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आधुनिक युग में भी बरकरार है सिलबट्टे का क्रेज, इस वजह से आज भी लोग करते हैं इस्तेमालराजस्थान
9 सित॰ 2026, 11:18 pm (15 दिन पहले)· 3

आधुनिक युग में भी बरकरार है सिलबट्टे का क्रेज, इस वजह से आज भी लोग करते हैं इस्तेमाल

आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक मिक्सी के दौर में भी पारंपरिक सिलबट्टे की मांग आज बाजारों में बनी हुई है। कारीगरों की मेहनत और इससे तैयार मसालों के अनोखे स्वाद के कारण नई पीढ़ी भी इसे अपना रही है।

तेजी से बदलती जीवनशैली और तकनीकी विकास के इस दौर में घरों का खान-पान और रसोई का सामान भी काफी बदल चुका है। आज के समय में रसोई के ज्यादातर काम हाईटेक और बिजली से चलने वाली मशीनों के जरिए किए जाते हैं, जिसके चलते पुरानी संस्कृति से जुड़ी कई चीजें धीरे-धीरे प्रचलन से बाहर हो चुकी हैं। इसके बावजूद कुछ ऐसी चीजें आज भी अपनी खास पहचान और उपयोगिता बनाए हुए हैं जिन्हें आधुनिक मशीनें चाहकर भी पूरी तरह विस्थापित नहीं कर पाई हैं।

ऐसी ही एक पारंपरिक वस्तु सिलबट्टा है, जो कभी हर घर की रसोई की मुख्य जरूरत हुआ करती थी और आज भी बाजारों में इसकी मजबूत मांग देखने को मिलती है। बाजारों में कारीगर आज भी पत्थर को हथौड़े और टांकी की मदद से तराशकर इस पारंपरिक उपकरण को हाथों से तैयार करते हैं। इन कुशल कारीगरों का मानना है कि अच्छी गुणवत्ता वाले पत्थर से बनाया गया यह साधन लंबे समय तक टिकता है और इसमें तैयार किए जाने वाले मसालों तथा चटनियों का स्वाद आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में तैयार सामग्री से बिल्कुल अलग और बेहतर होता है।

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इस पारंपरिक पत्थर पर लहसुन, अदरक, विभिन्न मसाले और तरह-तरह की चटनियां पीसने का चलन सदियों पुराना है। आधुनिक मिक्सी जहां चीजों को तेजी से पीसती है, वहीं इस विधि में सामग्री की पिसाई धीरे-धीरे होती है, जिससे उसके प्राकृतिक गुण, बनावट और स्वाद में स्पष्ट अंतर महसूस होता है। यही मुख्य कारण है कि आज भी कई लोग खास पकवानों और पारंपरिक चटनियों का असली स्वाद पाने के लिए इसी विधि का उपयोग करना पसंद करते हैं।

विशेष स्वाद के अनुभव के कारण अब नई पीढ़ी के लोगों का झुकाव भी एक बार फिर इस पारंपरिक रसोई उपकरण की तरफ बढ़ने लगा है। विशेष तौर पर ग्रामीण इलाकों के अलावा पारंपरिक भोजन शैली को पसंद करने वाले परिवारों में इसका प्रयोग आज भी बड़े पैमाने पर देखा जा सकता है, जो आधुनिकता के बीच पुरानी संस्कृति की मजबूत पकड़ को दर्शाता है।

आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. ओमप्रकाश भारद्वाज का इस विषय में कहना है कि यह उपकरण प्राकृतिक पत्थर से बनता है और इसमें सामग्री पीसने की प्रक्रिया पूरी तरह पुरानी पद्धति पर आधारित होती है। उनके अनुसार, घरेलू स्तर पर तैयार की जाने वाली इन चीजों में ताजे घटकों के प्रयोग से भोजन की गुणवत्ता और स्वाद में सकारात्मक अंतर आता है। इस तरह पारंपरिक रूप से तैयार ताजा भोजन पाचन तंत्र के लिए भी काफी मुफीद साबित हो सकता है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे किसी प्रकार की बीमारी या पेट संबंधी समस्याओं के इलाज के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

आम लोगों का भी यही मानना है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में समय की बचत के लिए बिजली से चलने वाली मिक्सी का उपयोग अनिवार्य हो गया है, लेकिन जब बात किसी खास स्वाद और प्रामाणिक तरीकों से खाना बनाने की आती है तो सिलबट्टे का विकल्प कोई नहीं ले सकता है। यही कारण है कि एक समय जो सामान घरों से लगभग गायब होता दिख रहा था, वह अब एक बार फिर आधुनिक दौर के रसोई घरों में अपनी जगह बनाता नजर आ रहा है।

