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लागत में किफायती और रफ्तार में बेमिसाल: जानिए दुनिया की महंगी ट्रेनों को कैसे टक्कर दे रही है भारत की वंदे भारतभारत
19 अग॰ 2026, 3:26 pm (1 घंटे पहले)· 3

लागत में किफायती और रफ्तार में बेमिसाल: जानिए दुनिया की महंगी ट्रेनों को कैसे टक्कर दे रही है भारत की वंदे भारत

भारतीय इंजीनियरों द्वारा विकसित वंदे भारत एक्सप्रेस न केवल देश में यात्रा के तरीके को बदल रही है, बल्कि अपनी कम विनिर्माण लागत और आधुनिक सुविधाओं के दम पर वैश्विक बाजार में भी निर्यात की तैयारी कर रही है।

भारतीय रेल के नेटवर्क पर हाल के वर्षों में एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिला है। आज देश के विभिन्न कोनों में यात्रा करने वाले अधिकांश लोग तेज और आरामदायक सफर के लिए सबसे पहले वंदे भारत का चयन कर रहे हैं। इस ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत यात्रा के समय में होने वाली भारी बचत है। हालांकि बहुत कम लोग यह जानते हैं कि जब भारतीय रेलवे के मैकेनिकल इंजीनियर्स ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को धरातल पर उतारा था, तब इसका शुरुआती कोड नाम ट्रेन 18 रखा गया था। बाद में इसे वंदे भारत नाम दिया गया और आज यह भारतीय रेल की प्रीमियम ट्रेन सेवा की पहचान बन चुकी है। यह ट्रेन न केवल यात्रियों की पसंदीदा बनी है बल्कि रेलवे के खजाने के लिए भी कमाई का एक मजबूत जरिया बनकर उभरी है।

भारतीय रेल अब अपनी इस सफल सेमी-हाई-स्पीड ट्रेन को अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। अलग-अलग देशों के रेलवे ट्रैक का गेज अलग होता है, इसलिए विदेशी पटरियों के अनुकूल बनाने के लिए इसके डिजाइन में कुछ बदलाव किए जा रहे हैं। रेल मंत्रालय के तहत आने वाला उपक्रम RITES Ltd. यूरोपीय देशों सहित दुनिया के अन्य बाजारों में स्टैंडर्ड-गेज प्लेटफॉर्म पर वंदे भारत ट्रेनों के निर्यात की संभावनाओं का गहराई से अध्ययन कर रहा है।

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दुनिया की प्रमुख हाई-स्पीड ट्रेनों से तुलना और लागत का गणित

जब हम वैश्विक स्तर पर रेल नेटवर्क की तुलना करते हैं, तो कई देशों के पास बेहद तेज रफ्तार वाली ट्रेनें मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, चीन की शंघाई मैगलेव दुनिया की सबसे तेज ट्रेनों में शामिल है, जो मैग्नेटिक लेविटेशन तकनीक पर चलती है। यह ट्रेन 430 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल कर सकती है। हालांकि, इसे चलाने के लिए बिल्कुल अलग और विशेष गाइडवे ट्रैक की जरूरत होती है, जिसके निर्माण और रखरखाव की लागत बहुत अधिक है। इसी तरह, जापान की प्रसिद्ध शिंकानसेन या बुलेट ट्रेन 300 से 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है और इसे अपनी समयबद्धता तथा भूकंपरोधी सुरक्षा तकनीकों के लिए जाना जाता है। जापान की पहली तोकाइदो शिंकानसेन लाइन के निर्माण पर उस समय लगभग 380 अरब येन खर्च हुए थे, और आज के संदर्भ में ऐसी लाइन बिछाने की लागत 1.8 ट्रिलियन येन यानी 10 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक पहुंच जाती है।

यूरोप की बात करें तो फ्रांस की टीजीवी (TGV) ट्रेन लगभग 320 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से दौड़ सकती है। पेरिस से लियोन के बीच फ्रांस की पहली टीजीवी लाइन बनाने में उस दौर में लगभग 18 अरब फ्रैंक (उस समय के हिसाब से करीब 2,700 करोड़ रुपये) का खर्च आया था। जर्मनी की आईसीई (ICE) ट्रेन भी 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक पहुंचती है और इसमें बेहतरीन यात्री सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिसके एक ट्रेन सेट के निर्माण की लागत करीब 25 मिलियन यूरो (लगभग 250 करोड़ रुपये) बैठती है। इसके अलावा, दक्षिण कोरिया की केटीएक्स (KTX) ट्रेन 305 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है और इसके नए 16-कोच वाले ट्रेन सेट की कीमत लगभग 600 करोड़ रुपये है। इटली की फ्रेसियारोसा ट्रेन भी 300 किलोमीटर प्रति घंटे की गति पकड़ती है, जिसकी शुरुआती लागत प्रति ट्रेन सेट लगभग 30.8 मिलियन यूरो (करीब 300 करोड़ रुपये) दर्ज की गई थी।

इन सभी वैश्विक मिसालों की तुलना में भारत की स्वदेशी तकनीक से निर्मित 16 कोच वाली वंदे भारत ट्रेन की निर्माण लागत केवल 110 से 130 करोड़ रुपये के बीच आती है। इतनी कम लागत में प्रीमियम सुविधाएं और उच्च सुरक्षा प्रदान करना भारतीय इंजीनियरिंग की एक असाधारण उपलब्धि मानी जा रही है।

