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बीकानेर के कलाकार राजू स्वामी की अद्भुत कला को 27 साल बाद मिला सम्मान, छोटे से कैनवास पर बनाए थे 17,480 पत्तेराजस्थान
16 सित॰ 2026, 7:46 pm (8 दिन पहले)· 1

बीकानेर के कलाकार राजू स्वामी की अद्भुत कला को 27 साल बाद मिला सम्मान, छोटे से कैनवास पर बनाए थे 17,480 पत्ते

बीकानेर के वरिष्ठ लघु चित्रकार राजू स्वामी की एक अद्वितीय कलाकृति को 27 साल बाद इंडियन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने मान्यता दी है, जिसमें उन्होंने नंगी आंखों से मात्र 3×4 इंच के कैनवास पर बरगद के 17,480 पत्ते बनाए थे।

राजस्थान की सांस्कृतिक धरा बीकानेर से ताल्लुक रखने वाले वरिष्ठ लघु चित्रकार राजू स्वामी ने अपनी अनूठी कला साधना और बेजोड़ धैर्य से दुनिया को हैरान कर दिया है। उन्होंने मात्र 3×4 इंच के एक बेहद छोटे कैनवास पर बरगद के 17,480 पत्तों की अद्भुत आकृति उकेरकर एक नया इतिहास रचा है। इस अनोखे और अत्यंत सूक्ष्म लघुचित्र को तैयार होने के लगभग 27 साल बाद आखिरकार इंडियन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने आधिकारिक तौर पर अपनी मान्यता दे दी है। गिलहरी के बालों से बने अत्यंत महीन ब्रश और पारंपरिक प्राकृतिक रंगों की मदद से तैयार की गई यह कलाकृति मनुष्य के असाधारण धैर्य और कला के प्रति अटूट समर्पण की एक जीवंत मिसाल है।

बिना किसी लेंस के नंगी आंखों से किया कमाल

इस ऐतिहासिक कलाकृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि राजू स्वामी ने इसे बिना किसी चश्मे, लेंस या अन्य ऑप्टिकल उपकरण की मदद के, पूरी तरह अपनी नंगी आंखों से तैयार किया था। वर्ष 1999 में 10 अक्टूबर को बीकानेर में इस नायाब चित्र को पूरा किया गया था। इस बारीक पेंटिंग में प्रत्येक पत्ते को बेहद सूक्ष्मता और बारीकी के साथ हाथ से चित्रित किया गया है, जो कला समीक्षकों को भी हैरत में डाल देता है। कला जगत में इस बेमिसाल रचना की चर्चा लंबे समय से थी, लेकिन सितंबर 2026 में जाकर इसे आधिकारिक तौर पर रिकॉर्ड बुक में जगह मिली। इस महत्वपूर्ण मान्यता के साथ ही राजू स्वामी को उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए विशेष रिकॉर्ड किट भी सौंपी गई है। वर्षों पहले बनी यह मूल पेंटिंग आज भी इस कलाकार के पास पूरी तरह सुरक्षित और सहेजकर रखी हुई है।

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विरासत में मिली कला और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर धूम

18 फरवरी 1967 को बीकानेर में जन्मे राजू स्वामी को चित्रकला की यह बारीकी विरासत में प्राप्त हुई है। उन्होंने पारंपरिक बीकानेर लघु चित्रकला शैली के गुर अपने पिता और सुप्रसिद्ध वरिष्ठ कलाकार गोर्धन दास स्वामी से सीखे थे। पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय से राजू स्वामी इस पारंपरिक और ऐतिहासिक कला शैली को न केवल जीवित रखने में जुटे हैं, बल्कि इसके संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं। यही कारण है कि उनकी कलाकृतियां देश के कोने-कोने के साथ-साथ दुनिया के प्रतिष्ठित कला केंद्रों में भी प्रदर्शित की जा चुकी हैं।

उनकी वैश्विक यात्रा का सिलसिला काफी पुराना है। वर्ष 1995 में उनकी दो वनस्पति-आधारित पेंटिंग्स को अमेरिका के पिट्सबर्ग में स्थित प्रसिद्ध कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के हंट इंस्टीट्यूट फॉर बॉटनिकल डॉक्यूमेंटेशन की आठवीं अंतरराष्ट्रीय बॉटनिकल आर्ट एंड इलस्ट्रेशन प्रदर्शनी के लिए चुना गया था। इसके बाद वर्ष 1997 में पेरिस की ऐतिहासिक गैलरी लाफायेट सहित यूरोप के कई नामचीन कला संग्रहालयों और संस्थानों में भी उनकी कृतियों ने भारत का मान बढ़ाया था।

