गुजरात के एकता नगर में राष्ट्रीय एकता दिवस के भव्य आयोजन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा, विकास यात्रा और राजनीतिक विमर्श से जुड़े गंभीर मुद्दों पर विस्तार से बात की। उन्होंने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि देश को आगे बढ़ाने के लिए जिस सकारात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, उसके विपरीत राजनीतिक परिदृश्य में बाधाएं खड़ी करने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। उनका कहना था कि विरोध प्रकट करने का लोकतांत्रिक अधिकार अपनी जगह है, लेकिन जब विरोध का रूप बदलकर हर विकास कार्य को रोकने का प्रयास बन जाए, तो वह देशहित के लिए अत्यंत चिंताजनक स्थिति पैदा करता है। उन्होंने रेखांकित किया कि संवैधानिक मर्यादाओं का आदर करना हर नागरिक और दल की प्राथमिक जिम्मेदारी है, लेकिन मौजूदा दौर में कुछ ताकतें विभाजनकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देकर समाज को अलग-अलग हिस्सों में बांटने के प्रयासों में जुटी हुई हैं।
विपक्ष की कार्यशैली और विकास में खड़ी की जा रही रुकावटें
प्रधानमंत्री ने कहा कि यह देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि विपक्ष अपना सकारात्मक कर्तव्य भूलकर केवल अवरोध पैदा करने वाला पक्ष बन चुका है। पिछले एक दशक से अधिक समय की हताशा और विफलता के कारण यह सोच अब खुलकर सामने आ गई है। जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था में रचनात्मक आलोचना का स्वागत होना चाहिए, वहीं अब केवल देश की प्रगति की राह में रोड़े अटकाने की राजनीति की जा रही है। उन्होंने सावधान करते हुए कहा कि ऐसे माहौल में देशवासियों को सजग रहना होगा कि कौन लोग विदेश में गोपनीय मुलाकातें कर रहे हैं, भारत विरोधी मंच किसे सहयोग दे रहे हैं और कौन देश के दुश्मनों की भाषा में बयानबाजी कर रहा है। सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाए जा रहे भ्रम, दुष्प्रचार और देश की वैश्विक छवि को आघात पहुंचाने की साजिशों की पहचान कर पूरे राष्ट्र को एकजुट होकर इनका प्रतिकार करना होगा।
माओवादी हिंसा का खात्मा और 'दिमागी नक्सल' का उभरता संकट
आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर हासिल सफलताओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हुए प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि हथियारबंद नक्सलवाद की कमर पूरी तरह तोड़ी जा चुकी है। उन्होंने स्मरण कराया कि पिछले वर्ष सरदार पटेल के 150वें जन्मदिवस पर इसी पावन स्थल पर खड़े होकर देश को वामपंथी उग्रवाद से मुक्त कराने का संकल्प दोहराया गया था। आज ठीक एक साल बाद वह लक्ष्य जमीन पर उतर चुका है। साल 2015 के दौर में जहां देश के 126 जिले नक्सल हिंसा की गिरफ्त में थे, वहीं मार्च 2026 तक देश में एक भी जिला ऐसा नहीं बचा है जो नक्सलवाद से त्रस्त हो। दशकों तक हिंसा और आतंक झेलने वाले ये इलाके अब सामान्य जनजीवन और विकास की मुख्यधारा से जुड़ चुके हैं। सुदूर जंगलों और गांवों तक पक्की सड़कें पहुंच रही हैं, मोबाइल कनेक्टिविटी सुदृढ़ हुई है, नए स्कूल खुल रहे हैं और नौजवानों को रोजगार व उच्च शिक्षा के अवसर मिल रहे हैं।
हालांकि, प्रधानमंत्री ने यह भी स्पष्ट रूप से आगाह किया कि सुदूर जंगलों में हथियारबंद नक्सलवाद भले ही समाप्त हो चुका हो, लेकिन 'दिमागी नक्सल' का खतरा अब भी टला नहीं है। समाज के भीतर वैचारिक स्तर पर भ्रम फैलाने और वैमनस्य घोलने वाले इन तत्वों से निरंतर सतर्क रहने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखने का यह महायज्ञ बिना किसी रुकावट के अनवरत चलता रहेगा। देश को अब अपने अगले महत्वपूर्ण लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करना, अवैध घुसपैठ पर लगाम कसना, जनसांख्यिकी यानी डेमोग्राफी में आ रहे असंतुलनों को रोकना और सेक्युलर सिविल कोड की दिशा में आगे बढ़ना शामिल है। उन्होंने बल देकर कहा कि जब भी भारत कोई बड़ा संकल्प लेगा, रास्ते में रुकावटें आएंगी और तूफानों से टकराना होगा, लेकिन 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' का मंत्र और विकसित भारत का सपना अब राष्ट्र का अटल संकल्प बन चुका है।
