त्रिपुरा विधानसभा में शुक्रवार को विपक्ष ने जमकर हंगामा किया। पुलिस महानिदेशक अनुराग ढांकड़ की मौत के मामले में स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर सीपीआई(एम) के विधायक अध्यक्ष की पीठ के सामने वेल में उतर आए। विपक्षी दल का कहना है कि राज्य के पुलिस प्रमुख की मौत की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच दल यानी एसआईटी का गठन किया जाए या फिर त्रिपुरा हाईकोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश की देखरेख में जांच कराई जाए।
पुलिस प्रमुख की मौत पर निष्पक्ष जांच की मांग
विधानसभा की कार्यवाही शुरू होते ही अध्यक्ष रामपद जमातिया ने बधाई प्रस्ताव पढ़ना शुरू किया था। उसी दौरान नेता प्रतिपक्ष जितेंद्र चौधरी ने डीजीपी अनुराग ढांकड़ की मौत का मुद्दा उठाया। उन्होंने मुख्यमंत्री मानिक साहा द्वारा गुरुवार को सदन में दिए गए स्वप्रेरित बयान का हवाला दिया। जितेंद्र चौधरी ने कहा कि जब मुख्यमंत्री खुद इस संवेदनशील मामले पर बयान दे चुके हैं तो सरकार को इस मामले में पूरी पारदर्शिता बरतनी चाहिए।
नेता प्रतिपक्ष ने तर्क दिया कि यदि सरकार पुलिस महानिदेशक की मौत से जुड़े सभी तथ्यों को सामने लाने के लिए गंभीर है तो उसे बिना किसी देरी के स्वतंत्र जांच का आदेश देना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि मामले की सच्चाई केवल एसआईटी जांच या त्रिपुरा उच्च न्यायालय के किसी वर्तमान न्यायाधीश की निगरानी में होने वाली जांच से ही सामने आ सकती है।
नियमों का हवाला देकर बहस से इनकार, वेल में पहुंचे विधायक
अध्यक्ष रामपद जमातिया ने विपक्ष की इस मांग को खारिज कर दिया और मामले पर आगे चर्चा की अनुमति देने से इनकार कर दिया। विधानसभा अध्यक्ष ने नियमावली के नियम 361 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री के स्वप्रेरित वक्तव्य पर सदस्य कोई सीधी चर्चा शुरू नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि सदन की कार्यवाही स्थापित नियमों के अनुसार ही चलाई जाएगी।
अध्यक्ष द्वारा चर्चा रोकने और विधायकों के माइक बंद किए जाने के बाद स्थिति बिगड़ गई। सीपीआई(एम) के सदस्य अपनी सीटों से उठकर वेल में आ गए और जोरदार नारेबाजी करने लगे। विपक्षी विधायकों ने सरकार के खिलाफ नारे लगाए और चर्चा न कराने के फैसले का कड़ा विरोध जताया।
मुख्यमंत्री ने दी सफाई, कहा पारदर्शिता के लिए दी गई जानकारी
हंगामे के बीच मुख्यमंत्री मानिक साहा ने सरकार के रुख का बचाव किया। उन्होंने कहा कि जांच से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक हित और पारदर्शिता बनाए रखने के उद्देश्य से साझा की गई थी। मुख्यमंत्री ने सदन को बताया कि अब तक उपलब्ध जानकारी और साक्ष्यों के अनुसार डीजीपी की मौत पहली नजर में आत्महत्या का मामला प्रतीत होती है।
मानिक साहा ने संविधान के अनुच्छेद 194 का उल्लेख किया, जो विधायकों को उनके विधायी कार्यों के दौरान विशेष अधिकार प्रदान करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस जांच का एक हिस्सा है और इसे सदन के पटल पर रखना कानूनी रूप से अनुचित नहीं है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हाई-प्रोफाइल मामलों में गृह मंत्री या मुख्यमंत्री सदन को जांच की स्थिति से अवगत कराते रहे हैं और उचित समय आने पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट सहित सभी संबंधित दस्तावेज विधानसभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं।





















