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चित्रकूट जिला अस्पताल में 15 नवजात बेटियों का जन्मोत्सव, मुंहबोली बुआ बनीं समाजसेविका अर्चना नितिन उपाध्यायबिहार
18 अग॰ 2026, 2:03 pm (38 दिन पहले)· 2

चित्रकूट जिला अस्पताल में 15 नवजात बेटियों का जन्मोत्सव, मुंहबोली बुआ बनीं समाजसेविका अर्चना नितिन उपाध्याय

चित्रकूट जिला अस्पताल में महिला एवं बाल विकास विभाग के तहत 15 नवजात बच्चियों का केक काटकर जन्मोत्सव मनाया गया, जहां समाजसेविका अर्चना नितिन उपाध्याय ने बुआ बनकर उपहार बांटे।

चित्रकूट के जिला अस्पताल में उस वक्त खुशियों का माहौल बन गया जब एक साथ 15 नवजात बेटियों के आगमन का जश्न भव्य तरीके से मनाया गया। आमतौर पर जहां अस्पताल के गलियारों में बीमारी, इलाज और तीमारदारों की चिंताएं छाई रहती हैं, वहीं इस अनोखी पहल ने अस्पताल के प्रांगण को किसी उत्सव के आंगन में तब्दील कर दिया। महिला एवं बाल विकास विभाग के तत्वाधान में आयोजित इस संवेदनशील कार्यक्रम में सभी 15 नवजात बालिकाओं का बारी-बारी से केक काटकर जन्मोत्सव मनाया गया। इस दौरान नवजात बच्चियों के माता-पिता और परिजन भी इस अनोखे आयोजन का हिस्सा बने और अपनी खुशी जाहिर की।

मुंहबोली बुआ बनकर समाजसेविका ने बांटे उपहार

इस पूरे कार्यक्रम में समाजसेविका अर्चना नितिन उपाध्याय की उपस्थिति आकर्षण का मुख्य केंद्र रही। उन्होंने अस्पताल में जन्म लेने वाली सभी 15 नवजात बच्चियों की मुंहबोली बुआ का दर्जा अपनाते हुए उनके परिजनों के साथ खुशियां साझा कीं। अर्चना नितिन उपाध्याय ने न केवल बच्चियों के नाम से केक काटा, बल्कि सभी नवजात बेटियों के लिए नए कपड़े, खिलौने और दैनिक आवश्यकता के अन्य कई उपहार भी भेंट किए। अस्पताल में मौजूद परिजनों के लिए यह क्षण अत्यंत भावुक करने वाला था, क्योंकि अधिकांश ग्रामीण व स्थानीय परिवारों के लिए यह पहला मौका था जब उनकी नवजात बेटी के जन्म का जश्न इस तरह सार्वजनिक रूप से मनाया जा रहा था।

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बेटियों के प्रति सामाजिक नजरिया बदलने की कोशिश

अस्पताल परिसर में आयोजित इस सामूहिक जन्मोत्सव का मुख्य ध्येय केवल केक काटना या उपहार देना नहीं था, बल्कि भारतीय समाज में बेटियों के जन्म को लेकर व्याप्त लैंगिक असमानता की सोच पर चोट करना था। आज भी समाज के कई वर्गों में बेटे का जन्म होने पर ढोल-नगाड़े बजाए जाते हैं और जश्न मनाया जाता है, जबकि बेटी के जन्म पर वैसा उत्साह देखने को नहीं मिलता। इस कार्यक्रम के माध्यम से यह कड़ा संदेश दिया गया कि बेटी का आगमन भी परिवार के लिए उतना ही मंगलकारी और उत्सव योग्य है जितना कि बेटे का।

हर क्षेत्र में पहचान बना रही हैं बेटियां: डॉ. शैलेंद्र सिंह

आयोजन के संदर्भ में मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. शैलेंद्र सिंह ने कहा कि बेटियों का जन्म परिवार और समाज दोनों के लिए अपार खुशी का अवसर होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि बेटे और बेटी के बीच जन्मोत्सव मनाने में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। डॉ. शैलेंद्र सिंह ने बताया कि वर्तमान दौर में बेटियां शिक्षा, चिकित्सा क्षेत्र, प्रशासनिक सेवाओं, अंतरिक्ष विज्ञान, रक्षा बलों और खेलकूद समेत हर क्षेत्र में अपनी काबिलियत का परचम लहरा रही हैं। इसलिए यह अनिवार्य है कि बेटियों को जन्म के समय से ही समान अधिकार, उत्तम स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रगति करने के पूरे अवसर दिए जाएं।

