बहराइच में हरी खाद के तौर पर ढेंचा उगाने वाले किसानों की तादाद लगातार बढ़ रही है, क्योंकि यह फसल न सिर्फ मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाती है बल्कि खाद और रसायन पर होने वाला खर्च भी काफी हद तक घटा देती है. दिक्कत सिर्फ यह रहती है कि हर साल बुवाई के मौसम में किसानों को ढेंचा का बीज लेने के लिए बाजार या सरकारी केंद्रों के चक्कर काटने पड़ते हैं, और कई बार समय पर बीज मिल भी नहीं पाता, जिससे बुवाई टलती है और किसान उस सीजन में इस फसल का पूरा फायदा नहीं उठा पाते. इसी परेशानी को दूर करने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र, बहराइच की वैज्ञानिक डॉ. प्रियंका ने किसानों को खेत में ही ढेंचा का बीज तैयार करने की आसान और वैज्ञानिक तकनीक बताई है, ताकि वे हर साल बाजार पर निर्भर हुए बिना अपनी जरूरत का बीज खुद उगा सकें.
मिट्टी की सेहत सुधारने में ढेंचा की भूमिका
डॉ. प्रियंका के मुताबिक अगर किसान अपनी जमीन के एक छोटे हिस्से में सही समय पर वैज्ञानिक तरीके से काम करें, तो वे न सिर्फ अपने खेत के लिए बल्कि बिक्री के लिए भी गुणवत्तापूर्ण ढेंचा बीज तैयार कर सकते हैं. इसके लिए सबसे पहले बुवाई के सही समय और सही जमीन का चुनाव करना जरूरी होता है, क्योंकि गलत समय पर बुवाई करने से बीज की गुणवत्ता और मात्रा दोनों प्रभावित हो सकती है.
बीज उत्पादन के लिए बुवाई का सही समय
बीज उत्पादन के मकसद से ढेंचा की बुवाई जून के दूसरे पखवाड़े से लेकर जुलाई के अंत तक करना सबसे बेहतर माना जाता है. खास बात यह है कि ढेंचा की फसल लगभग हर तरह की मिट्टी में उगाई जा सकती है, इसलिए किसानों को जमीन की गुणवत्ता को लेकर बहुत ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं पड़ती और वे अपने खेत के किसी भी हिस्से में इसे लगा सकते हैं.
बीज दर और बुवाई का सही तरीका
आमतौर पर हरी खाद के लिए ज्यादा मात्रा में बीज की जरूरत पड़ती है, लेकिन अगर मकसद सिर्फ बीज उत्पादन है तो 12 से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या करीब 5-6 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज ही पर्याप्त होता है. बीजों का विकास बेहतर हो, इसके लिए बुवाई हमेशा कतारों में करनी चाहिए, न कि छिड़ककर. कतार से कतार की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर रखनी चाहिए, ताकि हर पौधे को पर्याप्त हवा और धूप मिल सके और पौधों का विकास एक समान हो.
खाद और सिंचाई में बरतें सावधानी
बुवाई के समय खेत में फास्फोरस, यानी डीएपी या सिंगल सुपर फास्फेट की सही मात्रा डालनी चाहिए. इससे फलियों का विकास बेहतर होता है और बीजों में चमक भी आती है. ढेंचा को वैसे तो ज्यादा पानी की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन जिस समय फलियां बन रही हों उस दौरान खेत में नमी बनी रहनी जरूरी है. बारिश के मौसम में खेत में पानी जमा न होने दें, क्योंकि ऐसा होने पर अब तक की पूरी मेहनत बेकार जा सकती है और बीज की फसल खराब हो सकती है.
नाइट्रोजन की बचत से लेकर मिट्टी की सेहत तक फायदा
डॉ. प्रियंका बताती हैं कि ढेंचा की जड़ों में बनने वाली गांठें हवा से नाइट्रोजन खींचकर उसे जमीन में स्थिर कर देती हैं. इसका सीधा फायदा यह होता है कि इसके बाद बोई जाने वाली फसल, यानी धान या गेहूं में यूरिया की खपत 25 से 30 प्रतिशत तक कम हो जाती है. इसके अलावा जब ढेंचा को हरी खाद के तौर पर खेत में पलट दिया जाता है, तो मिट्टी में ह्यूमस की मात्रा बढ़ जाती है. ढेंचा की फसल मिट्टी के पीएच मान को संतुलित करने में भी मदद करती है, जिससे लंबे समय तक जमीन की उपजाऊ क्षमता बनी रहती है.
किसानों को मिलेगा दोहरा फायदा
वैज्ञानिक डॉ. प्रियंका के मुताबिक अगर किसान अपने खेत के एक छोटे हिस्से में ही यह तकनीक अपनाएं, तो उन्हें दो तरह का सीधा फायदा होगा. पहला, उन्हें हर साल समय पर मुफ्त और शुद्ध बीज मिल जाएगा, जिसके लिए बाजार या सरकारी केंद्रों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे. दूसरा, वे बचा हुआ बीज दूसरे किसानों को बेचकर अतिरिक्त कमाई भी कर सकते हैं, यानी यह तकनीक खेती की लागत घटाने के साथ-साथ आमदनी बढ़ाने का भी जरिया बन सकती है.



















