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त्रिपुरा विधानसभा में डीजीपी अनुराग ढांकड़ की मौत पर हंगामा, सीपीआई(एम) ने की न्यायिक जांच की मांगत्रिपुरा
28 अग॰ 2026, 1:59 pm (1 घंटे पहले)· 2

त्रिपुरा विधानसभा में डीजीपी अनुराग ढांकड़ की मौत पर हंगामा, सीपीआई(एम) ने की न्यायिक जांच की मांग

त्रिपुरा विधानसभा में विपक्ष के नेता जितेंद्र चौधरी ने डीजीपी अनुराग ढांकड़ की मौत के मामले में एसआईटी या हाईकोर्ट के वर्तमान जज से स्वतंत्र जांच कराने की मांग की। अध्यक्ष द्वारा चर्चा रोकने पर सीपीआई(एम) विधायकों ने वेल में आकर नारेबाजी की।

त्रिपुरा विधानसभा में शुक्रवार को विपक्ष ने जमकर हंगामा किया। पुलिस महानिदेशक अनुराग ढांकड़ की मौत के मामले में स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर सीपीआई(एम) के विधायक अध्यक्ष की पीठ के सामने वेल में उतर आए। विपक्षी दल का कहना है कि राज्य के पुलिस प्रमुख की मौत की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच दल यानी एसआईटी का गठन किया जाए या फिर त्रिपुरा हाईकोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश की देखरेख में जांच कराई जाए।

पुलिस प्रमुख की मौत पर निष्पक्ष जांच की मांग

विधानसभा की कार्यवाही शुरू होते ही अध्यक्ष रामपद जमातिया ने बधाई प्रस्ताव पढ़ना शुरू किया था। उसी दौरान नेता प्रतिपक्ष जितेंद्र चौधरी ने डीजीपी अनुराग ढांकड़ की मौत का मुद्दा उठाया। उन्होंने मुख्यमंत्री मानिक साहा द्वारा गुरुवार को सदन में दिए गए स्वप्रेरित बयान का हवाला दिया। जितेंद्र चौधरी ने कहा कि जब मुख्यमंत्री खुद इस संवेदनशील मामले पर बयान दे चुके हैं तो सरकार को इस मामले में पूरी पारदर्शिता बरतनी चाहिए।

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नेता प्रतिपक्ष ने तर्क दिया कि यदि सरकार पुलिस महानिदेशक की मौत से जुड़े सभी तथ्यों को सामने लाने के लिए गंभीर है तो उसे बिना किसी देरी के स्वतंत्र जांच का आदेश देना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि मामले की सच्चाई केवल एसआईटी जांच या त्रिपुरा उच्च न्यायालय के किसी वर्तमान न्यायाधीश की निगरानी में होने वाली जांच से ही सामने आ सकती है।

नियमों का हवाला देकर बहस से इनकार, वेल में पहुंचे विधायक

अध्यक्ष रामपद जमातिया ने विपक्ष की इस मांग को खारिज कर दिया और मामले पर आगे चर्चा की अनुमति देने से इनकार कर दिया। विधानसभा अध्यक्ष ने नियमावली के नियम 361 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री के स्वप्रेरित वक्तव्य पर सदस्य कोई सीधी चर्चा शुरू नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि सदन की कार्यवाही स्थापित नियमों के अनुसार ही चलाई जाएगी।

अध्यक्ष द्वारा चर्चा रोकने और विधायकों के माइक बंद किए जाने के बाद स्थिति बिगड़ गई। सीपीआई(एम) के सदस्य अपनी सीटों से उठकर वेल में आ गए और जोरदार नारेबाजी करने लगे। विपक्षी विधायकों ने सरकार के खिलाफ नारे लगाए और चर्चा न कराने के फैसले का कड़ा विरोध जताया।

