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अदालती मुकदमों के त्वरित और निःशुल्क समाधान के लिए लोक अदालत का रुख करने की पूरी प्रक्रियाहरियाणा
30 अक्तू॰ 2026, 12:02 am (8 दिन पहले)· 1

अदालती मुकदमों के त्वरित और निःशुल्क समाधान के लिए लोक अदालत का रुख करने की पूरी प्रक्रिया

फरीदाबाद के सेक्टर-12 कोर्ट के वकील मोहन तिवारी ने बताया कि समझौते योग्य मामलों को लोक अदालत में ले जाकर बिना किसी शुल्क और समय गंवाए कैसे खत्म किया जा सकता है।

अदालतों में वर्षों से लंबित विवादों से मुक्ति पाने और नियमित पेशियों के झंझट को समाप्त करने के लिए लोक अदालत एक बेहद प्रभावी जरिया साबित हो रही है। सामान्य कानूनी प्रक्रियाओं में अक्सर साधारण झगड़ों को सुलझाने के चक्कर में पक्षों का धन और कीमती समय भारी मात्रा में नष्ट हो जाता है। ऐसे हालात में आपसी बातचीत और सहमति के आधार पर विवादों को हमेशा के लिए समाप्त कराने का विकल्प लोक अदालत प्रदान करती है। फरीदाबाद सेक्टर-12 कोर्ट के अधिवक्ता मोहन तिवारी के अनुसार, इस व्यवस्था की बुनियादी मंशा यही है कि न्यूनतम व्यय और त्वरित गति से विवादों का सौहार्दपूर्ण समाधान निकाला जा सके।

किन मुकदमों का हो सकता है निपटारा

लोक अदालत का मुख्य कार्यक्षेत्र समझौते के योग्य मामलों तक सीमित रहता है, जहां दोनों पक्षों की रजामंदी से विवाद सुलझाए जाते हैं। अधिवक्ता मोहन तिवारी ने स्पष्ट किया कि बैंक ऋण से जुड़े मामले, चेक बाउंस के विवाद, पारिवारिक अनबन तथा मोटर दुर्घटना से संबंधित क्लेम जैसे केस यहां आसानी से सुलझाए जा सकते हैं। इस मंच के माध्यम से विवाद निस्तारित होने पर वादियों को कई वर्षों तक अदालत के चक्कर काटने की मजबूरी से पूरी तरह निजात मिल जाती है। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि लोक अदालत के मंच पर प्रकरण के निपटारे की पूरी प्रक्रिया पूर्णतः निःशुल्क संपन्न होती है।

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गंभीर अपराधों में समझौते की अनुमति नहीं

कानूनी रूप से हर विवाद लोक अदालत में नहीं ले जाया जा सकता। मोहन तिवारी के मुताबिक, गंभीर प्रकृति के आपराधिक मामलों के साथ-साथ ऐसे सभी विवाद जिनमें कानूनी प्रावधानों के तहत सुलह या समझौते की इजाजत नहीं है, उनका निस्तारण लोक अदालत में संभव नहीं है। जो वाद पहले से किसी नियमित अदालत में विचाराधीन हैं, उन्हें लोक अदालत में स्थानांतरित कराने के लिए संबंधित अदालत में एक औपचारिक अर्जी दाखिल करनी होती है। इस स्थानांतरण के लिए दोनों पक्षों की आपसी सहमति होना अनिवार्य शर्त है, जिसके बाद न्यायालय द्वारा विधिवत प्रक्रिया पूरी कर पत्रावली लोक अदालत को भेज दी जाती है।

