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बीकानेर महापौर चुनाव: कांग्रेस ने सुलझाया बागी का संकट, अब बीजेपी से होगी सीधी टक्करराजस्थान
18 सित॰ 2026, 5:31 pm (7 दिन पहले)· 2

बीकानेर महापौर चुनाव: कांग्रेस ने सुलझाया बागी का संकट, अब बीजेपी से होगी सीधी टक्कर

बीकानेर नगर निगम चुनाव में बागी उम्मीदवार नवरतन डागा द्वारा नामांकन वापस लेने के बाद कांग्रेस ने राहत की सांस ली है, जिससे अब मेयर पद के लिए बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला तय हो गया है।

बीकानेर नगर निगम के महापौर चुनाव में नामांकन वापस लेने के आखिरी दिन कांग्रेस पार्टी के लिए बहुत बड़ी राहत की खबर आई है। पार्टी से बगावत करके निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल करने वाले पार्षद नवरतन डागा ने आखिरकार अपना पर्चा वापस ले लिया है। इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम के बाद अब बीकानेर महापौर पद के लिए कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा और कड़ा मुकाबला होना तय हो गया है। राजस्थान के कुल 10 नगर निगमों में से बीकानेर एकमात्र ऐसा नगर निगम है जहां कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला है। इसके बावजूद, नामांकन के दिन कांग्रेस के आधिकारिक प्रत्याशी अनिल कल्ला के सामने अपनी ही पार्टी के पार्षद नवरतन डागा के खड़े होने से पार्टी नेतृत्व में खलबली मच गई थी। कयास लगाए जा रहे थे कि कांग्रेस की यह आंतरिक गुटबाजी महापौर चुनाव का पूरा खेल बिगाड़ सकती है, लेकिन अब डागा के हटने से इस खतरे की आशंका बेहद कम हो गई है। हालांकि, बीजेपी अब भी पूरे आत्मविश्वास के साथ यह दावा कर रही है कि नगर निगम का बोर्ड वही बनाएगी।

बागी का मान-मनौव्वल और पार्टी के भीतर का घटनाक्रम

बीकानेर में नवरतन डागा द्वारा बागी तेवर दिखाते हुए नामांकन दाखिल करने के तुरंत बाद ही कांग्रेस पार्टी हरकत में आ गई थी। पार्टी नेतृत्व ने अपने सभी नवनिर्वाचित पार्षदों को एकजुट रखने और डैमेज कंट्रोल करने की कोशिशें तेज कर दी थीं। शुरुआत में नवरतन डागा अपने फैसले पर अड़े रहे और मानने को तैयार नहीं हुए। आखिरकार, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा से आमने-सामने की मुलाकात और लंबी बातचीत के बाद डागा ने अपना नामांकन वापस लेने पर सहमति जताई। अपना पर्चा वापस लेने के बाद डागा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने केवल अपनी बात को लोकतांत्रिक तरीके से सबके सामने रखने के लिए नामांकन दाखिल किया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे कांग्रेस के एक सच्चे सिपाही हैं और जब पार्टी के सभी लोगों ने मिलकर अनिल कल्ला को अपना उम्मीदवार चुना है, तो वे भी इस फैसले के साथ खड़े हैं। डागा ने कहा कि उनकी लड़ाई केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर थी, जिसकी सराहना खुद प्रदेश अध्यक्ष ने भी की है। आपको बता दें कि कांग्रेस के घोषित प्रत्याशी अनिल कल्ला, राजस्थान सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. बीडी कल्ला के सगे भतीजे हैं।

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परिवारवाद के आरोपों पर पूर्व मंत्री का पलटवार

बागी प्रत्याशी के मान जाने पर राहत महसूस कर रहे पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. बीडी कल्ला ने नवरतन डागा के इस कदम का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि डागा ने पार्टी की एकजुटता और हित में अपना नामांकन वापस लिया है, जिसके लिए पूरी पार्टी उनकी आभारी है। वहीं, अनिल कल्ला को टिकट दिए जाने पर लग रहे परिवारवाद के आरोपों पर डॉ. बीडी कल्ला ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि वे पिछले 50 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं और आज तक उनके अपने घर से कोई भी सदस्य राजनीतिक रूप से आगे नहीं आया है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि परिवार का कोई योग्य सदस्य अपनी मेहनत से चुनाव लड़ता है, तो इसे परिवारवाद कैसे कहा जा सकता है? उन्होंने बीजेपी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि विरोधी दल में भी ऐसे कई परिवार हैं जिनके कई सदस्य चुनाव लड़ते हैं। इस बीच, कांग्रेस के देहात जिला अध्यक्ष बिसनाराम सिहाग ने भी बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि पूरी कांग्रेस पार्टी इस समय पूरी तरह एकजुट है और नगर निगम चुनाव में पार्टी का मेयर कम से कम 50 मतों के साथ शानदार जीत दर्ज करेगा।

