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अलवर के राजीव गांधी अस्पताल में सोनोग्राफी के लिए दो महीने का इंतजार, मरीज परेशानराजस्थान
23 अग॰ 2026, 6:20 pm (33 दिन पहले)· 3

अलवर के राजीव गांधी अस्पताल में सोनोग्राफी के लिए दो महीने का इंतजार, मरीज परेशान

राजस्थान के अलवर स्थित राजीव गांधी सामान्य अस्पताल में सोनोग्राफी जांच के लिए मरीजों को डेढ़ से दो महीने का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है, जिससे प्रसूताओं और ग्रामीण इलाकों से आने वाले लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

राजस्थान के सबसे बड़े जिला अस्पतालों में शुमार अलवर के राजीव गांधी सामान्य अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में है। यहां उपचार के लिए आने वाले मरीजों और खासकर प्रसूताओं को सोनोग्राफी जैसी जरूरी जांच करवाने के लिए डेढ़ से दो महीने तक का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि लंबी तारीख मिलने के बाद भी तय दिन पर जांच होने की कोई गारंटी नहीं होती, जिसके चलते मजबूरन मरीजों को अपनी जेब ढीली कर निजी प्रयोगशालाओं का रुख करना पड़ रहा है।

प्रदेश की बड़ी ओपीडी और भारी दबाव

अलवर का यह सरकारी अस्पताल जयपुर के प्रसिद्ध एसएमएस अस्पताल के बाद प्रदेश की सबसे बड़ी ओपीडी वाले अस्पतालों में गिना जाता है। सामान्य दिनों में यहां हर रोज लगभग 4 से 5 हजार मरीज अपना इलाज कराने के लिए पहुंचते हैं। इस अस्पताल में केवल अलवर जिले के ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग उम्मीद लेकर आते हैं। इतने भारी दबाव और भीड़ के बीच सोनोग्राफी जैसी बुनियादी और बेहद जरूरी जांच के महीनों बाद मिलने वाली तारीख मरीजों की मुसीबत को और अधिक बढ़ा रही है।

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प्रसूताओं और गंभीर रोगियों की बढ़ी मुश्किलें

खास तौर पर गर्भवती महिलाओं के लिए सोनोग्राफी जांच गर्भावस्था के दौरान बेहद अहम होती है ताकि बच्चे और मां के स्वास्थ्य का सही आकलन किया जा सके। इसके अलावा पेट से जुड़ी विभिन्न बीमारियों और अन्य आंतरिक समस्याओं के निदान के लिए भी चिकित्सक तुरंत सोनोग्राफी करवाने की सलाह देते हैं। मरीजों का कहना है कि जब तक सोनोग्राफी की रिपोर्ट सामने नहीं आती, तब तक डॉक्टर आगे का उपचार या दवाएं शुरू करने से बचते हैं। ऐसे में अस्पताल की पर्ची पर एक से दो महीने बाद की तारीख लिख दिए जाने से उनका इलाज बीच में ही अटक जाता है।

निजी सेंटरों पर आर्थिक बोझ और ग्रामीण मरीजों का दर्द

अस्पताल के सोनोग्राफी कक्ष के बाहर तैनात कर्मचारियों द्वारा पर्ची पर लंबी तारीख डालकर लौटा दिए जाने के बाद मरीजों की परेशानियां खत्म नहीं होतीं। तय तारीख पर दोबारा अस्पताल पहुंचने पर भी कई बार बिना जांच कराए ही वापस लौटना पड़ता है। दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से आने वाले लोगों का यह भी आरोप है कि उन्हें अस्पताल के स्टाफ के रूखे और असहयोगी व्यवहार का भी सामना करना पड़ता है। सरकारी चिकित्सालय में समय पर जांच न होने के कारण गरीब और ग्रामीण परिवारों को मजबूरन बाहर के निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों पर जाना पड़ता है। निजी सेंटरों पर इस एक जांच के लिए मरीजों को 1 हजार से 2 हजार रुपए तक चुकाने पड़ते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह अतिरिक्त खर्च एक बहुत बड़ा बोझ बन चुका है।

जनाना अस्पताल का हाल और प्रशासन के सामने चुनौती

राजीव गांधी सामान्य अस्पताल के अलावा महिला एवं शिशु से जुड़े जनाना अस्पताल में भी सोनोग्राफी को लेकर कमोबेश यही हालात बने हुए हैं। यहां प्रसूताओं को अपनी बारी का इंतजार करने के लिए घंटों तक लंबी कतारों में खड़े रहना पड़ता है। इस गंभीर समस्या को लेकर मरीज और उनके परिजन कई बार अस्पताल प्रशासन के समक्ष अपनी शिकायतें दर्ज करा चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद व्यवस्था में कोई स्थायी सुधार देखने को नहीं मिला है। उल्लेखनीय है कि राजीव गांधी सामान्य अस्पताल को करीब तीन साल पहले ही मेडिकल कॉलेज का दर्जा मिल चुका है, लेकिन इसके बावजूद बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का यह हाल है। ऐसे में अस्पताल प्रशासन के समक्ष जांच व्यवस्था को पटरी पर लाने और मरीजों को समय पर राहत देने की एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

सवाल-जवाब

अलवर के राजीव गांधी सामान्य अस्पताल में सोनोग्राफी के लिए कितना इंतजार करना पड़ रहा है?
मरीजों को सोनोग्राफी करवाने के लिए डेढ़ से दो महीने तक का इंतजार करना पड़ रहा है।
अस्पताल में प्रतिदिन लगभग कितने मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं?
अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन करीब 4 से 5 हजार मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं।
निजी जांच केंद्रों पर सोनोग्राफी करवाने में मरीजों का कितना खर्च हो रहा है?
निजी सेंटरों पर जांच करवाने के लिए मरीजों को करीब 1 हजार से 2 हजार रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं।
राजीव गांधी सामान्य अस्पताल को मेडिकल कॉलेज का दर्जा कब मिला था?
इस अस्पताल को करीब तीन साल पहले मेडिकल कॉलेज का दर्जा मिल चुका है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·32 दिन पहले

अलवर के इस अस्पताल में सोनोग्राफी के लिए दो महीने का इंतजार मरीजों के मौलिक स्वास्थ्य अधिकारों पर सीधा आघात है। जिला अस्पताल में ऐसा भारी विलंब और निजी सेंटरों की ओर धकेलना एक गंभीर प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है। यदि समय पर इस व्यवस्था की उच्च-स्तरीय जांच नहीं की गई, तो यह प्रशासनिक उदासीनता आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए जानलेवा साबित हो सकती है और मरीजों का आक्रोश किसी भी समय कानून-व्यवस्था की समस्या बन सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·32 दिन पहले

राजस्थान के सबसे बड़े जिला अस्पतालों में शुमार इस संस्थान में हरियाणा और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों से भी मरीज आते हैं, जिससे यहां का ढांचागत दबाव और बढ़ जाता है। जब प्रसूताओं और गंभीर रोगियों को दो महीने का इंतजार करना पड़े, तो यह स्पष्ट है कि मौजूदा चिकित्सा संसाधनों और बढ़ती ओपीडी की संख्या के बीच भारी असंतुलन है। यदि इस बुनियादी ढांचे की क्षमता में तत्काल वृद्धि नहीं की गई, तो गरीब परिवारों की जेब पर पड़ रहा यह आर्थिक बोझ और अधिक गहराएगा।

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