सरदार वल्लभभाई पटेल की विरासत और 550 से अधिक रियासतों का एकीकरण
लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को नमन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके योगदान के बिना आधुनिक भारत के अस्तित्व की कल्पना करना भी संभव नहीं है। स्वाधीनता के पश्चात उन्होंने अत्यंत चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में 550 से ज्यादा देसी रियासतों का भारतीय संघ में विलय कराकर राष्ट्र को एक सूत्र में बांधा था। सरदार पटेल की दृष्टि में भारत की भाषाई, सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधता कभी भी एकता के मार्ग में रुकावट नहीं थी, बल्कि वही इस राष्ट्र की वास्तविक शक्ति थी। उन्होंने भौगोलिक सीमाओं को एक करने के साथ ही देश की भावनात्मक डोर को भी सुदृढ़ किया।
इसी दृष्टि के तहत सरदार पटेल ने गुजरात में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की नींव रखकर भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान और पुनरुत्थान का मार्ग प्रशस्त किया था। प्रधानमंत्री ने उल्लेख किया कि सोमनाथ मंदिर पर फहराती ध्वजा पिछले 1000 वर्षों से अत्याचारियों की मंशा को नाकाम करते हुए राष्ट्र के आत्मसम्मान का प्रतीक बनी हुई है। इसी आत्मगौरव के भाव ने सोमनाथ स्वाभिमान पर्व को जन्म दिया, जिसे देश इस वर्ष पूरे उत्साह से मना रहा है। ऐतिहासिक रूप से इस महत्वपूर्ण कार्य के भी इस वर्ष 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं।
वैश्विक उथल-पुथल के बीच राष्ट्रीय एकता की भूमिका
वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि जब पूरी दुनिया में अशांति की स्थितियां हैं और ऊर्जा व आवश्यक संसाधनों को लेकर संकट गहरा रहा है, तब भारत की सामूहिक एकता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। कई मुल्कों में ईंधन की भारी किल्लत के चलते पेट्रोल और डीजल की खरीद पर कड़े प्रतिबंध लगाने पड़े थे। भारत को लेकर भी ऐसी ही आशंकाएं जताई जा रही थीं और भारत विरोधी ताकतें देश के भीतर अव्यवस्था फैलाने की ताक में थीं, लेकिन देशवासियों की एकजुटता ने हर आशंका को निर्मूल साबित कर दिया।
उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता बुनियादी मूल्य है, क्योंकि आजादी मिलने पर समाज अपने भविष्य का मार्ग स्वयं तय करता है। लेकिन उस स्वतंत्रता को सही दिशा और अनुशासन गणतंत्र की संस्थाओं और संविधान से मिलता है। संविधान हर निर्णय को लोकतांत्रिक मर्यादा में रहकर लेने का निर्देश देता है और सत्ता को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है। वहीं, सामाजिक एकता पूरे देश को एक जीवंत राष्ट्र के रूप में खड़े रहने का संबल प्रदान करती है।
एकता नगर में जनभागीदारी और सुरक्षा बलों का शौर्य
प्रधानमंत्री ने बताया कि इस वर्ष राष्ट्रीय एकता दिवस के कार्यक्रम का आयोजन सुबह के समय होने के बजाय शाम की बेला में किया गया, जिससे एकता नगर में भारत की साझा विरासत का एक अलग ही भव्य रूप देखने को मिला। राष्ट्रीय एकता परेड में पुलिस और विभिन्न केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवानों ने अपने असाधारण पराक्रम और अनुशासन का प्रदर्शन किया। विभिन्न राज्यों की झांकियों और प्रस्तुतियों के माध्यम से देश की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक धरोहर और जनता की भविष्य की आकांक्षाएं साकार रूप में नजर आईं। प्रधानमंत्री ने उन सभी सुरक्षाकर्मियों के सर्वोच्च बलिदान को श्रद्धापूर्वक याद किया जिन्होंने अशांत क्षेत्रों में शांति और कानून का राज स्थापित करने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, और कहा कि उनके त्याग के कारण ही आज का भारत पहले से कहीं अधिक सुरक्षित और आत्मविश्वासी महसूस कर रहा है।
















