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बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में चमत्कार, 29 हफ्ते के प्रीमैच्योर बच्चे को डॉक्टरों ने दी नई जिंदगीराजस्थान
4 सित॰ 2026, 9:09 pm (20 दिन पहले)· 1

बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में चमत्कार, 29 हफ्ते के प्रीमैच्योर बच्चे को डॉक्टरों ने दी नई जिंदगी

बीकानेर के पीबीएम अस्पताल के डॉक्टरों ने 29 सप्ताह की गर्भावस्था में जन्मे मात्र 1.20 किलो के नवजात की जान बचाई है। पांच बार सांस और दिल की धड़कन रुकने और गंभीर संक्रमण से जूझने के बाद 58वें दिन बच्चे को स्वस्थ अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

बीकानेर के पीबीएम अस्पताल की नवजात गहन चिकित्सा इकाई ने चिकित्सा जगत में एक मिसाल पेश करते हुए महज 29 सप्ताह की अल्प आयु में जन्मे 1.20 किलोग्राम वजनी प्रीमैच्योर शिशु को पुनर्जीवन प्रदान किया है। इस नाजुक दौर में इलाज के दौरान पांच बार ऐसी स्थिति आई जब बच्चे की सांसें और दिल की धड़कनें थम गईं, परंतु चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ के अदम्य साहस और त्वरित कदमों ने हर बार उसे मौत के मुंह से खींच लिया। करीब 20 दिनों तक वेंटिलेटर के सहारे रहने और एक खतरनाक संक्रमण से लंबी जंग लड़ने के बाद इस नौनिहाल को जीवन के 58वें दिन पूरी तरह स्वस्थ हालत में उसके परिजनों को सौंप दिया गया।

जन्म के समय से ही शुरू हुई चुनौतियां

इस शिशु का जन्म 7 जुलाई 2026 को हुआ था। पैदायश के साथ ही उसे गंभीर सांस संबंधी दिक्कतें घेर चुकी थीं, जिसके चलते उसे फौरन ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखना पड़ा। इसके अलावा शुरुआती दिनों में उसे पीलिया की शिकायत भी हुई जिसका समय पर इलाज किया गया। डॉक्टरों ने जन्म के तुरंत बाद से ही उसे मां का दूध पिलाना शुरू कर दिया था और सातवें दिन तक आते-आते बच्चा पूरी तरह से मां का दूध पीने में सक्षम हो गया था। इस पूरे लंबे और खर्चीले इलाज का पूरा खर्च मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना के जरिए पूरी तरह निःशुल्क उठाया गया। डॉक्टरों का यह भी कहना है कि इस कठिन सफर में परिवार का अटूट धैर्य, डॉक्टरों पर भरोसा और आपसी सहयोग ने भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई। पांच बार जानलेवा संकट, वेंटिलेटर का लंबा दौर और गंभीर संक्रमण को मात देकर इस बच्चे का स्वस्थ होकर घर लौटना पीबीएम अस्पताल की एनआईसीयू टीम के समर्पण और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की एक ऐतिहासिक सफलता है।

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बार-बार सांस रुकने से पैदा हुआ गंभीर संकट

अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान 28 जुलाई का दिन सबसे डरावना रहा जब अचानक बच्चे की तबीयत तेजी से बिगड़ गई। उसकी सांसें और हृदय गति रुकने की खतरनाक स्थिति पैदा हो गई, जिस पर फौरन एक्शन लेते हुए डॉक्टरों ने सीपीआर प्रक्रिया शुरू की और उसे वापस वेंटिलेटर पर शिफ्ट किया। उपचार की इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम पांच बार ऐसी आपदा आई, लेकिन हर बार एनआईसीयू की टीम की मुस्तैदी ने उसकी जान बचा ली। पहली दफा उसे लगातार 14 दिनों तक वेंटिलेटर के सहारे पर रहना पड़ा। कुछ समय बीतने के बाद जब उसे दोबारा सांस लेने में दिक्कत महसूस हुई तो फिर से वेंटिलेटर की शरण लेनी पड़ी। आखिरकार 25 अगस्त का वह राहत भरा दिन आया जब उसे सफलतापूर्वक वेंटिलेटर से हटा लिया गया। कुछ दिनों तक अतिरिक्त ऑक्सीजन दिए जाने के बाद वह बिना किसी बाहरी मदद के पूरी तरह सामान्य तरीके से सांस लेने लगा।

