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चुनाव आयोग की अंदरूनी प्रक्रिया पर उठे सवाल, शशि थरूर ने दस्तावेजी सबूतों के साथ मांगा 7 बिंदुओं पर जवाबभारत
24 सित॰ 2026, 7:59 am (7 दिन पहले)· 4

चुनाव आयोग की अंदरूनी प्रक्रिया पर उठे सवाल, शशि थरूर ने दस्तावेजी सबूतों के साथ मांगा 7 बिंदुओं पर जवाब

चुनाव आयोग के कामकाज और फैसलों में कथित मतभेदों पर आयोग की सफाई आने के बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर 7 अहम सवाल उठाए हैं। उन्होंने आयोग से सिर्फ सामान्य प्रेस नोट जारी करने के बजाय उठाए गए हर मुद्दे पर विस्तृत और दस्तावेजी स्पष्टीकरण देने की मांग की है।

भारत निर्वाचन आयोग के प्रशासनिक कामकाज और शीर्ष स्तर पर निर्णय लेने की कार्यप्रणाली को लेकर सियासी हलकों में नई बहस छिड़ गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के दौरान लिए गए कुछ प्रशासनिक निर्णयों और आंतरिक आपत्तियों को लेकर खड़े हुए विवाद पर आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की थी। हालांकि, चुनाव आयोग के इस आधिकारिक स्पष्टीकरण के बाद भी मामला थमता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने आयोग के रुख पर तीखे सवाल खड़े करते हुए कहा है कि केवल एक औपचारिक प्रेस नोट जारी कर देने से वे बुनियादी चिंताएं खत्म नहीं हो जातीं, जो चुनाव प्रणाली की पारदर्शिता से जुड़ी हुई हैं।

चुनाव आयोग का आधिकारिक रुख और सर्वसम्मति का तर्क

आयोग ने सार्वजनिक किए गए अपने रुख में स्पष्ट किया कि संस्थागत फैसलों से पहले विभिन्न स्तरों पर होने वाली अंदरूनी टिप्पणियां और विचार-विमर्श किसी भी स्वस्थ प्रशासनिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा होते हैं। आयोग के अनुसार, उसके सभी कदम स्थापित कानूनी नियमों के दायरे में रहकर उठाए जाते हैं और डिजिटल प्रणालियों में सुरक्षा के पुख्ता नियंत्रण पहले से मौजूद हैं। इसके अलावा, आयोग की ओर से यह भी रेखांकित किया गया कि बीते एक वर्ष की पूरी अवधि के दौरान जितने भी आधिकारिक निर्णय लिए गए, वे सभी आपसी सर्वसम्मति से ही तय किए गए थे।

10 महीने में 14 आपत्तियों का ब्योरा और विवाद के मुख्य बिंदु

इस पूरे मामले की जड़ में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी द्वारा दर्ज कराई गई असहमति के बिंदु हैं। विवरण के अनुसार, करीब 10 महीने के अंतराल में चुनाव आयोग के नाम पर जारी किए गए विभिन्न आदेशों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गईं। ये आपत्तियां केवल औपचारिक प्रशासनिक टिप्पणियां नहीं थीं, बल्कि नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने या उन्हें हटाने की प्रक्रियाओं, नए वोटर रजिस्ट्रेशन से जुड़े फॉर्म 6 में किए गए बदलावों तथा मतदाता डेटा से जुड़े सूचना प्रौद्योगिकी सिस्टम के प्रबंधन जैसे बेहद संवेदनशील विषयों से संबंधित थीं। इसके अलावा एसआईआर और अन्य प्रशासनिक मामलों को लेकर भी मतभेद सामने आए थे।

शशि थरूर के 7 सवाल: विस्तृत और बिंदुवार जवाब की मांग

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि आयोग का सामान्यीकरण करने वाला जवाब उन विशिष्ट पहलुओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है, जो सीधे चुनावी अखंडता से जुड़े हैं। उन्होंने आयोग के सामने 7 स्पष्ट सवाल रखते हुए कहा कि केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि अंतिम फैसला सर्वसम्मति से हुआ था, बल्कि यह जानना आवश्यक है कि निर्णय प्रक्रिया के दौरान दर्ज की गई आपत्तियों का क्या हश्र हुआ। थरूर द्वारा उठाए गए प्रमुख सवाल इस प्रकार हैं