सुरक्षित वातावरण और आत्मनिर्भरता की आवश्यकता

समाजसेविका अर्चना नितिन उपाध्याय ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि 15 नवजात बालिकाओं के बीच मौजूद होना उनके लिए अत्यंत सौभाग्य और भावुकता का विषय है। उन्होंने कहा कि इन सभी नन्ही बच्चियों को देखकर उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे उनके अपने परिवार में एक साथ 15 खुशियां आ गई हों। उन्होंने कहा, "बेटी को जन्म देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे सुरक्षित माहौल, अच्छी शिक्षा और आत्मनिर्भर बनने का अवसर देना भी परिवार और समाज की जिम्मेदारी है।" उन्होंने आगे कहा कि जब हम अपनी बेटियों के सपनों को उड़ान देंगे, तभी वे आगे चलकर अपने परिवार, समाज और पूरे देश का नाम रोशन करेंगी। इस सराहनीय प्रयास ने 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' की राष्ट्रीय मुहिम को एक नया भावनात्मक आयाम प्रदान किया है।

सवाल-जवाब

चित्रकूट जिला अस्पताल में किस बात का जश्न मनाया गया?
जिला अस्पताल में 15 नवजात बेटियों के आगमन पर केक काटकर भव्य जन्मोत्सव मनाया गया।
इस जन्मोत्सव का आयोजन किस विभाग के बैनर तले किया गया था?
यह कार्यक्रम महिला एवं बाल विकास विभाग के तत्वाधान में आयोजित किया गया था।
नवजात बच्चियों की मुंहबोली बुआ के रूप में किसने शिरकत की?
समाजसेविका अर्चना नितिन उपाध्याय ने 15 नवजात बच्चियों की मुंहबोली बुआ बनकर समारोह में भाग लिया और उपहार बांटे।
मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. शैलेंद्र सिंह ने कार्यक्रम में क्या कहा?
डॉ. शैलेंद्र सिंह ने कहा कि बेटियों के जन्म पर भी बेटों की तरह खुशियां मनाई जानी चाहिए और उन्हें शिक्षा व स्वास्थ्य में समान अधिकार मिलने चाहिए।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·37 दिन पहले

चित्रकूट जिला अस्पताल में 15 नवजात बेटियों का यह सामूहिक जन्मोत्सव केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं, बल्कि बुंदेलखंड जैसे सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्र में पितृसत्तात्मक सोच पर एक तीखा प्रहार है। उत्तर प्रदेश शासन की मिशन शक्ति जैसी पहलों के जमीनी स्तर पर ऐसे सकारात्मक परिणाम ग्रामीण परिवारों में लैंगिक असमानता की खाई को पाटने का काम कर रहे हैं। हालांकि, इस तरह के आयोजनों को केवल अस्पताल तक सीमित न रखकर सुदूर गांवों तक निरंतर जन-जागरूकता अभियानों से जोड़ना होगा, तभी कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाओं पर पूरी तरह लगाम लग सकेगी और बालिकाओं को जन्म से ही समान अधिकार एवं बेहतर स्वास्थ्य मिल पाएगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·37 दिन पहले

अपराध और कानून-व्यवस्था की दृष्टि से देखें तो लैंगिक असंतुलन और कन्या भ्रूण हत्या जैसे गंभीर अपराधों की जड़ें गहरी सामाजिक मान्यताओं में छिपी हैं। बुंदेलखंड क्षेत्र में महिलाओं के खिलाफ अपराध और सुरक्षा के मुद्दों से निपटने के लिए केवल पुलिसिया कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि इस तरह के सामाजिक आयोजनों के जरिए अपराध की मानसिकता को जड़ से खत्म करना होगा। जब समाज बेटियों के जन्म को उत्सव के रूप में स्वीकार करेगा, तभी अपराध-मुक्त और सुरक्षित माहौल की दिशा में एक मजबूत कानूनी व सामाजिक नींव तैयार होगी।

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