वर्ष 2013 के चर्चित यौन उत्पीड़न मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने तहलका पत्रिका के पूर्व प्रधान संपादक तरुण तेजपाल को दोषी करार देते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने उन पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। उच्च न्यायालय का यह फैसला गोवा की निचली अदालत के मई 2021 वाले आदेश को पूरी तरह पलट देता है, जिसमें उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था। हालांकि, फैसला सुनाए जाने के तुरंत बाद पुलिस ने उन्हें अदालत कक्ष से हिरासत में नहीं लिया और वे अपने घर लौट गए। इस स्थिति ने कानूनी प्रक्रियाओं और सजा के क्रियान्वयन को लेकर कई अहम सवाल खड़े किए हैं कि आखिर गंभीर सजा मिलने के बाद भी कोई दोषी तुरंत सलाखों के पीछे क्यों नहीं भेजा जाता।
सजा के बाद भी तुरंत हिरासत में न लेने की कानूनी वजह
अदालती कार्यवाही के दौरान जब किसी व्यक्ति को दोषी ठहराया जाता है, तो उसकी तात्कालिक स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि वह पहले से जेल में था या जमानत पर बाहर था। तरुण तेजपाल के मामले में, गोवा की ट्रायल कोर्ट ने मई 2021 में उन्हें बरी कर दिया था, जिसके बाद से वे स्वतंत्र थे। राज्य सरकार ने इस बरी किए जाने के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, यदि कोई आरोपी अपील की सुनवाई के दौरान जमानत पर या बरी होने के बाद आजाद है और अपीलीय अदालत निचली अदालत का फैसला पलटकर उसे दोषी ठहराती है, तो अदालत के पास दो कानूनी विकल्प होते हैं। न्यायालय या तो दोषी को तुरंत हिरासत में लेकर जेल भेज सकता है या फिर उसे एक निश्चित समयावधि के भीतर संबंधित अदालत या जेल के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दे सकता है।
उच्च न्यायालय ने इस मामले में दूसरा विकल्प चुना और उन्हें एक निर्धारित समय सीमा के भीतर खुद आत्मसमर्पण करने की मोहलत दी। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार की राहत का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि 10 साल की सजा पर कोई स्थायी रोक लग गई है या उनकी दोषसिद्धि रद्द हो गई है। यह केवल एक अंतरिम व्यवस्था है जो दोषी को कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करने और ऊपरी अदालत में जाने का अवसर प्रदान करती है।
आत्मसमर्पण के लिए मिली समयावधि और सितंबर की समय सीमा
अदालत के लिखित आदेश के अनुसार प्रारंभिक तौर पर उच्च न्यायालय ने तरुण तेजपाल को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। फैसले के बाद उनके कानूनी प्रतिनिधि ने अदालत से गुहार लगाई कि उन्हें कानूनी तैयारी के लिए कुछ अतिरिक्त समय दिया जाए। इस प्रार्थना को स्वीकार करते हुए पीठ ने आत्मसमर्पण की अवधि को बढ़ाकर चार सप्ताह कर दिया। इस समयावधि का सीधा अर्थ यह है कि यदि शीर्ष अदालत से इससे पूर्व कोई स्थगनादेश या राहत नहीं मिलती है, तो उन्हें लगभग सितंबर के प्रथम सप्ताह तक संबंधित जेल या अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा। अंतिम तिथि और शर्तें उच्च न्यायालय के आधिकारिक लिखित आदेश के आधार पर ही प्रभावी मानी जाएंगी।
उच्च न्यायालय द्वारा आत्मसमर्पण का समय देने का मुख्य उद्देश्य
फौजदारी मामलों में अपीलीय अदालतों द्वारा आत्मसमर्पण के लिए समय दिए जाने का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि दोषी व्यक्ति को देश की सर्वोच्च अदालत में अपनी सजा और दोषसिद्धि को चुनौती देने का उचित अवसर मिल सके। भारत के संविधान के तहत तरुण तेजपाल को उच्च न्यायालय के इस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने के लिए एक तय कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होता है।
