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भारत भाग्य विधाता रिव्यू: 26/11 के गुमनाम नायकों की रूह कंपा देने वाली सच्ची दास्तानमूवी रिव्यू
13 जून 2026, 2:27 am (46 दिन पहले)· 3

भारत भाग्य विधाता रिव्यू: 26/11 के गुमनाम नायकों की रूह कंपा देने वाली सच्ची दास्तान

मनोज तपारिया की 'भारत भाग्य विधाता' मुंबई के कामा हॉस्पिटल की निहत्थी नर्सों और स्टाफ की बहादुरी को परदे पर उतारती है, जिसमें कंगना रनौत के करियर की सबसे संजीदा परफॉरमेंस देखने को मिलती है।

बॉलीवुड ने एक से ज्यादा बार 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों की दहशत को परदे पर उतारा है, और अक्सर इन कहानियों का केंद्र आलीशान होटलों के भीतर चली मुठभेड़ें और जान देने वाले बहादुर पुलिसकर्मी रहे हैं। मगर उस खूनी रात के बीच कुछ ऐसे चेहरे भी थे जिनकी हिम्मत कभी सुर्खियां नहीं बनी और जिनके किस्से वक्त की धूल में दब गए। इसी हफ्ते सिनेमाघरों में आई डायरेक्टर मनोज तपारिया की 'भारत भाग्य विधाता' ठीक इसी अनकहे सच को सामने लाती है। कामा हॉस्पिटल की निडर नर्सों और बिना किसी हथियार के डटे रहे स्टाफ के हौसले पर बुनी गई यह फिल्म, बनावटी देशभक्ति के नारों से बिल्कुल अलग, इंसानियत की एक ऐसी कहानी है जो सीधे दिल तक उतरती है और दर्शक की आंखें नम कर देती है।

कहानी क्या है

फिल्म का तानाबाना गीता माधव गांधार (कंगना रनौत) के इर्द-गिर्द बुना गया है, जो एक साधारण मराठी परिवार से ताल्लुक रखने वाली महिला है। गीता मुंबई के कामा हॉस्पिटल में नर्स के तौर पर काम करती है और अपने मरीजों तथा अपने फर्ज के प्रति पूरी तरह समर्पित है। फिल्म का पहला हिस्सा अस्पताल की रोजमर्रा की दिनचर्या को बेहद सादगी और सच्चाई के साथ पेश करता है। वार्डों की भागदौड़, डॉक्टरों का कड़ा पर जरूरी रुख, नर्सों की आपसी छेड़छाड़, उनके निजी जीवन के सुख-दुख और काम के दबाव के बीच होने वाली हल्की नोकझोंक को इतनी बारीकी से दिखाया गया है कि देखने वाला खुद को उसी अस्पताल का हिस्सा महसूस करने लगता है। कहानी तब एक भयावह करवट लेती है जब 26 नवंबर 2008 की रात अजमल कसाब और उसके साथी कामा हॉस्पिटल के परिसर में घुसकर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाने लगते हैं। दूसरा हिस्सा फिल्म की रफ्तार और मिजाज को पूरी तरह पलट देता है। अस्पताल की रोशनी गुल हो जाती है, गलियारे वीरान और डरावने हो जाते हैं और हर कमरा मौत की आहट से थर्रा उठता है। ऐसे दहशत भरे माहौल में गीता और उसके साथी कर्मचारी बिना किसी हथियार के मौत के सौदागरों के सामने दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं और मरीजों की जान बचाने की ठान लेते हैं।

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अभिनय

अदाकारी के लिहाज से यह फिल्म कंगना रनौत के करियर की सबसे उम्दा और सबसे परिपक्व भूमिकाओं में गिनी जाएगी। कंगना गीता को किसी फिल्मी सुपरहीरो में नहीं ढालतीं, बल्कि उसकी इंसानी कमजोरी, भीतर बैठे डर और उस डर पर पार पाने की गजब हिम्मत को बेहद बारीकी से जीती हैं। अपने मरीजों को बचाने की उसकी आंखों में झलकती बेचैनी दर्शक को भावुक कर देती है। कंगना के साथ-साथ फिल्म की सहयोगी कलाकारों ने भी शानदार काम किया है। गिरिजा ओक, स्मिता तांबे, ईशा डे और रसिका अगाशे ने नर्स और सहायक स्टाफ की भूमिकाओं में इतना दम भर दिया है कि कहीं यह एहसास ही नहीं होता कि वे अभिनय कर रही हैं। इन अभिनेत्रियों के बीच परदे पर दिखती केमिस्ट्री और आपसी जुड़ाव इतना स्वाभाविक है कि अस्पताल का पूरा माहौल एकदम असली और भरोसेमंद लगने लगता है।