वैश्विक नीलामी में आकर्षण और कार्यशालाएं

राजू स्वामी की कलात्मक कृतियों ने न केवल प्रदर्शनियों में सुर्खियां बटोरी हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कला बाजारों और नीलामी घरों में भी अपना लोहा मनवाया है। उदाहरण के लिए, बरगद के पत्तों पर आधारित उनकी एक अन्य बेमिसाल कलाकृति '14675 Leaves' को वर्ष 2022 में नीदरलैंड्स के डी ज्वान नीलामी घर में नीलाम किया गया था। इसी तरह, वर्ष 2021 में लंदन के मशहूर रोजबेरीज नीलामी घर में उनकी एक अन्य प्रसिद्ध पेंटिंग 'A Peacock and Squirrels in a Tree' की भी सफल नीलामी की गई थी।

राजू स्वामी भारत सरकार के कपड़ा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले विकास आयुक्त हस्तशिल्प कार्यालय के साथ एक पंजीकृत शिल्पकार के रूप में भी जुड़े हुए हैं। उन्होंने वर्ष 2012 में नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित प्रसिद्ध 'The Bikaner School' प्रदर्शनी के दौरान पारंपरिक चित्रकला के संवर्धन के लिए एक विशेष कार्यशाला का संचालन भी किया था। आज भी उनकी कई मूल कलाकृतियां बीकानेर के ऐतिहासिक जूनागढ़ पैलेस स्थित प्राचीन म्यूजियम में पर्यटकों और कला प्रेमियों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी हुई हैं। कला के मुरीद इस रिकॉर्ड-धारक पेंटिंग का दीदार बीकानेर के लालगढ़ पैलेस रोड स्थित कीर्ति स्तंभ के समीप उनके अपने आर्ट स्टूडियो और गैलरी स्वामी आर्ट में व्यक्तिगत रूप से कर सकते हैं।

सवाल-जवाब

राजू स्वामी कौन हैं?
राजू स्वामी राजस्थान के बीकानेर के रहने वाले एक वरिष्ठ लघु चित्रकार और भारत सरकार के कपड़ा मंत्रालय में पंजीकृत शिल्पकार हैं।
उन्हें किस कलाकृति के लिए रिकॉर्ड का सम्मान मिला है?
उन्हें केवल 3×4 इंच के छोटे से कैनवास पर बिना किसी लेंस की मदद के बरगद के 17,480 पत्तों को चित्रित करने के लिए इंडियन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स से मान्यता मिली है।
यह पेंटिंग कब बनाई गई थी और इसे मान्यता कब मिली?
यह पेंटिंग 10 अक्टूबर 1999 को बीकानेर में पूरी की गई थी और इसे करीब 27 साल बाद सितंबर 2026 में आधिकारिक मान्यता दी गई।
इस लघुचित्र को बनाने में किन सामग्रियों का उपयोग किया गया था?
इस चित्र को बनाने के लिए बिना किसी ऑप्टिकल उपकरण के पारंपरिक प्राकृतिक रंगों और गिलहरी के बालों से बने अत्यंत महीन ब्रश का उपयोग किया गया था।
क्या लोग इस पेंटिंग को व्यक्तिगत रूप से देख सकते हैं?
हां, यह मूल पेंटिंग बीकानेर में लालगढ़ पैलेस रोड पर कीर्ति स्तंभ के पास स्थित उनकी कला गैलरी और स्टूडियो 'स्वामी आर्ट' में देखी जा सकती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 दिन पहले

एक अपराध संवाददाता के रूप में, मैं इस 27 साल की देरी को केवल प्रशासनिक सुस्ती नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर के कानूनी संरक्षण और बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) की सुरक्षा में एक बड़ी कमी के रूप में देखता हूँ। जब ऐसी बेजोड़ कलाकृतियों का समय पर कानूनी दस्तावेजीकरण और पंजीकरण नहीं होता, तो उनके चोरी होने, जालसाजी होने और अंतरराष्ट्रीय ब्लैक मार्केट में तस्करी होने का जोखिम बढ़ जाता है। कानून-व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र को ऐसे पारंपरिक कलाकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए सख्त सुरक्षात्मक ढांचे बनाने की आवश्यकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·8 दिन पहले

करण की बात को आगे बढ़ाते हुए, शासन और लोक नीति के दृष्टिकोण से यह 27 वर्षों का विलंब हमारे सांस्कृतिक प्रशासन की गंभीर उदासीनता को दर्शाता है। जब तक हमारे पास क्षेत्रीय कलाकारों और उनकी अमूल्य धरोहरों के त्वरित प्रमाणीकरण, डिजिटल पंजीकरण और वित्तीय सुरक्षा के लिए कोई सुदृढ़ नीतिगत ढांचा नहीं होगा, तब तक ऐसी कालजयी कलाकृतियां गुमनामी और उपेक्षा का शिकार होती रहेंगी। सरकार को जिला और राज्य स्तर पर ऐसी कलाओं के संरक्षण और उनके नीतिगत दस्तावेजीकरण के लिए सक्रिय संस्थागत प्रयास करने चाहिए, ताकि कलाकारों को उनके जीवनकाल में ही उचित सम्मान और सुरक्षा मिल सके।

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