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अरावली की पहाड़ियों में ब्रिटिश दौर का जलाशय बना मगरमच्छों का बसेरा, माउंट आबू में पर्यटकों के लिए खास आकर्षणराजस्थान
20 सित॰ 2026, 3:36 pm (5 दिन पहले)· 1

अरावली की पहाड़ियों में ब्रिटिश दौर का जलाशय बना मगरमच्छों का बसेरा, माउंट आबू में पर्यटकों के लिए खास आकर्षण

माउंट आबू के जंगलों में 1897 का ऐतिहासिक ट्रैवर्स टैंक आज मगरमच्छों के संरक्षण और वन्यजीवों के दीदार का प्रमुख ठिकाना बन चुका है। महज 130 रुपये के शुल्क में सैलानी यहां प्राकृतिक खूबसूरती और सुस्ताते जीवों का अनुभव ले सकते हैं।

राजस्थान के प्रसिद्ध हिल स्टेशन आबूराज में अरावली पर्वतमाला के घने जंगलों के बीच वन्यजीवों को नजदीक से निहारने के लिए कई रोमांचक ठिकाने मौजूद हैं। माउंट आबू वाइल्डलाइफ सेंचुरी के भीतर स्थित ट्रैवर्स टैंक क्रोकोडाइल पार्क ऐसा ही एक चुनिंदा केंद्र है, जो प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर खींचता है। मुख्य शहर से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर बसा यह क्षेत्र वन विभाग की देखरेख में संचालित होता है। यह एक मानव निर्मित जलाशय है, जिसकी मुख्य पहचान मगरमच्छों के प्राकृतिक प्रजनन और क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण को बढ़ावा देने वाले केंद्र के रूप में स्थापित हो चुकी है। औपनिवेशिक काल में तैयार किया गया यह जलाशय आज भी जल संचयन के साथ-साथ वन्यजीवों की प्यास बुझाने का अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है।

कर्नल जीएच ट्रेवर की विरासत और जलाशय का इतिहास

स्थानीय टूरिस्ट गाइड प्रकाश कुमार के अनुसार इस जलाशय की नींव वर्ष 1897 में रखी गई थी। ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल जीएच ट्रेवर ने इस जल संरचना का निर्माण करवाया था और उनके सम्मान में ही इसका नाम ट्रैवर्स टैंक पड़ा। वक्त बीतने के साथ अरावली के जंगलों में फैले इस विशाल ताल ने पूरे परिक्षेत्र के वन्यजीवों के लिए जीवनदायिनी जल स्रोत का रूप ले लिया। दिन के समय यहां आने वाले सैलानियों को अक्सर जलाशय के किनारों पर उभरी चट्टानों पर विशालकाय मगरमच्छ धूप सेंकते हुए नजर आ जाते हैं। पत्थरों पर बिना हिले-डुले आराम फरमाते इन जीवों को देखना आगंतुकों के लिए बेहद रोमांचक साबित होता है। जलाशय के भीतर केवल मगरमच्छ ही नहीं, बल्कि विभिन्न प्रजातियों की मछलियां भी बड़ी संख्या में निवास करती हैं, जिससे यहां का जलीय संतुलन बना रहता है।

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तेंदुए, भालू और दुर्लभ पक्षियों की मौजूदगी

जलीय जीवों के अलावा ट्रैवर्स टैंक के चारों ओर फैला वन क्षेत्र वन्यजीव फोटोग्राफरों और बर्ड वॉचर्स के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है। घने पेड़ों के बीच मोर और तीतर के अलावा विभिन्न प्रजातियों के पंछी निरंतर विचरण करते देखे जा सकते हैं। इस वन्यजीव इलाके में स्लॉथ बेयर और लेपर्ड जैसे शिकारी जानवरों की मौजूदगी भी दर्ज की जा चुकी है। हालांकि दिन के उजाले में इन जानवरों का दिखना हमेशा तय नहीं होता, लेकिन भोर के शांत समय ये वन्यजीव अक्सर अपनी प्यास बुझाने इस जलाशय के किनारे पहुंचते हैं।