निर्णय की प्रकृति और अस्वीकृति की स्थिति

लोक अदालत की कार्यवाही की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी भी पक्ष पर फैसले के लिए अनुचित दबाव नहीं डाला जाता। जब दोनों पक्ष अपनी स्वेच्छा से सभी बिंदुओं पर एकमत होते हैं, तभी समझौते पर अंतिम मुहर लगाई जाती है। इस प्रक्रिया के लिए कोई अतिरिक्त फीस देय नहीं होती, हालांकि पहले किए जा चुके कानूनी खर्चों की वापसी मामले की परिस्थितियों और लागू नियमों के अधीन तय होती है। इस मंच से पारित सुलह-समझौते का निर्णय अंतिम माना जाता है और इसके विरुद्ध नियमित अपील का प्रावधान नहीं रहता, इसलिए पक्षों को सभी शर्तों को भलीभांति परखकर ही दस्तखत करने चाहिए। यदि किन्हीं कारणों से पक्षों में आम सहमति नहीं बन पाती, तो प्रकरण पुनः संबंधित नियमित अदालत को लौटा दिया जाता है, जहां साक्ष्यों एवं बहसों के आधार पर पूर्ववत सुनवाई जारी रहती है।

सवाल-जवाब

लोक अदालत में किस प्रकार के मामलों का निपटारा किया जा सकता है?
बैंक लोन, चेक बाउंस, पारिवारिक विवाद और मोटर दुर्घटना से जुड़े समझौते योग्य मामलों का निपटारा यहां हो सकता है।
क्या गंभीर आपराधिक मामलों को लोक अदालत में सुलझाया जा सकता है?
नहीं, गंभीर आपराधिक मामलों और कानूनन गैर-समझौते योग्य विवादों का निस्तारण लोक अदालत में नहीं किया जा सकता।
चल रहे मुकदमे को लोक अदालत में भेजने की क्या प्रक्रिया है?
संबंधित अदालत में दोनों पक्षों की सहमति से आवेदन देकर केस को लोक अदालत में भेजने का अनुरोध किया जा सकता है।
क्या लोक अदालत में विवाद सुलझाने के लिए कोई शुल्क लगता है?
लोक अदालत में मामले के निपटारे के लिए कोई अलग या अतिरिक्त शुल्क नहीं लगता है, यह प्रक्रिया निःशुल्क होती है।
यदि लोक अदालत में दोनों पक्षों के बीच सहमति न बने तो क्या होगा?
सहमति न बनने पर मामला संबंधित अदालत में वापस भेज दिया जाता है, जहां सबूतों और दलीलों के आधार पर नियमित सुनवाई चलती है।
क्या लोक अदालत के फैसले के खिलाफ अपील की जा सकती है?
नहीं, लोक अदालत का समझौता आधारित फैसला अंतिम होता है और उसे सामान्य अपील के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती।
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टिप्पणियाँ 5

Tanvi Desai@tanvi-desai·7 दिन पहले

सेक्टर-12 कोर्ट के वकील मोहन तिवारी ने बढ़िया बात बताई कि लोक अदालत में कोई फीस नहीं लगती।

Ravikash Gupta@ravikash·7 दिन पहले

फरीदाबाद के वकील साहब ने चेक बाउंस और लोन वाले केस लोक अदालत में ले जाने की बहुत बढ़िया बात बताई है, सालों की माथापच्ची से तो सीधा छुटकारा ही मिल जाता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·7 दिन पहले

रवि जी, बिल्कुल सही कहा आपने! बैंक और चेक बाउंस वाले मामलों में तो यह सचमुच अदालतों के चक्कर काटने से बचाने का सबसे बढ़िया रास्ता है।

Rohan Verma@rohan-verma·7 दिन पहले

एक बात समझ नहीं आई — अगर लोक अदालत का फ़ैसला फ़ाइनल होता है और अपील नहीं होती, तो क्या कोई पक्ष बाद में यह दावा कर सकता है कि उस पर दबाव डाला गया था? उस स्थिति में क्या कोई रास्ता बचता है?

Karan Malhotra@karan-malhotra·7 दिन पहले

Rohan, यही असली पेच है — 'स्वेच्छा' साबित करना खुद एक लंबी लड़ाई बन जाती है, और उसके लिए भी वही अदालत चाहिए जिससे बचने गए थे।

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