खतरनाक बैक्टीरिया और अन्य जटिलताओं से मुकाबला

इलाज का यह सफर यहीं नहीं थमा क्योंकि शिशु को एक बेहद गंभीर और जिद्दी संक्रमण ने भी अपनी चपेट में ले लिया था। मेडिकल जांच के दौरान उसके शरीर में एमडीआर क्लेबसिएला नाम का बैक्टीरिया पाया गया, जिस पर आम तौर पर चलने वाली कई एंटीबायोटिक दवाइयां पूरी तरह बेअसर साबित हो रही थीं। रिपोर्ट के नतीजों को देखते हुए डॉक्टरों ने तुरंत एंटीबायोटिक दवाओं के कॉम्बिनेशन में बदलाव किया और उपचार को जारी रखा। इस कठिन दौर में बच्चे के फेफड़ों से रक्तस्राव होने, प्लेटलेट्स में भारी गिरावट आने और शरीर में पोटैशियम का स्तर नीचे लुढ़कने जैसी कई जानलेवा समस्याएं भी सामने खड़ी हो गईं। हालात की नजाकत को भांपते हुए उसे जरूरत के हिसाब से रक्त और उसके विभिन्न घटक चढ़ाए गए। जब उसकी सेहत में सुधार के संकेत मिलने लगे तो उसे मां की गोद की गर्मी देने वाली कंगारू मदर केयर थेरेपी दी गई और उसने धीरे-धीरे खुद से दूध पीना भी शुरू कर दिया।

स्वस्थ होकर घर लौटा नौनिहाल

अस्पताल से डिस्चार्ज किए जाने के वक्त इस प्रीमैच्योर बच्चे का वजन बढ़कर 1.55 किलोग्राम तक पहुंच चुका था। उसकी लंबाई 41 सेंटीमीटर से बढ़कर 44 सेंटीमीटर हो गई थी और सिर की गोलाई का दायरा भी 26 सेंटीमीटर से बढ़कर 29 सेंटीमीटर रिकॉर्ड किया गया। अब वह किसी भी प्रकार की बाहरी ऑक्सीजन के बिना पूरी तरह सामान्य ढंग से सांस ले रहा था और मां का दूध भी खुद अपनी ताकत से पी रहा था। उसकी आंखों की जांच बिल्कुल सामान्य पाई गई है, जबकि सुनने की क्षमता की एकदम बारीकी से जांच करने के लिए बेरा टेस्ट करवाने की सलाह दी गई है। चिकित्सकों ने परिवार को घर जाने के बाद भी नियमित जांच करवाने और लगातार फॉलोअप में रहने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं।

सवाल-जवाब

बच्चे का जन्म कब और कहां हुआ था?
बच्चे का जन्म 7 जुलाई 2026 को बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में हुआ था।
जन्म के समय बच्चे का वजन कितना था?
जन्म के समय प्रीमैच्योर शिशु का वजन मात्र 1.20 किलोग्राम था।
अस्पताल से छुट्टी के समय बच्चे का वजन कितना हो गया था?
अस्पताल से छुट्टी मिलते वक्त बच्चे का वजन बढ़कर 1.55 किलोग्राम हो गया था।
इलाज का खर्च किस योजना के तहत उठाया गया?
पूरा चिकित्सीय उपचार मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना के अंतर्गत निःशुल्क किया गया।
बच्चे को अस्पताल से कब छुट्टी मिली?
जीवन के 58वें दिन बच्चे को पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद अस्पताल से घर भेज दिया गया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 1

Rohan Verma@rohan-verma·20 दिन पहले

सरकारी अस्पतालों के एनआईसीयू में आधुनिक चिकित्सा और आयुष्मान जैसी योजनाओं का ऐसा प्रभावी संयोजन ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए संजीवनी बन रहा है। इस मामले में पांच बार सांस रुकने के बाद भी डॉक्टरों की मुस्तैदी और एमडीआर क्लेबसिएला जैसे खतरनाक बैक्टीरिया से पार पाना यह साबित करता है कि अब टियर-2 शहरों के सरकारी संस्थानों में भी उच्च स्तरीय क्रिटिकल केयर उपलब्ध होने लगी है, बशर्ते समय पर सही मेडिकल प्रोटोकॉल लागू किया जाए।

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