राजस्थान के पाली जिले की देसूरी तहसील में बसा नारलाई कस्बा वन्यजीव संरक्षण और पारंपरिक ग्रामीण जीवन के अनोखे संगम की जीती जागती मिसाल बन चुका है। आमतौर पर बस्तियों के नजदीक जंगली जानवरों की आमद को खतरे के तौर पर देखा जाता है, परंतु इस अंचल में आबादी और 20 से ज्यादा तेंदुओं के बीच किसी भी प्रकार का संघर्ष देखने को नहीं मिलता। अरावली पर्वतमाला की पथरीली पहाड़ियों के साए में फैला यह भूभाग सदियों पुराने सांस्कृतिक वैभव और प्राकृतिक सौंदर्य को अपने आंचल में समेटे हुए है।
जोधपुर रियासत का ऐतिहासिक शिकारगाह और पहाड़ी पर स्थित हाथी
इस क्षेत्र के ऐतिहासिक पन्नों पर नजर डालें तो 17वीं सदी के दौरान जोधपुर के शाही परिवार ने इस रमणीय वन्य क्षेत्र को अपनी निजी शिकारगाह के रूप में विकसित किया था। राजपरिवार के लोग सुकून के पल बिताने तथा शिकार के शौक को पूरा करने के लिए अक्सर यहाँ ठहरा करते थे। इस कस्बे के भूदृश्य की सबसे प्रमुख निशानी एक ऊंची चट्टान के शिखर पर तराशी गई विशाल हाथी की मूर्ति है। दूर से ही दिखाई देने वाला यह पाषाण हाथी सदियों से इस पूरे इलाके की विशिष्ट पहचान और राजसी गरिमा का प्रतीक बना हुआ है।
हवेली का कायाकल्प और बावडियों का जल संचयन तंत्र
रियासती दौर के खत्म होने के बाद भी इस क्षेत्र का ऐतिहासिक महत्व धुंधला नहीं पड़ा। साल 1996 में जोधपुर राजपरिवार की रानी उषा देवी ने इस प्राचीन शिकार निवास का जीर्णोद्धार करवाकर इसे एक हेरिटेज होटल का रूप दिया। इस पहल की बदौलत पुरानी वास्तुकला को नया जीवन मिला, जिससे दुनिया भर से आने वाले सैलानी मारवाड़ के पारंपारिक रहन-सहन और शाही ठाठबाट को करीब से महसूस कर पाते हैं। कस्बे की गलियों में कदम रखते ही प्राचीन नक्काशीदार मंदिर, भव्य हवेलियां और स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने नजर आते हैं। यहाँ मौजूद पारंपरिक बावडियां मात्र देखने की वस्तु नहीं हैं, बल्कि शताब्दियों पूर्व तैयार किया गया यह जल संचयन ढांचा आज भी स्थानीय निवासियों की पानी की जरूरतों को पूरा करने में निरंतर मददगार साबित हो रहा है।
वन्यजीवों के साथ ग्रामीणों का अनुकरणीय तालमेल
नारलाई की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि आसपास की गुफाएं और झाड़ियां हिंसक वन्यजीवों को सुरक्षित प्राकृतिक पर्यावास उपलब्ध कराती हैं। इस अंचल में 20 से अधिक तेंदुए बेखौफ घूमते हैं, इसके बावजूद ग्रामीण उनके साथ अद्भुत सामंजस्य बनाकर अपनी दिनचर्या पूरी करते हैं। दोनों पक्षों के बीच बना यह अघोषित संतुलन पर्यावरणविदों के लिए भी अध्ययन का विषय है। प्रकृति के सानिध्य में बसा यह देहाती कोना यह साबित करता है कि अगर पर्यावरण के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाया जाए, तो इंसान और वन्यजीव बिना किसी भय या हिंसा के एक ही परिवेश में फल-फूल सकते हैं।




