निर्देशन

डायरेक्टर मनोज तपारिया ने इस नाजुक विषय को संभालने में कमाल की समझदारी दिखाई है। उनकी सबसे बड़ी जीत यह है कि उन्होंने इस तकलीफदेह घटना को सनसनीखेज बनाने या उस पर कमर्शियल सिनेमा का मुलम्मा चढ़ाने की कोशिश तक नहीं की। उन्होंने कहानी को पूरी तरह जमीन से जुड़ा रखा है, जिसके चलते फिल्म कई जगह एक सच्ची डॉक्यूमेंट्री जैसी महसूस होती है। मनोज देशभक्ति जताने के लिए बड़े-बड़े संवादों या नकली हीरोइज्म का सहारा नहीं लेते, बल्कि यह दिखाते हैं कि एक आम इंसान अपना फर्ज निभाने के लिए कहां तक जा सकता है। दूसरे हिस्से में बंद कमरों और अंधेरे गलियारों के बीच वे जो सस्पेंस और तनाव गढ़ते हैं, वह एक निर्देशक के रूप में उनकी काबिलियत को साबित कर देता है।

तकनीकी पक्ष

तकनीकी स्तर पर यह फिल्म काफी मजबूत और असरदार है। सिनेमैटोग्राफर ने अस्पताल के माहौल को, खासकर दूसरे हिस्से में फैले अंधेरे और खौफ को, अपने कैमरे में बड़े सलीके से कैद किया है। क्लोज-अप शॉट्स का बेहतरीन इस्तेमाल हुआ है, जो किरदारों के चेहरे पर पसरे डर और पसीने की एक-एक बूंद को साफ उभारता है, जिससे थिएटर में बैठे दर्शक के भीतर भी वही घबराहट उतर आती है। लाइटिंग और कैमरा एंगल्स ने फिल्म के थ्रिलर और सस्पेंस वाले पहलू को निखारने में बड़ी भूमिका निभाई है।

संगीत

फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर इसकी एक और सबसे बड़ी खूबी है। संगीतकार ने दृश्यों की गंभीरता को भांपते हुए पार्श्व संगीत को न तो ऊंचा रखा है और न ही कानों को चुभने वाला। बिना किसी बेवजह के शोर के, बहुत धीमा और रूहानी बैकग्राउंड स्कोर बहता रहता है, जो दृश्यों में छिपी बेचैनी, दर्द और सस्पेंस को गहराई से उभार देता है। फिल्म में ऐसा कोई फालतू गाना नहीं ठूंसा गया जो कहानी की रवानी को तोड़े, बल्कि संगीत पूरी तरह पटकथा के साथ कदमताल करता चलता है।

कमजोर कड़ियां

एक बेहतरीन और प्रभावशाली फिल्म होने के बावजूद 'भारत भाग्य विधाता' में कुछ छोटी-मोटी खामियां भी दिखती हैं। फिल्म की शुरुआत जरा सुस्त है, जहां अस्पताल के रोजमर्रा के जीवन को दिखाने में कुछ ज्यादा वक्त लगा दिया गया है। कुछ उप-कथाएं ऐसी हैं जिन्हें एडिटिंग की मेज पर थोड़ा कस दिया जाता तो फिल्म जल्दी अपने मुख्य आतंकी हमले वाले ट्रैक पर पहुंच जाती। इसके अलावा, जो दर्शक इस विषय में सिर्फ गोलियों की गूंज, भारी धमाकों और पारंपरिक एक्शन से भरे मसाला सिनेमा की उम्मीद लेकर जाएंगे, उन्हें इसका यथार्थवादी और संजीदा अंदाज थोड़ा अलग लग सकता है।

हमारा फैसला

'भारत भाग्य विधाता' महज एक फिल्म नहीं, बल्कि उन गुमनाम और सच्चे नायकों को भारतीय सिनेमा की ओर से दी गई एक बेहद भावुक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने 26/11 की उस काली रात में इंसानियत के दीये को बुझने नहीं दिया। यह फिल्म याद दिलाती है कि समाज के असली हीरो हमेशा वर्दी या हथियारों के साथ नहीं आते, बल्कि कई बार वे सफेद एप्रन पहनकर, बिना किसी सम्मान की चाह रखे, चुपचाप अपना फर्ज निभाते रहते हैं। मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार।

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