रेगिस्तानी सरजमीं पर सीमित पानी और बेहद कम मानसूनी बारिश के बावजूद फसलों का लहलहाना किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता। बाड़मेर के थार रेगिस्तान में इन दिनों खेतों का परिदृश्य बदला हुआ नजर आ रहा है। पानी के गंभीर संकट और कड़ी धूप के बीच खेतों में खड़ी एक अनोखी फसल हर राहगीर और किसान को अचंभित कर रही है। यह फसल है तुर्की किस्म का बाजरा, जिसके विशाल पौधे और असाधारण लंबाई वाली बालियां पूरे इलाके में कौतूहल का केंद्र बनी हुई हैं। स्थानीय काश्तकारों को कम वर्षा के दौर में भी इस विशिष्ट किस्म से बंपर पैदावार मिलने की पूरी आस बंधी है।
थार की तपती रेत में असाधारण ऊंचाई वाले पौधे
पश्चिमी राजस्थान का बाड़मेर जिला सीमावर्ती क्षेत्र होने के साथ-साथ पारंपरिक रूप से सूखे और कम वर्षा वाले भूभाग के रूप में जाना जाता है। यहां के काश्तकार लंबे समय से मोटे अनाजों, विशेषकर बाजरे की खेती पर निर्भर रहे हैं। इस कृषि सत्र में सीमावर्ती क्षेत्र के किसानों ने अपने खेतों में तुर्की किस्म के बाजरे के बीजों की बुआई की। परिणाम स्वरूप खेतों में 8 से 12 फीट तक की अप्रत्याशित ऊंचाई वाले पौधे लहलहा रहे हैं। केवल तने की लंबाई ही नहीं, बल्कि इन पौधों पर लगी बालियां भी लगभग 3 से 4 फीट तक लंबी दर्ज की गई हैं, जो सामान्य देसी बाजरे की तुलना में कहीं अधिक विशाल हैं।
प्रति हेक्टेयर मात्र 5 किलो बीज से दोगुना मुनाफा
कृषि के तकनीकी पहलुओं की बात करें तो इस किस्म में बीज दर बेहद किफायती साबित हो रही है। एक हेक्टेयर खेत के लिए केवल 5 किलोग्राम बीज की बुआई ही पर्याप्त मानी गई है। सामान्य देसी बाजरे की तुलना में तुर्की बीज बोने वाले किसानों को दोगुना उत्पादन प्राप्त होने का आकलन है। जहां इस किस्म के पौधों की औसत ऊंचाई 8 से 10 फीट और बालियां 3 से 4 फीट लंबी होती हैं, वहीं पौधों का भरपूर विकास कम संसाधनों में भी उत्पादन की मात्रा को सीधे तौर पर दोगुना कर देता है। कम लागत और न्यूनतम बीज खपत के चलते यह खेती किसानों के लिए आर्थिक रूप से अत्यधिक लाभकारी प्रतीत हो रही है।
सूखाग्रस्त इलाकों के लिए वरदान और बीजों का पुनर्चक्रण
यह तुर्की बाजरा कम अवधि में पककर तैयार होने की खूबी रखता है। साथ ही इसमें भीषण सूखा सहने की जबर्दस्त क्षमता है, उच्च उत्पादन देने का गुण है और यह पोषण के स्तर पर भी काफी समृद्ध है। इसी कारण यह शुष्क और अर्ध-शुष्क वातावरण में जीवनयापन करने वाले किसानों के लिए एक मजबूत विकल्प बनकर उभरा है। इस फसल का सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ यह है कि बाजार के अन्य हाइब्रिड बीजों की तरह इसे हर साल खरीदने की मजबूरी नहीं रहती। जहां सामान्य हाइब्रिड बाजरे की उपज को दोबारा बीज के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, वहीं तुर्की किस्म के बाजरे को किसान अगली फसल के लिए बार-बार बीज के रूप में उपयोग कर सकते हैं। बाड़मेर जिले के जानपालिया, धनाऊ, सेड़वा, हरपालिया, बाखासर, धोरीमन्ना, भियाड़, भाडखा और सनावड़ा सहित आसपास के कई ग्रामीण क्षेत्रों में किसान उत्साहपूर्वक इसकी काश्त कर रहे हैं।

