बीकानेर का चुनावी गणित और सीटों का समीकरण

बागी उम्मीदवार के मैदान से हटने के बाद अब बीकानेर मेयर चुनाव की जंग सीधे तौर पर कांग्रेस के अनिल कल्ला और बीजेपी के उम्मीदवार सुरेंद्र सिंह शेखावत के बीच सिमट गई है। हालांकि, बीजेपी भी शांत नहीं बैठी है और वह कांग्रेस के खेमे में सेंध लगाने के लिए हर संभव राजनीतिक रणनीति अपना रही है। बीजेपी नेताओं को पूरा भरोसा है कि वे निर्दलीय पार्षदों की मदद से अपना बोर्ड बनाने में सफल रहेंगे। अगर बीकानेर नगर निगम के सभी 80 वार्डों के गणित पर नजर डालें, तो कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत मौजूद है। कांग्रेस ने यहां कुल 42 सीटों पर जीत हासिल की है, जो बहुमत के आंकड़े से एक अधिक है। दूसरी तरफ, बीजेपी के पास केवल 27 सीटें हैं। इन दोनों के अलावा सदन में 10 निर्दलीय पार्षद और 1 पार्षद आरएलपी का जीतकर आया है। कांग्रेस का दावा है कि उसके पास अपने 42 पार्षदों के अलावा 5 निर्दलीय पार्षदों का भी पूरा समर्थन हासिल है, जिससे उनकी स्थिति बेहद मजबूत हो जाती है।

बीजेपी की रणनीति और राजस्थान का सियासी माहौल

कम सीटें होने के बावजूद बीजेपी क्रॉस वोटिंग और निर्दलीय पार्षदों के समर्थन के दम पर जीत हासिल करने का दावा लगातार कर रही है। इस सियासी घमासान का अंतिम फैसला आगामी 21 सितंबर को होगा, जब मेयर पद के लिए मतदान कराया जाएगा। उसी दिन यह साफ हो जाएगा कि बीकानेर का नया महापौर कौन बनेगा। क्या कांग्रेस अपने इस इकलौते गढ़ को बहुमत के दम पर बचाने में कामयाब रहेगी, या फिर बीजेपी अपनी रणनीतिक तोड़फोड़ की राजनीति से कांग्रेस के मुंह से जीत का निवाला छीन लेगी। उल्लेखनीय है कि बीकानेर नगर निगम पर पिछले 10 वर्षों से बीजेपी का ही कब्जा रहा है, इसलिए वह इस गढ़ को आसानी से नहीं छोड़ना चाहती। राजस्थान के कुल 309 स्थानीय निकायों में से बीजेपी ने अब तक 25 पर अपना कब्जा जमा लिया है। भीलवाड़ा और भरतपुर नगर निगम के महापौर पदों के साथ-साथ बीजेपी ने राज्य के 23 अन्य निकायों में निर्विरोध जीत हासिल की है। विशेष रूप से, सीएम भजनलाल के गृह जिले भरतपुर और उसके पास के डीग जिले के सभी निकायों में बीजेपी ने एकतरफा जीत दर्ज की है, जहां सभी निकाय प्रमुख निर्विरोध चुने गए हैं।