मुख्यमंत्री ने दी सफाई, कहा पारदर्शिता के लिए दी गई जानकारी

हंगामे के बीच मुख्यमंत्री मानिक साहा ने सरकार के रुख का बचाव किया। उन्होंने कहा कि जांच से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक हित और पारदर्शिता बनाए रखने के उद्देश्य से साझा की गई थी। मुख्यमंत्री ने सदन को बताया कि अब तक उपलब्ध जानकारी और साक्ष्यों के अनुसार डीजीपी की मौत पहली नजर में आत्महत्या का मामला प्रतीत होती है।

मानिक साहा ने संविधान के अनुच्छेद 194 का उल्लेख किया, जो विधायकों को उनके विधायी कार्यों के दौरान विशेष अधिकार प्रदान करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस जांच का एक हिस्सा है और इसे सदन के पटल पर रखना कानूनी रूप से अनुचित नहीं है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हाई-प्रोफाइल मामलों में गृह मंत्री या मुख्यमंत्री सदन को जांच की स्थिति से अवगत कराते रहे हैं और उचित समय आने पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट सहित सभी संबंधित दस्तावेज विधानसभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

सवाल-जवाब

त्रिपुरा विधानसभा में सीपीआई(एम) ने हंगामा क्यों किया?
सीपीआई(एम) विधायकों ने डीजीपी अनुराग ढांकड़ की मौत के मामले में स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा इस मुद्दे पर चर्चा की अनुमति न देने के विरोध में वेल में आकर प्रदर्शन किया।
विपक्ष डीजीपी की मौत के मामले में क्या मांग कर रहा है?
विपक्ष की मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया जाए या फिर जांच त्रिपुरा उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश की देखरेख में कराई जाए।
विधानसभा अध्यक्ष ने चर्चा की अनुमति देने से इनकार क्यों किया?
अध्यक्ष रामपद जमातिया ने विधानसभा नियमावली के नियम 361 का हवाला देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री के स्वप्रेरित वक्तव्य पर सदस्य सीधी चर्चा शुरू नहीं कर सकते।
मुख्यमंत्री मानिक साहा ने डीजीपी की मौत को लेकर क्या कहा?
मुख्यमंत्री मानिक साहा ने बताया कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर डीजीपी की मौत आत्महत्या प्रतीत होती है और सरकार ने पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह जानकारी सदन में साझा की है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·34 मिनट पहले

राज्य के पुलिस महानिदेशक जैसे सर्वोच्च पद पर आसीन अधिकारी की संदिग्ध मौत पर विधानसभा के भीतर हुआ यह गतिरोध कार्यपालिका और विपक्ष के बीच गहरे राजनीतिक टकराव का संकेत देता है। जब मुख्यमंत्री द्वारा सदन में स्वप्रेरित बयान देने के बावजूद अध्यक्ष ने नियम 361 का हवाला देकर चर्चा की अनुमति नहीं दी, तो इससे पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यदि सरकार इस संवेदनशील मामले में न्यायिक जांच या एसआईटी गठन की मांग को लगातार खारिज करती रही, तो यह मुद्दा सड़क से लेकर अदालत तक तूल पकड़ सकता है, जिससे राज्य प्रशासन की कार्यप्रणाली पर जनता का विश्वास प्रभावित होना तय है।

Ravikash Gupta@ravikash·34 मिनट पहले

डीजीपी स्तर के अधिकारी की मौत से जुड़े इस घटनाक्रम में जिस प्रकार विपक्ष ने एसआईटी या मौजूदा हाईकोर्ट जज से जांच की मांग उठाई है, वह प्रशासनिक जवाबदेही को कटघरे में खड़ा करती है। मुख्यमंत्री के स्वप्रेरित बयान के बाद भी नियम 361 का हवाला देकर चर्चा टालना और माइक्रोफ़ोन बंद करने से उपजा गतिरोध संस्थागत अविश्वास को गहरा रहा है। यदि इस मामले में पारदर्शी और स्वतंत्र जांच सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह राजनीतिक गतिरोध राज्य के वित्तीय निवेश, कॉर्पोरेट सेंटीमेंट और प्रशासनिक स्थिरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि इस तरह की अस्थिरता अक्सर बड़े निवेशकों का भरोसा डिगा देती है।

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