आधुनिक तकनीकी खूबियां और सुरक्षा इंतजाम

वंदे भारत एक्सप्रेस केवल किफायती ही नहीं है, बल्कि तकनीकी रूप से भी बेहद उन्नत है। यह ट्रेन शून्य से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार मात्र 52 सेकंड में हासिल कर लेती है, जो कई वैश्विक ट्रेनों के त्वरण (एक्सेलरेशन) से भी तेज है। भारतीय पटरियों पर इसकी अधिकतम परिचालन गति 160 किलोमीटर प्रति घंटे तय की गई है।

  • कवच सुरक्षा प्रणाली: दुर्घटनाओं को रोकने और स्वचालित ब्रेक लगाने के लिए यह ट्रेन भारत की स्वदेशी सुरक्षा प्रणाली 'कवच' से पूरी तरह लैस है।
  • घूमने वाली सीटें: एग्जीक्यूटिव क्लास में यात्रियों को 180 डिग्री तक घूमने वाली (रोटेटिंग) कुर्सियां दी गई हैं, जिन्हें ट्रेन के चलने की दिशा के अनुसार मोड़ा जा सकता है।
  • ऑटोमैटिक प्लग दरवाजे: मेट्रो ट्रेनों की तर्ज पर इसमें स्वचालित प्लग दरवाजे और स्लाइडिंग फुटस्टेप्स दिए गए हैं।
  • स्मार्ट सूचना प्रणाली: यात्रियों को आगामी स्टेशनों और गति की जानकारी देने के लिए जीपीएस-आधारित डिस्प्ले बोर्ड लगाए गए हैं।
  • हाइजीनिक टॉयलेट: स्पर्श-रहित (टच-फ्री) सेंसर सुविधाओं के साथ आधुनिक बायो-वैक्यूम टॉयलेट बनाए गए हैं।
  • सुरक्षा एवं आपात सुविधा: प्रत्येक डिब्बे में आंतरिक और बाह्य सीसीटीवी कैमरे, इमरजेंसी टॉक-बैक बटन और आपातकालीन खिड़कियां मौजूद हैं।
  • खान-पान व्यवस्था: यात्रियों को ताजा गर्म खाना और ठंडे पेय पदार्थ उपलब्ध कराने के लिए हर रैक में मिनी पेंट्री की व्यवस्था है।

वित्तीय प्रदर्शन और 2030 तक का विज़न

वंदे भारत ट्रेन भारतीय रेल के लिए एक बेहद लाभदायक व्यावसायिक मॉडल साबित हुई है। वित्तीय वर्ष 2025–26 के दौरान इस ट्रेन में यात्रियों की संख्या में भारी उछाल दर्ज किया गया, जो वित्तीय वर्ष FY25 के 2.97 करोड़ यात्रियों की तुलना में 34 प्रतिशत अधिक है। वर्ष 2019 में नई दिल्ली से वाराणसी के बीच अपनी पहली यात्रा शुरू करने के बाद से यह ट्रेन अब तक 1,00,000 से अधिक सफल फेरे (ट्रिप्स) पूरे कर चुकी है।

वर्तमान में वंदे भारत देश के लगभग 270 जिलों को आपस में जोड़ रही है। इस नेटवर्क की वित्तीय सफलता यह साबित करती है कि भारतीय यात्री बेहतर सुविधाओं और कम समय में गंतव्य तक पहुंचने के लिए थोड़ा अधिक किराया देने को पूरी तरह तैयार हैं। लंबी दूरी और रात भर के सफर को और अधिक आरामदायक बनाने के लिए अब वंदे भारत स्लीपर संस्करण भी पेश किया जा रहा है। भारतीय रेलवे की दीर्घकालिक योजना के तहत 2030 तक देश भर की पटरियों पर 800 से अधिक वंदे भारत ट्रेनसेट उतारने का लक्ष्य रखा गया है, जो भारत के यात्री रेल बुनियादी ढांचे को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और अत्याधुनिक बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

सवाल-जवाब

वंदे भारत एक्सप्रेस का मूल शुरुआती नाम क्या था?
वंदे भारत एक्सप्रेस को शुरुआत में भारतीय रेलवे के इंजीनियर्स द्वारा 'ट्रेन 18' प्रोजेक्ट के रूप में कोडित और डिजाइन किया गया था।
एक 16 कोच वाली वंदे भारत ट्रेन की निर्माण लागत कितनी है?
एक 16 कोच वाले वंदे भारत ट्रेन सेट को बनाने में लगभग 110 से 130 करोड़ रुपये का खर्च आता है।
विदेशी बाजारों में वंदे भारत के निर्यात की संभावनाएं कौन सी संस्था तलाश रही है?
रेल मंत्रालय का सार्वजनिक उपक्रम राइट्स लिमिटेड (RITES Ltd.) यूरोपीय और अन्य विदेशी बाजारों में वंदे भारत के निर्यात की संभावनाएं देख रहा है।
वंदे भारत एक्सप्रेस कितनी देर में 0 से 100 किमी/घंटा की रफ्तार पकड़ सकती है?
वंदे भारत एक्सप्रेस मात्र 52 सेकंड में 0 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पकड़ सकती है।
2030 तक भारतीय रेलवे का कितनी वंदे भारत ट्रेनें चलाने का लक्ष्य है?
भारतीय रेलवे का दीर्घकालिक विज़न 2030 तक 800 से अधिक वंदे भारत ट्रेनसेट पटरियों पर उतारने का है।
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