अपने घर के बागीचे या खेत में अमरूद, अनार, नींबू और लीची जैसे फलदार पौधे उगाने की इच्छा रखने वालों के लिए बिना बीज के नए पौधे तैयार करना एक बेहद असरदार तरीका साबित हो सकता है। आमतौर पर बीज से पौधा उगाने में काफी लंबा समय लगता है और इस बात की गारंटी भी नहीं होती कि नए पौधे में मातृ पेड़ जैसे ही मीठे और गुणवत्तापूर्ण फल आएंगे। इस समस्या से निपटने और एक ही पेड़ से कई स्वस्थ पौधे तैयार करने के लिए वानस्पतिक प्रवर्धन की एयर लेयरिंग यानी गूटी विधि का उपयोग किया जाता है। छतरपुर नौगांव कृषि विज्ञान केंद्र में पदस्थ उद्यानिकी वैज्ञानिक डॉ. कमलेश अहिरवार ने इस वैज्ञानिक तकनीक की बारीकियों और इसे आजमाने के सही तरीके पर विस्तार से प्रकाश डाला है।
क्या होती है पौधों की गूटी विधि?
वानस्पतिक विज्ञान के अनुसार, गूटी विधि पौधों में कायिक प्रवर्धन की एक ऐसी तकनीक है जिसमें पेड़ की मुख्य जीवित शाखा पर ही नई जड़ों को विकसित किया जाता है। इस प्रक्रिया के तहत चुनी गई शाखा को पेड़ से अलग किए बिना उसकी छाल पर नमीयुक्त माध्यम बांधा जाता है। जब उस स्थान पर पर्याप्त मात्रा में जड़ें निकल आती हैं, तब शाखा को मातृ पौधे से काटकर अलग कर लिया जाता है और स्वतंत्र पौधे के रूप में जमीन या गमले में रोप दिया जाता है। इस विधि का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यदि आप किसी देसी किस्म के पेड़ से गूटी बांधते हैं तो तैयार पौधा पूरी तरह देसी गुणों वाला होगा, और यदि आप हाइब्रिड किस्म के पौधे का चुनाव करते हैं तो नया पौधा भी हाइब्रिड नस्ल का ही तैयार होगा।
गूटी बांधने के लिए सही शाखा का चयन
गूटी तकनीक की सफलता काफी हद तक सही तने या शाखा के चुनाव पर निर्भर करती है। उद्यानिकी वैज्ञानिक डॉ. कमलेश अहिरवार के अनुसार, नया पौधा तैयार करने के लिए हमेशा स्वस्थ, मजबूत और रोगमुक्त शाखा का चयन किया जाना चाहिए। चुनी गई शाखा की मोटाई एक सामान्य पेन या पेंसिल के आकार के बराबर होनी चाहिए। यदि चुनी गई शाखा बहुत अधिक मोटी होगी या बहुत अधिक पतली और कमजोर होगी, तो उसमें जड़ें निकलने की प्रक्रिया बाधित हो सकती है और पौधा तैयार करने में असफलता का सामना करना पड़ सकता है।
गूटी विधि से नया पौधा तैयार करने के छह मुख्य चरण
पौधों में गूटी बांधकर नया पौधा विकसित करने के लिए छह प्रमुख चरणों का पालन किया जाता है
- पहला चरण: पेड़ से एक स्वस्थ, रोगरहित और पेन या पेंसिल की मोटाई वाली सही शाखा का चयन करें।
- दूसरा चरण: चुनी गई शाखा के बीच वाले हिस्से के चारों तरफ से लगभग 1 इंच की गोलाकार छाल को किसी धारदार औजार से सावधानीपूर्वक छीलकर हटा दें।
- तीसरा चरण: छीलकर खाली किए गए हिस्से पर गीली मिट्टी या अच्छे से सड़ी हुई गोबर की खाद का गाढ़ा लेप अच्छी तरह लगाएं।
- चौथा चरण: लेप लगाए गए स्थान को पॉलीथीन की पन्नी से चारों तरफ से ढके और उसे रस्सी या सुतली से दोनों सिरों पर कसकर बांध दें ताकि अंदर की नमी पूरी तरह सुरक्षित रहे।
- पांचवां चरण: लगभग 1 से 2 महीने यानी कुछ हफ्तों के इंतजार के बाद पॉलीथीन के अंदर से सफेद रंग की धागेनुमा महीन जड़ें बाहर निकलती दिखाई देने लगती हैं।
- छठा चरण: जब जड़ें पूरी तरह विकसित हो जाएं, तब उस शाखा को मुख्य पेड़ से कटाई करके अलग कर लें और किसी नए स्थान पर गमले या जमीन में रोप दें।
गूटी बांधने का सही मौसम और जरूरी सावधानियां
एयर लेयरिंग तकनीक को आजमाने का सबसे सही समय मानसून यानी बारिश का मौसम माना जाता है। डॉ. कमलेश अहिरवार बताते हैं कि बरसात के दिनों में वातावरण में प्राकृतिक रूप से उच्च आर्द्रता मौजूद होती है और बांधी गई मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती है, जो नई जड़ों के तेजी से विकास के लिए बेहद आवश्यक है। इस विधि का प्रयोग मुख्य रूप से अमरूद, अनार, लीची और नींबू जैसे फलदार पौधों पर सफलता पूर्वक किया जा सकता है।
इस प्रक्रिया के दौरान कुछ जरूरी सुरक्षात्मक बातों का ध्यान रखना भी अत्यंत आवश्यक है। गूटी बांधने के लिए जिस मिट्टी का उपयोग किया जा रहा है, वह पूरी तरह से स्वच्छ और रोग रहित होनी चाहिए ताकि छिलके वाले हिस्से में फंगल या बैक्टीरिया का संक्रमण न फैले। इसके अलावा, पौधे की जमीन में भी पर्याप्त नमी का होना जरूरी है। गूटी बांधने और छाल छीलने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सभी औजार बिल्कुल तेज धारदार और जंग रोधी होने चाहिए ताकि पौधे को नुकसान न पहुंचे।



