प्रकृति के बीच शांति और सुरक्षा के सख्त नियम

चारों ओर से हरी-भरी पहाड़ियों से घिरी यह जगह शहरी आपाधापी से दूर परिवार और मित्रों के साथ शांत समय बिताने का बेहतरीन विकल्प प्रस्तुत करती है। घने जंगलों से होकर गुजरने वाली संकरी पगडंडियां और प्राकृतिक परिदृश्य इसे माउंट आबू के अन्य पारंपरिक पर्यटन स्थलों से बिल्कुल अलग पहचान दिलाते हैं। सैलानी यहां शांत परिवेश में वक्त बिताने, लैंडस्केप फोटोग्राफी करने और मगरमच्छों की सहज गतिविधियों को देखने पहुंचते हैं। चूंकि यह क्षेत्र सीधे तौर पर वन्यजीव अभयारण्य का हिस्सा है, इसलिए आगंतुकों के लिए जंगली जानवरों से सुरक्षित फासला बनाए रखना और केवल वन विभाग द्वारा तय किए गए रास्तों व सीमाओं में रहना अनिवार्य किया गया है।

पहुंचने का मार्ग, शुल्क और व्यू पॉइंट

इस अनूठे पार्क तक पहुंचने के लिए पर्यटकों को माउंट आबू शहर से गुरुशिखर रोड की दिशा में करीब 5 किलोमीटर आगे बढ़ना होता है। मुख्य सड़क पर वन विभाग की निर्धारित फीस चुकाने के पश्चात लगभग 1 किलोमीटर का सफर तय करके जलाशय तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहां प्रति व्यक्ति प्रवेश शुल्क 130 रुपये तय किया गया है, जबकि निजी वाहन को भीतर ले जाने पर 300 रुपये का अतिरिक्त वाहन शुल्क अदा करना पड़ता है। जलाशय के निकट दो अलग-अलग पहाड़ियों पर बने आबू व्यू पॉइंट और वैली व्यू पॉइंट से पर्यटक अरावली की विस्तृत घाटियों और नीचे फैले प्राकृतिक नजारों का विहंगम दृश्य देख सकते हैं।

भ्रमण के लिए अनुकूल समय

इस वन्यजीव क्षेत्र की सैर के लिए मानसून के तुरंत बाद का मौसम सबसे शानदार माना जाता है। वर्षा ऋतु के ढलते ही अरावली की चोटियां और नीचे फैला जंगल नई हरियाली की चादर ओढ़ लेते हैं, जिससे वातावरण बेहद सुरम्य हो जाता है। इसके विपरीत, घनघोर बारिश के दौरान पूरी घाटी घने कोहरे और धुंध से ढकी रहती है, जिससे दृश्यता काफी घट जाती है। साथ ही जंगलों के कच्चे रास्तों पर फिसलन बढ़ने से पर्यटकों को आवाजाही में असुविधा का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में प्रकृति के करीब रहकर वन्यजीवों को देखने के शौकीनों के लिए मानसून के उपरांत की गई यात्रा माउंट आबू के इस क्रोकोडाइल पार्क को यादगार बना देती है।

सवाल-जवाब

माउंट आबू में ट्रैवर्स टैंक क्रोकोडाइल पार्क कहां स्थित है?
यह पार्क माउंट आबू शहर से लगभग 5 किलोमीटर दूर गुरुशिखर रोड पर माउंट आबू वाइल्डलाइफ सेंचुरी के भीतर स्थित है।
ट्रैवर्स टैंक का निर्माण कब और किसने करवाया था?
इस जलाशय का निर्माण वर्ष 1897 में ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल जीएच ट्रेवर द्वारा जल संरक्षण के लिए करवाया गया था।
क्रोकोडाइल पार्क में प्रवेश और वाहन का शुल्क कितना है?
यहां प्रति व्यक्ति प्रवेश शुल्क 130 रुपये है, जबकि निजी वाहन से प्रवेश करने पर 300 रुपये का वाहन शुल्क अलग से देना होता है।
मगरमच्छों के अलावा यहां और कौन से वन्यजीव देखे जा सकते हैं?
यहां मोर, तीतर, विभिन्न मछलियां पाई जाती हैं, साथ ही सुबह के समय स्लॉथ बेयर और लेपर्ड जैसे शिकारी जानवर भी पानी पीने आते हैं।
इस पार्क में घूमने के लिए सबसे अच्छा मौसम कौन सा माना जाता है?
मानसून के तुरंत बाद का समय सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि उस दौरान पहाड़ियों में भरपूर हरियाली होती है और रास्ते सुरक्षित रहते हैं।
ट्रैवर्स टैंक के पास प्रमुख व्यू पॉइंट कौन से हैं?
जलाशय के पास की पहाड़ियों पर आबू व्यू पॉइंट और वैली व्यू पॉइंट बने हैं, जहां से वादियों के विहंगम दृश्य दिखाई देते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·4 दिन पहले