इस प्रक्रिया के अंतर्गत दोषी पक्ष को सबसे पहले उच्च न्यायालय के विस्तृत निर्णय की प्रमाणित प्रति प्राप्त करनी होती है। इसके पश्चात उनके वकीलों को विशेष अनुमति याचिका यानी SLP तैयार करनी होती है। याचिका में उच्च न्यायालय द्वारा दोषी ठहराए जाने के आधारों को कानूनी और तथ्यात्मक रूप से चुनौती दी जाती है। इसके साथ ही, सजा के क्रियान्वयन पर रोक लगाने या उसे निलंबित करने के लिए एक अलग आवेदन दाखिल किया जाता है और मामले की शीघ्र सुनवाई की मांग की जाती है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका को स्वीकार कर लेता है और सजा पर रोक लगा देता है, तभी उनकी गिरफ्तारी टल सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की प्रक्रिया और SLP के मायने
उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की जाने वाली स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) स्वतः सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं होती। SLP दायर करने और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उस पर विचार करने के बीच स्पष्ट अंतर होता है। दोषी पक्ष को सर्वप्रथम शीर्ष अदालत को इस बात के लिए सहमत करना होता है कि मामला सुनवाई योग्य है। सुप्रीम कोर्ट मुख्य रूप से यह परीक्षण करता है कि क्या उच्च न्यायालय के फैसले में कोई गंभीर कानूनी त्रुटि, साक्ष्यों के गलत मूल्यांकन की समस्या या संवैधानिक प्रश्न निहित है जिसकी समीक्षा आवश्यक है। यदि सर्वोच्च न्यायालय को लगता है कि फैसले में प्रक्रियात्मक या कानूनी कमियां हैं, तभी वह याचिका पर सुनवाई मंजूर करता है और अंतरिम राहत प्रदान करता है।
उच्च न्यायालय द्वारा दोषी ठहराए जाने के मुख्य आधार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में पीड़िता के बयानों और प्रस्तुत साक्ष्यों का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया। अदालत ने पीड़िता के बयान को पूरी तरह से विश्वसनीय और सुसंगत माना। इसके अतिरिक्त, उच्च न्यायालय ने घटना के बाद तरुण तेजपाल द्वारा भेजे गए ईमेल संदेशों को महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया। इन ईमेल में कथित रूप से अपने गलत आचरण के लिए माफी मांगने और घटना स्वीकार करने की बातें सामने आई थीं। अदालत ने यह भी पाया कि होटल के CCTV फुटेज से घटनाक्रम की समय सारिणी की पुष्टि होती है।
इसके अलावा, उच्च न्यायालय ने यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़िता के व्यवहार को लेकर निचली अदालत के दृष्टिकोण की कड़ी आलोचना की। अदालत ने स्पष्ट किया कि यौन अपराध की शिकार महिला से किसी पारंपरिक या 'आदर्श' व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अदालत ने इस महत्वपूर्ण तथ्य पर भी बल दिया कि घटना के समय तरुण तेजपाल पीड़िता के वरिष्ठ अधिकारी थे और संस्थान में एक अत्यधिक प्रभावशाली पद पर आसीन थे।
2021 में निचली अदालत का फैसला और राज्य सरकार की अपील
गोवा की सत्र अदालत ने मई 2021 में तरुण तेजपाल को मामले के सभी आरोपों से बरी कर दिया था। उस समय निचली अदालत ने पीड़िता के बयानों, CCTV फुटेज और अन्य प्रस्तुत साक्ष्यों में कुछ विरोधाभासों का हवाला देते हुए संदेह का लाभ दिया था। हालांकि, गोवा राज्य सरकार ने इस फैसले को त्रुटिपूर्ण बताते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। राज्य सरकार का मुख्य तर्क यह था कि सत्र अदालत ने पीड़िता के चरित्र और उसके पिछले आचरण पर अनावश्यक ध्यान केंद्रित किया तथा जिरह के दौरान अनुचित प्रश्नों की अनुमति दी। इसके साथ ही इलेक्ट्रॉनिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का गलत आकलन किया गया। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की इन दलीलों को स्वीकार करते हुए बरी करने के आदेश को रद्द कर दिया और दोषसिद्धि का निर्णय सुनाया।



















