों के लिए शॉर्ट टर्म निवेश की सीमा खत्म कर दी गई है, साथ ही कंसंट्रेशन लिमिट और हर सिक्योरिटी पर लगी अलग-अलग निवेश सीमा को भी समाप्त कर दिया गया है।
बॉन्ड और शेयर बाजार का आपसी रिश्ता
डेट और इक्विटी बाजार आपस में ब्याज दरों और जोखिम की कीमत तय करने के जरिए जुड़े रहते हैं। जब सरकारी बॉन्ड में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ता है, तो इससे देश की समग्र आर्थिक स्थिरता को सहारा मिलता है। निवेशकों का आधार जितना चौड़ा होगा, अस्थिर और अल्पकालिक पूंजी पर निर्भरता उतनी ही घटेगी। अगर सरकारी बॉन्ड बाजार तरल यानी लिक्विड और स्थिर दिखे, तो सरकार की उधारी की लागत घट सकती है। इसका फायदा अक्सर पूरी अर्थव्यवस्था में ब्याज दरें नीचे आने के रूप में दिखता है।
सस्ती उधारी का सिलसिला धीरे-धीरे कंपनियों की फंडिंग लागत को भी हल्का कर सकता है। कम ब्याज दरें आमतौर पर कंपनियों की कमाई की उम्मीदों और शेयरों के मूल्यांकन दोनों के लिए अच्छी मानी जाती हैं। ये सुधार भारत की उस बड़ी योजना से भी मेल खाते हैं, जिसके तहत देश को वैश्विक बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होना है। इंडेक्स में जगह मिलने से भारत पर रिसर्च और विश्लेषण का ध्यान बढ़ता है और स्थानीय डेट के साथ-साथ इक्विटी में भी कुल निवेश आवंटन ऊपर जा सकता है।
ग्लोबल फंड मैनेजरों की नजर भारत पर
दुनिया की कई बड़ी संस्थाओं को ट्रैक किए जाने वाले बाजारों में सरकारी कर्ज अनिवार्य रूप से रखना होता है। जब उनका डेट एक्सपोजर बढ़ता है, तो अक्सर उनके पोर्टफोलियो स्थानीय शेयरों तक भी फैल जाते हैं। सरकार का यह रुख भारत को ग्लोबल एसेट मैनेजरों के लिए ऐसा बाजार बना देता है जिसे अनदेखा करना मुश्किल है। जैसे-जैसे भारत का गहराई से विश्लेषण होगा, बेहतर गुणवत्ता वाले भारतीय शेयरों को ज्यादा तवज्जो और ज्यादा पूंजी मिलती जाएगी।
आम निवेशक पर क्या असर
हो सकता है कि छोटे और खुदरा निवेशक बड़ी मात्रा में सीधे सरकारी बॉन्ड न खरीदें। फिर भी इनका असर उन तक कम उतार-चढ़ाव और ज्यादा स्थिर बाजार व्यवहार के रूप में पहुंच सकता है। जब बाजार में ज्यादा टिकाऊ यानी स्टिकी पूंजी आती है, तो हॉट मनी की वजह से आने वाले झटके कम हो जाते हैं। लंबी अवधि के निवेशकों का बड़ा आधार घबराहट में होने वाली बिकवाली को घटाता है और लंबे समय तक कंपाउंडिंग के लिए एक शांत माहौल बनाता है।
बाजार की गहराई बढ़ने से हर तरह की संपत्ति में कीमतों का निर्धारण भी बेहतर होता है। जब लिक्विडिटी सुधरती है, तो कीमतें असली वैल्यू को ज्यादा सही ढंग से दर्शाती हैं। सरकारी बॉन्ड यील्ड से मिलने वाली साफ जोखिम-रहित दर निवेशकों को यह तय करने में मदद करती है कि पैसा कहां लगाया जाए। कई परिवार पहले से ही म्यूचुअल फंड, बीमा और NPS के जरिए बाजार से जुड़े हुए हैं। ऐसे में मजबूत डेट पोर्टफोलियो इन उत्पादों की गुणवत्ता और रिटर्न दोनों को बेहतर बना सकते हैं।



