सवाल-जवाब

सिलबट्टा किस चीज से तैयार किया जाता है?
सिलबट्टा प्राकृतिक पत्थर को हथौड़े और टांकी की मदद से तराशकर हाथों से तैयार किया जाता है।
इलेक्ट्रॉनिक मिक्सी के मुकाबले सिलबट्टे पर पीसने से क्या अंतर आता है?
मिक्सी के मुकाबले सिलबट्टे पर सामग्री धीरे-धीरे पिसती है, जिससे स्वाद, बनावट और गुणवत्ता में स्पष्ट अंतर महसूस होता है।
सिलबट्टे पर मुख्य रूप से क्या पीसा जाता है?
इस पर मसाले, चटनी, लहसुन, अदरक और अन्य खाद्य सामग्री पारंपरिक रूप से पीसी जाती है।
डॉ. ओमप्रकाश भारद्वाज के अनुसार सिलबट्टे के भोजन का स्वास्थ्य पर क्या असर होता है?
ताजी सामग्री से पारंपरिक तरीके से तैयार भोजन पाचन के लिहाज से बेहतर हो सकता है, लेकिन इसे किसी बीमारी का इलाज नहीं माना जाना चाहिए।
आज के दौर में सिलबट्टा क्यों लोकप्रिय हो रहा है?
विशेष स्वाद और पारंपरिक खान-पान के प्रति बढ़ते रुझान के कारण नई पीढ़ी भी अब इसे फिर से अपनाने लगी है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·15 दिन पहले

यह तकनीकी प्रगति और सांस्कृतिक जड़ों के बीच के संतुलन को दर्शाता है। एशियाभर में वैश्वीकरण के बावजूद पारंपरिक शिल्पकला और खान-पान की पद्धतियों की मांग बढ़ रही है, जो यह साबित करती है कि उपभोक्ता सुविधा के साथ-साथ प्रामाणिकता को भी प्राथमिकता दे रहे हैं। भविष्य में यह प्रवृत्ति स्थानीय कारीगरों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायक हो सकती है।

Ravikash Gupta@ravikash·15 दिन पहले

यह खबर केवल रसोई के एक पुराने बर्तन की वापसी नहीं, बल्कि आधुनिक उपभोक्ता बाजार में 'एंटीक और ऑर्गेनिक' जीवनशैली की बढ़ती व्यावसायिक संभावनाओं को दर्शाती है। जैसे-जैसे स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, पारंपरिक और हस्तनिर्मित (हैंडमेड) उत्पादों की मांग में एक नया आर्थिक रुझान देखने को मिल रहा है। कारीगरों के लिए यह पारंपरिक कौशल अब प्रीमियम सेगमेंट में तब्दील हो रहा है, जो भविष्य में सस्टेनेबल और घरेलू अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम दे सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·15 दिन पहले

रविप्रकाश गुप्ता के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह स्पष्ट है कि यह केवल एक उपभोक्ता पसंद का बदलाव नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक कारीगरों के लिए आर्थिक सशक्तिकरण का एक बड़ा अवसर है। आधुनिक बाज़ार में 'ऑर्गेनिक' और 'हैंडमेड' उत्पादों की यह मांग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ हमारी प्राचीन शिल्पकला को संरक्षित करने में भी अहम भूमिका निभा रही है। नीतिगत स्तर पर यदि इन पारंपरिक उद्योगों को वित्तीय सहायता और डिजिटल विपणन मंचों से जोड़ा जाए, तो यह लघु अर्थव्यवस्था भविष्य में देश के सकल घरेलू उत्पाद और रोजगार सृजन में एक नया और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर सकती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·15 दिन पहले

यद्यपि यह प्रसंग अपराध या न्यायालय से जुड़ा नहीं है, तथापि पारंपरिक कलाओं और कारीगरों के संरक्षण का यह पहलू उपभोक्ता सुरक्षा और सांस्कृतिक विरासत के दायरे में आता है। बाज़ार में हाथ से तराशे जाने वाले उपकरणों की मांग यह दर्शाती है कि मशीनरी के इस दौर में भी श्रम आधारित पारंपरिक आजीविका का अस्तित्व बना हुआ है।

Rohan Verma@rohan-verma·15 दिन पहले

यह रिपोर्ट केवल खान-पान तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के पारंपरिक कारीगरों की आजीविका और कुटीर उद्योगों की धरातलीय स्थिति को भी उजागर करती है। जिस प्रकार ग्रामीण और शहरी इलाकों में हाथ से बने इन उपकरणों की मांग फिर से बढ़ रही है, उससे यह स्पष्ट है कि यदि स्थानीय हस्तशिल्प को उचित मंच मिले, तो पारंपरिक रोजगार के नए अवसर सुरक्षित किए जा सकते हैं। भविष्य में इन कारीगरों के लिए जिला स्तर पर विपणन सहायता और प्रोत्साहन नीतियां इन शिल्पों को जीवित रखने में निर्णायक साबित होंगी।

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