बिहार के कई जिलों में बच्चियों और युवतियों के साथ हाल के दिनों में सामने आई बर्बर घटनाओं ने अब प्रशासनिक चौखटों के साथ-साथ सत्ता पक्ष के भीतर भी असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। राजधानी पटना से लेकर ग्रामीण अंचलों तक फैली इन वारदातों पर बीजेपी नेता ऋतुराज सिन्हा ने खुलकर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने सत्ता की हिस्सेदारी में शामिल व्यवस्था को आईना दिखाते हुए स्पष्ट किया कि कानून का इकबाल बनाए रखना शासन का बुनियादी कर्तव्य है, लेकिन इसके साथ ही समाज को अपनी गिरती सोच और बेटों की परवरिश पर भी विचार करना होगा।
जमुई से पटना तक की घटनाओं से राज्य की साख पर आंच
बीजेपी नेता ने राज्य के अलग-अलग हिस्सों में हुई दरिंदगी का विशेष तौर पर उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जमुई, बांका, बेगूसराय, पटना, नालंदा और मुजफ्फरपुर में जिस तरह के जघन्य मामले सामने आए हैं, उन्होंने पूरे मुल्क में बिहार की छवि को गहरा आघात पहुंचाया है। राष्ट्रीय स्तर पर इन वारदातों की चर्चा से प्रदेश का सिर शर्म से झुक गया है। आम तौर पर ऐसे मामलों में विपक्षी दल ही हमलावर होते हैं, मगर इस बार सत्ताधारी खेमे से ही कानून-व्यवस्था को लेकर कड़े सवाल दागे गए हैं।
प्रशासनिक खामियों और सरकार के प्राथमिक दायित्व पर मंथन की मांग
ऋतुराज सिन्हा ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि इन वारदातों को रोकने में पुलिस महकमे और स्थानीय प्रशासन के स्तर पर आखिर क्या चूक रह गई, इस पहलू पर खुली और निष्पक्ष बातचीत होनी चाहिए। उनके मुताबिक, किसी भी हुकूमत की पहली प्राथमिकता कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखना होता है। जब बेटियों के साथ खुलेआम ज्यादतियां होने लगें, तब शासन और पुलिस तंत्र अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकते। उन्हें इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि सुरक्षा का तंत्र आखिर कहां नाकाम साबित हुआ।
उन्होंने आगे कहा कि यह मुद्दा अब सिर्फ राजनीतिक चर्चाओं या बंद कमरों तक सीमित नहीं रह गया है। उनके अपने घर की महिलाएं इन लगातार हो रही घटनाओं से बेहद चिंतित हैं और इस पर बात कर रही हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि यह पीड़ा सिर्फ उनके घर की नहीं, बल्कि बिहार के हर उस परिवार की है जहां मां-बहनें और बेटियां सुरक्षित माहौल की उम्मीद करती हैं।
पारिवारिक परिवेश और लड़कों के आचरण पर गंभीर सवाल
समस्या की जड़ सिर्फ पुलिस की नाकामी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पारिवारिक संरचना में आ रही गिरावट का भी संकेत देती है। ऋतुराज सिन्हा ने सवाल उठाया कि घरों और समाज के माहौल में ऐसा क्या बदलाव आ गया है कि घर के लड़के ही अपनी आस-पड़ोस की बेटियों के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। उन्होंने अपनी पीढ़ी का हवाला देते हुए बताया कि बचपन में परिवारों के बुजुर्ग यह सिखाते थे कि पुरुष होने की असली पहचान महिलाओं और बच्चों को पूर्ण सुरक्षा का अहसास कराने में है, न कि उन पर ताकत आजमाने में।
संस्कारों की वापसी और महिलाओं के सम्मान का संकल्प
उन्होंने पुरानी सीख याद दिलाते हुए कहा कि किसी महिला या बहू-बेटी का रास्ता रोकना, उनके साथ अभद्र व्यवहार करना या उन पर हाथ उठाना सबसे घिनौना और नीच कृत्य माना जाता था। मर्दानगी का मतलब दूसरों को डराना नहीं, बल्कि अपने आसपास मौजूद हर महिला को सुरक्षित और सम्मानित महसूस कराना है। सिन्हा के मुताबिक, अगर समाज को अपराधमुक्त बनाना है, तो इस बुनियादी सोच को दोबारा हर घर में स्थापित करना होगा।
भक्षक बनने से रोकने के लिए माताओं और बुजुर्गों की भूमिका
बिहार के सम्मान और यहां के पुरुषों के आत्मसम्मान को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास अनिवार्य हो चुके हैं। बीजेपी नेता ने कहा कि परिवार की माताओं और वरिष्ठ महिलाओं को भी आगे आकर यह देखना होगा कि वे अपने लड़कों को क्या सीख दे रही हैं। परवरिश ऐसी होनी चाहिए जिससे कोई बेटा बड़ा होकर किसी महिला का भक्षक न बने। घर के भीतर ही बच्चों को सही और गलत आचरण का अंतर समझाना होगा, ताकि उनका कोई भी गलत कदम परिवार, जिले और पूरे प्रदेश के लिए कलंक न बन सके।
राजनीति से इतर एक गहरा सामाजिक संकट
इस पूरे मामले को सिर्फ सियासी नफे-नुकसान से परे देखने की जरूरत है। ऋतुराज सिन्हा ने साफ कहा कि अगर यह मसला राजनीतिक माना भी जाए, तो यह उससे कहीं अधिक सामाजिक विघटन का मामला है। जिस प्रकार हर इंसान अपने परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए सचेत रहता है, ठीक उसी तरह पूरे राज्य के सम्मान की रक्षा करना भी हर नागरिक की साझी जिम्मेदारी है। उन्होंने जनता से इस मसले पर गहराई से सोचने का आह्वान करते हुए दोहराया कि बिहार की साख बचाना केवल पुलिस बल का काम नहीं है, बल्कि समाज के हर घटक को इसमें हिस्सेदारी निभानी होगी।


