औपनिवेशिक काल के जल बुनियादी ढांचे का पर्यावरण-पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण केंद्र में बदलना एक महत्वपूर्ण केस स्टडी है। अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में जल संचयन के लिए बनाए गए ऐतिहासिक ढांचे आज जैव-विविधता के संरक्षण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह मॉडल दर्शाता है कि कैसे ऐतिहासिक विरासत का संरक्षण करके पारिस्थितिक संतुलन और पर्यावरण-अनुकूल आर्थिक विकास दोनों को एक साथ हासिल किया जा सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

माउंट आबू का ट्रैवर्स टैंक यह दर्शाता है कि कैसे ऐतिहासिक जल संरचनाएं आधुनिक समय में सतत इको-टूरिज्म और जैव विविधता संरक्षण का प्रभावी मॉडल बन सकती हैं। न्यूनतम प्रवेश शुल्क के जरिए स्थानीय पर्यटन अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ-साथ प्राकृतिक आवासों का संरक्षण एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। हालांकि, अरावली जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र में बढ़ते पर्यटन के बीच वन्यजीवों की सुरक्षा और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व के नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना दीर्घकालिक स्थिरता के लिए अनिवार्य होगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

लोक नीति और प्रशासनिक दृष्टिकोण से ट्रैवर्स टैंक जैसे ऐतिहासिक जल स्रोतों का प्रबंधन केवल पर्यटन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय शासन के सामंजस्य की परीक्षा भी है। वन विभाग द्वारा इसे नियंत्रित रखना स्वागत योग्य है, लेकिन अरावली जैसे संवेदनशील क्षेत्र में राज्य सरकार को वहन क्षमता (कैरिंग कैपेसिटी) और सख्त जोनिंग नियमों की नीति बनानी होगी। यदि पर्यटन राजस्व और पारिस्थितिकी संतुलन के बीच नीतिगत निगरानी मजबूत नहीं हुई, तो ऐसे संरक्षित क्षेत्रों पर मानवीय दबाव बढ़ेगा। सतत विकास के लिए अंतर-विभागीय समन्वय अनिवार्य है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

वन्यजीव अभयारण्य में मगरमच्छों और तेंदुओं जैसे शीर्ष शिकारियों की मौजूदगी के बीच पर्यटन को बढ़ावा देना सीधे तौर पर सार्वजनिक सुरक्षा और कानूनी उत्तरदायित्व का विषय है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटकों की अनियंत्रित निकटता या नियमों की अनदेखी गंभीर मानव-वन्यजीव संघर्ष को जन्म दे सकती है। वन विभाग को केवल प्रवेश शुल्क और बुनियादी निगरानी तक सीमित न रहकर सुरक्षा बाड़ों, स्पष्ट चेतावनी तंत्र और गश्त को सख्त करना चाहिए, ताकि किसी भी अप्रिय हादसे या अनधिकृत घुसपैठ की स्थिति में कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही का संकट न खड़ा हो।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

करन की यह बात नीतिगत और प्रशासनिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है। जब किसी संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्र को पर्यटन केंद्र के रूप में खोला जाता है, तो स्थानीय प्रशासन का दायित्व सिर्फ टिकट व्यवस्था तक सीमित नहीं रह सकता। इको-टूरिज्म के संचालन में स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी), निर्धारित बफर जोन और आपातकालीन रिस्पॉन्स टीम का होना अनिवार्य है। मगरमच्छों और अन्य वन्यजीवों की आवाजाही वाले क्षेत्रों में यदि पर्यटकों की निगरानी और सुरक्षा के पुख्ता बुनियादी ढांचे का अभाव रहा, तो यह गंभीर प्रशासनिक विफलता और जनसुरक्षा के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकता है।

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