  • क्या रिकॉर्ड में दर्ज बताई गई 14 आपत्तियां वास्तव में आधिकारिक फाइलों पर दर्ज थीं और उनमें से प्रत्येक आपत्ति पर क्या प्रशासनिक कार्रवाई की गई?
  • कमिश्नरों द्वारा आपत्ति दर्ज कराए जाने के बावजूद फॉर्म 6 के नियमों और प्रारूप में किए गए बदलावों का ठोस कानूनी आधार क्या था?
  • मतदाता सूची के डेटाबेस तक पहुंच और आईटी नियंत्रण प्रणाली के केंद्रीकरण को लेकर जो गंभीर चिंताएं जताई गई थीं, उनका क्या समाधान निकाला गया?
  • गोवा में 97 मतदाताओं से जुड़े विशिष्ट मामले को लेकर निर्वाचन आयोग का वास्तविक और स्पष्टीकरण क्या है?
  • जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के बाद दोबारा जोड़े गए, उनसे जुड़ी अपीलों को किस अधिकारी या स्तर पर मंजूरी दी गई और इसके लिए किस प्रक्रिया का पालन हुआ?
  • कैबिनेट सेक्रेटरी को भेजे गए संदेशों के पीछे कौन से प्रशासनिक हालात और कारण मौजूद थे?
  • क्या आयोग के नाम से बिना आवश्यक औपचारिक मंजूरी के कोई संदेश या निर्देश जारी किए गए थे, जैसा कि सामने आया है?

संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और पारदर्शिता का तकाजा

शशि थरूर ने इस बात पर विशेष बल दिया कि संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति आम जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए पूरी प्रक्रिया का पारदर्शी होना अनिवार्य है। उनका कहना है कि जब दो चुनाव आयुक्तों ने अहम प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए थे, तो उन आपत्तियों की अनदेखी कर सिर्फ अंतिम सर्वसम्मति का हवाला देना प्रक्रिया की खामियों को नहीं छिपा सकता। उन्होंने मांग की कि चुनाव आयोग को इन सभी सात बिंदुओं पर केवल संक्षिप्त खंडन करने के बजाय पूरे आधिकारिक दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक रिकॉर्ड में तथ्यों को सामने रखना चाहिए, ताकि चुनावी प्रणाली पर किसी प्रकार का संदेह न रहे।

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सवाल-जवाब

शशि थरूर ने चुनाव आयोग से क्या मांग की है?
शशि थरूर ने चुनाव आयोग से केवल एक सामान्य प्रेस नोट जारी करने के बजाय 14 आपत्तियों और 7 विशिष्ट बिंदुओं पर दस्तावेजी सबूतों के साथ स्पष्टीकरण देने की मांग की है।
चुनाव आयोग ने अपने स्पष्टीकरण में क्या कहा था?
चुनाव आयोग ने कहा कि अंदरूनी टिप्पणियां विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं, उसके सभी फैसले कानून के मुताबिक और पिछले एक साल में सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
चुनाव आयुक्तों ने किन मुद्दों पर 14 बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं?
ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, वोटर लिस्ट से नाम जोड़ने-हटाने, फॉर्म 6 में बदलाव और चुनावी डेटा से जुड़े आईटी सिस्टम के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों पर थीं।
किन चुनाव आयुक्तों ने फैसले लेने की प्रक्रिया पर आपत्तियां जताई थीं?
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 10 महीने की अवधि में कम से कम 14 बार इन निर्णयों पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
गोवा से जुड़ा कौन सा मामला सवालों के घेरे में है?
शशि थरूर ने अपने सवालों में गोवा के 97 मतदाताओं से जुड़े विशिष्ट मामले पर चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है।
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टिप्पणियाँ 5

Aisha Khan@aisha-khan·6 दिन पहले

दस महीनों में चौदह बार असहमति जताना कोई छोटी बात नहीं है। जब चुनाव जैसे संवेदनशील मामलों में ही अंदर मतभेद होने लगें, तो फिर आम जनता का भरोसा कैसे टिकेगा?

Ravikash Gupta@ravikash·6 दिन पहले

थरूर साहब के सवाल ठीक हैं, पर मुझे लगता है अंदरूनी असहमति हर जगह होती है, इसे इतना बड़ा मुद्दा बनाना चुनाव प्रक्रिया को कमजोर करना है।

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·6 दिन पहले

रविकेश जी, अंदरूनी असहमति होना ठीक है, पर 14 बार सवाल उठना और वो भी वोटर लिस्ट जैसे जरूरी मामलों पर, इसे सिर्फ सामान्य बात कहकर टाला नहीं जा सकता।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 दिन पहले

चुनाव आयोग का यह कहना कि सब कुछ आम सहमति से हुआ, थोड़ा अजीब लगता है। अगर अंदर इतनी आपत्तियां थीं, तो सिर्फ प्रेस नोट से बात खत्म नहीं मान लेनी चाहिए। जनता को साफ-साफ बताना ही होगा कि उन 14 फाइलों पर आखिर क्या बात अटकी थी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·6 दिन पहले

सही कहा करण, वो 14 आपत्तियों वाली बात सचमुच चौकाने वाली है, चुनाव आयोग को इस पर खुलकर सच बताना चाहिए।

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