भारत को स्वतंत्रता मिले 79 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित छाता क्षेत्र के किसानों और पूर्व सैनिकों के लिए आर्थिक आजादी का सपना अब भी अधूरा बना हुआ है। देश जब आजादी का जश्न मना रहा था, तब छाता विधानसभा क्षेत्र के किसान और पूर्व सैनिक अपनी पुरानी बंद पड़ी चीनी मिल के बाहर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठने को मजबूर थे। एक ओर जहां पूरे देश में उत्सव का माहौल था, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय किसान और भूतपूर्व सैनिक छाता शुगर मिल की चिमनियों से दोबारा धुआं उठते देखने की जिद पर अड़े रहे। कई दशकों से ताले में बंद इस औद्योगिक इकाई को पुनर्जीवित करने की मांग अब एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले चुकी है।
दीपक शर्मा का 'चाबी कहां है' सत्याग्रह और बढ़ता जनसमर्थन
इस आंदोलन की शुरुआत 9 अगस्त 2026 को हुई, जब वृंदावन निवासी दीपक शर्मा नाम के एक युवक ने छाता तहसील की बंद पड़ी प्रसिद्ध शुगर मिल को दोबारा चालू कराने का संकल्प लिया। दीपक शर्मा मिल के मुख्य द्वार पर पहुंचे और 'चाबी कहां है' के सांकेतिक नारे के साथ धरने पर बैठ गए। शुरुआती दो दिनों तक यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन जैसे-जैसे इस कदम की जानकारी आस-पास के गांवों में फैली, लोगों का समर्थन मिलना शुरू हो गया। क्षेत्र के किसानों, मजदूरों और ग्रामीणों का सैलाब धीरे-धीरे धरना स्थल पर उमड़ने लगा, जिससे बंद पड़ी मिल का मुद्दा एक बार फिर क्षेत्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया।
तीसरे दिन की हिंसा और कैबिनेट मंत्री पर गंभीर आरोप
आंदोलन के तीसरे दिन धरना स्थल पर एक अप्रत्याशित घटना घटी। अज्ञात हमलावरों ने अचानक पहुंचकर दीपक शर्मा के साथ बेरहमी से मारपीट की। जब उन्होंने जान बचाने का प्रयास किया, तो उन पर प्राणघातक हमला किया गया। इस हिंसक वारदात के बाद मामला बेहद संवेदनशील हो गया। पीड़ित दीपक शर्मा ने आरोप लगाया कि धरने को जबरन खत्म कराने की नीयत से उन पर यह जानलेवा हमला किया गया और जान से मारने की धमकियां दी गईं। दीपक शर्मा ने सीधे तौर पर वर्तमान कैबिनेट मंत्री चौधरी लक्ष्मी नारायण और उनके भतीजे चौधरी नरदेव पर इस हमले को अंजाम दिलवाने के गंभीर आरोप लगाए। इस घटना के बाद विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों के नेताओं का छाता शुगर मिल पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया।
551 करोड़ रुपये का स्वीकृत बजट और भविष्य की लड़ाई
छाता विधानसभा क्षेत्र की इस चीनी मिल को चालू करने के लिए 551 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया था। इसके साथ ही मिल के सालाना रखरखाव के लिए 60 से 87 लाख रुपये प्रति माह देने की घोषणा भी की गई थी। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर मिल का संचालन शुरू नहीं हो सका है। स्थानीय प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह चीनी मिल कई दशकों से पूरी तरह बंद पड़ी है और हर चुनाव से पहले इसे केवल एक राजनीतिक मुद्दा बनाकर छोड़ दिया जाता है। चुनाव संपन्न होते ही प्रशासनिक और राजनीतिक वादे ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।
धरना स्थल पर मौजूद भूतपूर्व सैनिक परिषद के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि जब तक चीनी मिल में पेराई का काम व्यावहारिक रूप से शुरू नहीं हो जाता, तब तक उनका यह आंदोलन समाप्त नहीं होगा। पूर्व सैनिकों ने चेतावनी दी कि दीपक शर्मा के साथ हुई हिंसक घटना के बाद अब वे किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं और चीनी मिल की चाबी मिलने तक पीछे हटने वाले नहीं हैं।




