सवाल-जवाब

बीकानेर नगर निगम महापौर चुनाव के लिए मतदान कब होगा?
बीकानेर नगर निगम महापौर पद के लिए मतदान आगामी 21 सितंबर को होना निर्धारित किया गया है।
कांग्रेस और बीजेपी की तरफ से महापौर पद के उम्मीदवार कौन हैं?
कांग्रेस की तरफ से अनिल कल्ला और बीजेपी की तरफ से सुरेंद्र सिंह शेखावत महापौर पद के मुख्य उम्मीदवार हैं।
नवरतन डागा ने अपना नामांकन क्यों वापस ले लिया?
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा से मुलाकात के बाद नवरतन डागा ने अपनी नाराजगी दूर कर पार्टी उम्मीदवार के समर्थन में नामांकन वापस लिया।
बीकानेर नगर निगम में बहुमत का आंकड़ा क्या है और किस पार्टी के पास कितनी सीटें हैं?
कुल 80 वार्डों वाले इस निगम में बहुमत का आंकड़ा 41 है। कांग्रेस के पास 42 सीटें, बीजेपी के पास 27 सीटें, निर्दलीयों के पास 10 सीटें और RLP के पास 1 सीट है।
बीकानेर नगर निगम पर पिछले कितने वर्षों से बीजेपी का कब्जा रहा है?
बीकानेर नगर निगम पर पिछले 10 वर्षों से लगातार बीजेपी का शासन रहा है।
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टिप्पणियाँ 5

Sandeep Yadav@sandeep-yadav·5 दिन पहले

संदीप यादव: भले ही खेल और राजनीति दो अलग दुनिया हैं, पर चुनाव प्रबंधन में भी 'टीम यूनिटी' उतनी ही अहम है जितनी मैदान पर। बीकानेर में बागी नवरतन डागा के हटने से कांग्रेस की अंदरूनी फूट का खतरा टला है, लेकिन स्पष्ट बहुमत वाली इस इकलौती सीट पर अब बीजेपी की फ्लोर मैनेजमेंट की रणनीति और जोड़-तोड़ पर सबकी नजर रहेगी। मुकाबला बेहद कड़ा होगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

बीकानेर में बागी का हटना कांग्रेस के लिए फौरी राहत ज़रूर है, लेकिन राजस्थान के एकमात्र बहुमत वाले निगम में जीत के लिए अंदरूनी कलوه को पूरी तरह शांत करना ज़रूरी होगा। पूर्व मंत्री के भतीजे को टिकट मिलने से जो परिवारवाद के आरोप लगे हैं, वे चुनावी बहस का अहम हिस्सा रहेंगे। बीजेपी इस कमज़ोरी को भुनाने की पूरी कोशिश करेगी।

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

बीकानेर में बागी संकट टलने के बाद अब मुकाबला पूरी तरह रणनीतिक हो गया है। हालांकि कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत का संख्याबल है, लेकिन परिवारवाद के आरोपों और आंतरिक असंतोष के बीच मतदान के दिन क्रॉस-वॉटिंग का जोखिम बना रहेगा। बीजेपी इस मनोवैज्ञानिक बढ़त को भुनाने का प्रयास करेगी, जिससे यह चुनाव केवल आंकड़ों का नहीं बल्कि प्रबंधन का खेल बन गया है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 दिन पहले

बीकानेर महापौर चुनाव में अब सीधा मुकाबला होने से राजनीतिक गर्माहट बढ़ेगी। एक अपराध संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि इस तरह के कड़े और सीधे मुकाबलों में अक्सर खरीद-फरोख्त और पार्षदों को प्रभावित करने के प्रयास बढ़ जाते हैं। ऐसे में स्थानीय पुलिस और निर्वाचन प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अत्यधिक सतर्क रहना होगा। मतदान और परिणाम के दौरान किसी भी संभावित गुटीय हिंसा या तनाव को रोकने के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम और आदर्श आचार संहिता का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना पुलिस विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।

Rohan Verma@rohan-verma·6 दिन पहले

करण की बात बिल्कुल सही है। क्षेत्रीय राजनीति और शासन के दृष्टिकोण से देखें तो स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद कांग्रेस में हुई यह बगावत स्थानीय स्तर पर सांगठनिक गुटबाजी को उजागर करती है। सीधे मुकाबले में अब हर एक वोट का मूल्य बहुत बढ़ गया है, जिससे क्रॉस-वोटिंग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में चुनाव प्रक्रिया की शुचिता और निष्पक्षता बनाए रखना स्थानीय प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। यह मुकाबला केवल मेयर सीट जीतने का नहीं, बल्कि भविष्य में एक स्थिर नगर निगम बोर्ड देने की प्रशासनिक और राजनीतिक साख का भी है।

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