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बंगाल में सियासी घमासान के बीच ममता बनर्जी के गुट का संकट गहराया, विपक्षी खेमे में बढ़ी हलचलभारत
20 सित॰ 2026, 11:53 pm (36 मिनट पहले)· 0

बंगाल में सियासी घमासान के बीच ममता बनर्जी के गुट का संकट गहराया, विपक्षी खेमे में बढ़ी हलचल

तृणमूल कांग्रेस के नाम और निशान पर चुनाव आयोग की रोक के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है, जबकि विपक्षी गठबंधन में भविष्य के चुनावों को लेकर नई बेचैनी देखने को मिल रही है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए हालिया बदलावों ने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन के आंतरिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस में पैदा हुए आंतरिक मतभेदों और कानूनी लड़ाइयों ने न केवल पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को प्रभावित किया है, बल्कि देश की राजधानी तक इसके असर को महसूस किया जा रहा है। नंदीग्राम उपचुनाव से पहले प्रत्याशी के पीछे हटने और पार्टी के नाम व चुनाव चिह्न पर लगी रोक के बाद अब इस पूरे प्रकरण की गूंज देश की शीर्ष अदालत तक पहुंच चुकी है।

सांसदों की बगावत और शक्ति संतुलन का बदलता गणित

जून 2026 में पश्चिम बंगाल की सियासत में उस वक्त बड़ा मोड़ आया जब तृणमूल कांग्रेस के लगभग 20 लोकसभा सांसदों ने संगठन की पारंपरिक कार्यशैली से अलग रुख अख्तियार कर लिया। इन सांसदों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को समर्थन देने की मंशा जाहिर की और अपने रुख की औपचारिक जानकारी लोकसभा अध्यक्ष को दी। राष्ट्रीय राजनीति में किसी भी क्षेत्रीय पार्टी की अहमियत संसद में उसके संख्याबल से तय होती है, और एक साथ इतने सांसदों के अलग रास्ते पर जाने से संगठन की स्थिति पर व्यापक असर पड़ा।

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यह राजनीतिक घटनाक्रम यहीं नहीं रुका। तृणमूल कांग्रेस से अलग होने वाले इन 20 बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई का गठन कर लिया। इसके बाद सितंबर के महीने में इन नेताओं में से कुछ के भारतीय जनता पार्टी के साथ जाने की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में शुरू हो गईं। पश्चिम बंगाल में शक्ति संतुलन को लेकर चल रही इन गतिविधियों के बीच आगामी दुर्गा पूजा के मौके को लेकर भी नई अटकलें सामने आ रही हैं।

दुर्गा पूजा और कोलकाता में भावी राजनीतिक कार्यक्रम

पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने के घटनाक्रम के पश्चात जून में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य का दो दिवसीय दौरा किया था। अब दुर्गा पूजा के उत्सव के दौरान उनके पुनः बंगाल प्रवास की संभावनाएं सामने आ रही हैं। इस सिलसिले में कोलकाता के प्रसिद्ध ईडन गार्डन्स में कार्यक्रम की तैयारियों और स्थल बुकिंग की खबरें चर्चा में हैं। इस प्रस्तावित आयोजन में तृणमूल कांग्रेस के बागी 20 सांसदों के सम्मिलित होने की संभावना जताई जा रही है, जिसे राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

ममता बनर्जी लंबे समय तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री रहीं और उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति के प्रमुख चेहरों में अपनी जगह बनाई। हालांकि, संगठनात्मक अलगाव के बाद अब उनकी पार्टी के सामने अपने वैधानिक अस्तित्व को बनाए रखने की एक नई चुनौती खड़ी हो गई है।

नाम और निशान की जंग पहुंची सुप्रीम कोर्ट

चुनाव आयोग ने 6 अक्टूबर को निर्धारित उपचुनावों से पहले पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। इस निर्णय के विरोध में ममता बनर्जी के समर्थक गुट ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। न्यायालय में कुल दो याचिकाएं प्रस्तुत की गई हैं, जिनमें पार्टी के अस्तित्व से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दों को उठाया गया है।

पहली याचिका में चुनाव आयोग द्वारा उनके गुट को एआईटीएमसी नाम तथा पार्टी का मूल चुनाव चिह्न आवंटित करने से इनकार किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है। वहीं दूसरी याचिका पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित उस मामले से जुड़ी है, जिसमें 10 बागी विधायकों की अयोग्यता पर निर्णय लेने में हो रहे विलंब पर सवाल उठाया गया है। इन दोनों मामलों पर न्यायालय का रुख राज्य के उपचुनावों के साथ-साथ पार्टी के भविष्य के लिए भी निर्णायक साबित हो सकता है।

क्षेत्रीय दलों की गोलबंदी और विपक्षी समीकरण

बंगाल में उत्पन्न हुए इस गतिरोध के बीच विपक्षी दलों के भीतर भी समानांतर संवाद शुरू हो गया है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके की सांसद कनिमोझी ने कई प्रमुख क्षेत्रीय नेताओं से औपचारिक व अनौपचारिक मुलाकातें की हैं। इस क्रम में उन्होंने सबसे पहले महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे से संवाद किया। इसके बाद शरद पवार और सुप्रिया सुले से बातचीत हुई, और फिर ममता बनर्जी के साथ भी विचार-विमर्श हुआ।

इन निरंतर वार्ताओं के सामने आने के बाद कांग्रेस की प्रत्यक्ष भागीदारी के बिना एक स्वतंत्र क्षेत्रीय मोर्चे की संभावनाओं पर बहस छिड़ गई है। महाराष्ट्र में पहले उद्धव ठाकरे के गुट में हुए विभाजन और अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सामने खड़ी परिस्थितियों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय दलों की ताकत को किस प्रकार एकजुट रखा जाएगा। संख्याबल जुटाने से ज्यादा बड़ी चुनौती उस संख्याबल को सुरक्षित रखने की बन गई है।

राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल के लिए नई चुनौतियां

तृणमूल कांग्रेस के अंदरूनी संकट और उपचुनाव के मैदान से प्रत्याशी के हटने के बाद राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल द्वारा चुनाव आयोग तथा सत्तारूढ़ दल की भूमिका पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक इस सक्रियता को भविष्य के चुनावी इम्तिहानों से जोड़कर देख रहे हैं। विशेषकर वर्ष 2027 में होने वाले दो बड़े राज्यों के विधानसभा चुनाव दोनों नेताओं के लिए बेहद संवेदनशील माने जा रहे हैं।

वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, जो देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है। यहां कांग्रेस पार्टी के सामने अपने पिछले प्रदर्शन को बेहतर करने और अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने का कड़ा लक्ष्य है। दूसरी तरफ उसी वर्ष पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की सरकार है और उनके सामने अपने शासन को बरकरार रखने की चुनौती होगी। कांग्रेस पार्टी का अपना इतिहास भी संगठनात्मक टूट और नए क्षेत्रीय दलों के उदय से जुड़ा रहा है, क्योंकि स्वयं ममता बनर्जी ने भी अतीत में कांग्रेस से अलग होकर ही अपनी नई राजनीतिक राह तैयार की थी। ऐसे में मौजूदा हालात विपक्षी दलों के भीतर भविष्य की असुरक्षा को और गहरा कर रहे हैं।

सवाल-जवाब

ममता बनर्जी गुट ने सुप्रीम कोर्ट में क्या मांग की है?
उन्होंने चुनाव आयोग द्वारा एआईटीएमसी नाम और मूल चुनाव चिह्न पर लगाई गई रोक को हटाने तथा 10 बागी विधायकों की अयोग्यता पर त्वरित निर्णय लेने की मांग की है।
तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने किस नए संगठन का गठन किया?
पार्टी से अलग हुए लगभग 20 बागी लोकसभा सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई का गठन किया है।
पश्चिम बंगाल में उपचुनाव किस तारीख को होने वाले हैं?
पश्चिम बंगाल में विधानसभा उपचुनाव 6 अक्टूबर को निर्धारित हैं।
दुर्गा पूजा के दौरान ईडन गार्डन्स में किस संभावित कार्यक्रम की चर्चा है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संभावित दौरे और ईडन गार्डन्स में होने वाले कार्यक्रम में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के भाग लेने की संभावना है।
कनिमोझी किन नेताओं से मुलाकात कर रही हैं?
डीएमके नेता कनिमोझी ने उद्धव ठाकरे, शरद पवार, सुप्रिया सुले और ममता बनर्जी से मुलाकात कर नए क्षेत्रीय समीकरणों पर चर्चा की है।
साल 2027 में किन दो प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं?
वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं, जो विपक्षी दलों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·3 मिनट पहले

पश्चिम बंगाल की इस राजनीतिक उठापटक का असर केवल एक क्षेत्रीय दल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय विपक्षी गठबंधन के रणनीतिक समीकरणों को भी सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है। चुनाव आयोग द्वारा पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर रोक के बाद कानूनी लड़ाई का सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना और 20 सांसदों का बागी होकर एनसीपीआई का गठन करना यह दर्शाता है कि क्षेत्रीय राजनीति में संख्याबल और वैधानिक पहचान ही सबसे बड़ा आधार होती है। आगामी दुर्गा पूजा के दौरान ईडन गार्डन्स में प्रस्तावित कार्यक्रम और बागी सांसदों की संभावित उपस्थिति से राज्य का शक्ति संतुलन और अधिक जटिल हो सकता है, जिससे आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति में भी इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·3 मिनट पहले

पश्चिम बंगाल के इस राजनीतिक घटनाक्रम ने राष्ट्रीय विपक्ष की उस कमजोरी को उजागर कर दिया है जहाँ वैचारिक एकता से अधिक संख्याबल और वैधानिक पहचान मायने रखती है। तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों के बगावत कर एनसीपीआई बनाने और चुनाव आयोग द्वारा पार्टी के नाम व निशान पर रोक लगाने के बाद, यह कानूनी और राजनीतिक संकट सीधे सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है। आगामी दुर्गा पूजा के दौरान ईडन गार्डन्स में संभावित राजनीतिक आयोजनों से राज्य का शक्ति संतुलन और अधिक जटिल होगा, जिसके दूरगामी परिणाम राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेंगे।

Rohan Verma@rohan-verma·7 मिनट पहले

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर सांसदों की बगावत, एनसीपीआई का गठन और चुनाव आयोग द्वारा नाम-निशान पर रोक जैसे घटनाक्रम सिर्फ एक क्षेत्रीय पार्टी का संकट नहीं हैं। संसद में संख्याबल घटने से विपक्षी गठबंधन के राष्ट्रीय समीकरण भी प्रभावित होंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले और आगामी राजनीतिक आयोजनों से राज्य की राजनीति में नए गठजोड़ तय होंगे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·7 मिनट पहले

यह कानूनी और संगठनात्मक संकट केवल चुनाव आयोग के आदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े दल-बदल और कानूनी दांव-पेच आने वाले दिनों में आपराधिक-राजनीतिक गठजोड़ और विधायी विशेषाधिकारों की नई बहस को जन्म दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस कानूनी जंग के नतीजे तय करेंगे कि दलबदल कानून के तहत इन बागी सांसदों की स्थिति क्या होगी और राज्य की कानून-व्यवस्था व राजनीतिक स्थिरता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।

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