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छठी मैया के पारंपरिक गीतों और घाटों की सफाई से मिथिलांचल में सजा महापर्व का माहौलभारत
31 अक्तू॰ 2026, 7:58 pm (1 घंटे पहले)· 0

छठी मैया के पारंपरिक गीतों और घाटों की सफाई से मिथिलांचल में सजा महापर्व का माहौल

लोक आस्था के महापर्व छठ को लेकर मिथिलांचल के गांवों और शहरों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है, जहां पारंपरिक मैथिली गीतों की गूंज और सामूहिक स्वच्छता अभियान से भक्ति का रंग गहराने लगा है।

लोक आस्था के महापर्व छठ के आगमन से पहले ही समूचे मिथिलांचल क्षेत्र में एक अनूठा भक्तिमय माहौल तैयार होने लगा है। दरभंगा सहित आसपास के ग्रामीण और शहरी इलाकों में छठी मैया के पारंपरिक लोकगीत गूंजने लगे हैं, जिससे समूचा परिवेश आस्था और उल्लास से सराबोर दिखाई दे रहा है। घरों में विशेष साफ-सफाई के साथ-साथ जलस्रोतों और घाटों को संवारने की तैयारियां जोर पकड़ चुकी हैं। इसी बीच आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़े मिथिलांचल के जाने-माने लोकगायक दीपक झा ने अपनी सुरीली मैथिली आवाज में छठ का पारंपरिक लोकगीत पेश कर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

सांस्कृतिक पहचान और लोकगीतों की महत्ता

छठ के पारंपरिक गीतों की प्रस्तुति के बाद लोकगायक दीपक झा ने इस महापर्व से जुड़ी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं पर अपने अनुभव व्यक्त किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि छठ पूजा की औपचारिक शुरुआत से कई दिन पूर्व ही लोगों के अंतर्मन में छठी मैया के प्रति अटूट आस्था और निष्ठा का संचार होने लगता है। उनके अनुसार, मिथिला की पावन धरा पूरी तरह से भक्ति, साधना और पारंपरिक लोकधुनों के रंग में रंग जाती है। मिथिलांचल के लोकगायक अपनी मधुर गायकी के जरिए इन प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों और लोकपरंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

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जलस्रोतों की स्वच्छता और घाटों की पहले से तैयारी

पर्व की व्यावहारिक तैयारियों को रेखांकित करते हुए दीपक झा ने बताया कि छठ अनुष्ठान में पूजा-विधान के साथ स्वच्छता का विशेष स्थान होता है। यही कारण है कि गांवों और शहरों में स्थित तालाबों, नदियों, जलाशयों और विशेष छठ घाटों की व्यापक स्तर पर सफाई का कार्य करीब एक महीने पहले से ही आरंभ कर दिया जाता है। घाटों की मरम्मत, जलस्रोतों को स्वच्छ बनाना तथा आसपास के संपूर्ण वातावरण को पवित्र रखना इस पर्व की पूर्व तैयारियों का सबसे प्रमुख हिस्सा माना जाता है।

प्रकृति संरक्षण और सामाजिक सौहार्द का संदेश

दीपक झा के अनुसार, छठ महापर्व मात्र धार्मिक कर्मकांड या व्रत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव समाज को प्रकृति, पर्यावरण और जल संरक्षण का प्रत्यक्ष संदेश भी प्रदान करता है। इस पर्व के जरिए जनमानस को स्वच्छ परिवेश और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का गहरा बोध होता है। इसके अतिरिक्त, यह अनुष्ठान सामाजिक एकजुटता को सशक्त आधार देता है, क्योंकि समाज के सभी वर्ग मिलकर घाटों की सफाई करते हैं और हर स्तर पर एक-दूसरे को सहयोग करते हैं। मिथिला की संस्कृति में यह महापर्व परिवार, समाज और कुदरत को एक अटूट सूत्र में पिरोने का कार्य करता है।

सवाल-जवाब

मिथिलांचल में छठ पर्व को लेकर कैसा माहौल देखा जा रहा है?
मिथिलांचल के गांवों और शहरों में छठी मैया के पारंपरिक लोकगीत गूंज रहे हैं और घरों से लेकर घाटों तक साफ-सफाई की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं।
लोकगायक दीपक झा किस संस्था से जुड़े हुए हैं?
दीपक झा मुख्य रूप से आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिए पारंपरिक गायन करते हैं।
छठ घाटों और तालाबों की सफाई का काम कब से शुरू किया जाता है?
गांवों और शहरों में जलाशयों और छठ घाटों की व्यापक सफाई का कार्य पर्व से लगभग एक महीने पहले ही शुरू कर दिया जाता है।
दीपक झा के अनुसार छठ पर्व समाज को क्या मुख्य संदेश देता है?
दीपक झा के अनुसार छठ पर्व लोगों को स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति प्रेम और सामाजिक एकजुटता का गहरा संदेश देता है।
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टिप्पणियाँ 5

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·12 मिनट पहले

दीपक जी का गाना सुनकर मुझे अपने गांव के वो दिन याद आ गए जब सब मिलकर तालाब की सफाई करते थे। छठ की बात ही कुछ और है, दिल खुश हो जाता है।

Ravikash Gupta@ravikash·33 मिनट पहले

मिथिलांचल में छठ की तैयारी देखकर सचमुच घर की याद आ गई। क्या इस बार महानगरों के कृत्रिम घाटों पर भी ऐसी ही रौनक देखने को मिलेगी?

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·33 मिनट पहले

रविप्रकाश जी, बिल्कुल! दीपक झा जैसे लोकगायकों के गाने महानगरों में भी वही पुराना वाला माहौल बना देते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·54 मिनट पहले

मिथिलांचल में छठ की तैयारी देखकर सचमुच घर की याद आ गई। लोकगीतों की गूंज और घाटों पर लोगों का इस तरह जुटना बहुत सुकून देता है। बस यह सोच रहा था कि दीपक झा जी जैसे कलाकार इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए युवाओं को कैसे जोड़ रहे हैं?

Arjun Mehta@arjun-mehta·54 मिनट पहले

करण भाई, आपकी बात बिल्कुल सही है। पिछली बार दरभंगा के घाट पर जब सबको मिलकर सफाई करते देखा था, तो सचमुच दिल खुश हो गया था।

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