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दिल्ली के सेंट्रल रिज से हटाए जाएंगे 13 हजार से अधिक पेड़, सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरीदिल्ली
17 सित॰ 2026, 8:10 pm (42 दिन पहले)· 2

दिल्ली के सेंट्रल रिज से हटाए जाएंगे 13 हजार से अधिक पेड़, सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी

दिल्ली के सेंट्रल रिज क्षेत्र से विलायती कीकर और यूकेलिप्टस जैसे आक्रामक पेड़ों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मंजूरी दे दी है। इस योजना के तहत अब लगभग 13,000 पेड़ हटाए जाएंगे और उनकी जगह स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाए जाएंगे।

राजधानी दिल्ली के पर्यावरण को बचाने और उसे हरा-भरा बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया है। दिल्ली के सेंट्रल रिज इलाके से आक्रामक प्रजातियों के पेड़ों को चरणबद्ध तरीके से हटाने का रास्ता साफ हो चुका है। वन विभाग की इस महत्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत लगभग 13 हजार पेड़ों को हटाया जाना है। हालांकि यह सुनने में अजीब लग सकता है कि पेड़ बचाने की कवायद के बीच पेड़ों को काटने की अनुमति क्यों दी जा रही है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा वैज्ञानिक और पर्यावरणीय कारण छिपा हुआ है। यह पूरा मामला विलायती कीकर, बबूल और यूकेलिप्टस जैसी विदेशी और आक्रामक प्रजातियों से जुड़ा है, जो स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नुकसानदायक साबित हो रही हैं।

आक्रामक प्रजातियों को हटाने की योजना

दिल्ली वन विभाग की इस योजना के मुताबिक सेंट्रल रिज के लगभग 191 हेक्टेयर क्षेत्र से कुल 22,188 आक्रामक पेड़ों को साफ किया जाना है। इनमें मुख्य रूप से विलायती कीकर, बबूल और सफेदा यानी यूकेलिप्टस शामिल हैं। इस बड़ी प्रक्रिया में से लगभग 9,000 पेड़ पहले ही हटाए जा चुके हैं, और अब करीब 13,161 पेड़ों को लगभग 70 हेक्टेयर क्षेत्र से हटाया जाना बाकी है। इन विदेशी पेड़ों को हटाने का मुख्य उद्देश्य उनकी जगह पर नीम, बरगद, पीपल, जामुन और अमलतास जैसे स्वदेशी और स्थानीय पेड़ों को बढ़ावा देना है। पूरी योजना के तहत लगभग 7.29 लाख पेड़ और झाड़ियां लगाने का बड़ा लक्ष्य रखा गया है ताकि राजधानी के फेफड़ों को फिर से जीवनदान मिल सके।

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बड़े पैमाने पर पौधरोपण का कार्य

वन विभाग द्वारा अदालत में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार, लगभग 120 हेक्टेयर क्षेत्र में अब तक 5.31 लाख से अधिक पेड़ और झाड़ियां लगाई जा चुकी हैं। इस संख्या में लगभग 2.23 लाख पेड़ और 3.07 लाख झाड़ियां शामिल हैं। विभाग का तर्क है कि जब तक इन आक्रामक और पानी सोखने वाली प्रजातियों को हटाया नहीं जाएगा, तब तक नए लगाए गए स्थानीय पौधे ठीक से पनप नहीं पाएंगे। इसी महत्वपूर्ण तर्क के आधार पर बाकी बचे हुए क्षेत्र में भी पेड़ों को हटाने और उनकी जगह नए पौधे रोपने की अनुमति मांगी गई थी, ताकि पर्यावरण संतुलन को बनाए रखा जा सके।

सुप्रीम कोर्ट की मुहर और निर्देश

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिल्ली रिज के इस वन बहाली अभियान को हरी झंडी दिखा दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि आक्रामक प्रजातियों को हटाने के साथ-साथ वहां स्थानीय प्रजातियों का बड़े पैमाने पर पौधरोपण किया जाना चाहिए। कोर्ट के निर्देश के अनुसार यह सारा काम दिल्ली इको-रिस्टोरेशन प्लान 2026-30 के तहत ही आगे बढ़ाया जाएगा। इस पूरी कार्ययोजना को देहरादून स्थित प्रतिष्ठित वन अनुसंधान संस्थान द्वारा तैयार किया गया है। इसके अलावा, पूरे अभियान की कड़ी निगरानी रिज प्रबंधन बोर्ड द्वारा की जाएगी और काम पूरा होने के बाद वन विभाग को एक अनुपालन रिपोर्ट भी सौंपनी होगी।

सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस पहल की सराहना की लेकिन साथ ही यह भी चेताया कि यह प्रयास केवल कागजों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि यूकेलिप्टस और विलायती कीकर जैसी प्रजातियां भूजल स्तर को तेजी से गिराती हैं और मिट्टी की गुणवत्ता को भी भारी नुकसान पहुंचाती हैं। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि कई बार किसान इन पेड़ों के दुष्प्रभावों से अनजान रहकर यूकेलिप्टस की खेती करते हैं, हालांकि अब उन्हें पोपलर जैसे बेहतर विकल्प मिल रहे हैं। अदालत का मानना है कि स्वदेशी हरियाली को वापस लाने के लिए इन विदेशी पेड़ों को हटाना एक आवश्यक कदम है।

कानूनी विवाद और आपत्तियां

इस पूरी योजना को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में भी सवाल उठाए गए थे। अरावली बचाओ सिटिजंस मूवमेंट के प्रबंध न्यासी लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) सरवदमन सिंह ओबेरॉय ने एक अवमानना याचिका दायर की थी। इस याचिका में सेंट्रल रिज क्षेत्र में किसी भी तरह की निर्माण गतिविधि, साफ-सफाई, खुदाई और पेड़ों को हटाने से जुड़े पूर्व आदेशों के उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाया गया था। उच्च न्यायालय ने पिछले साल 20 अगस्त को रिज क्षेत्र में इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने स्पष्ट किया कि उन्हें नए पौधे लगाने पर कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि उनकी मुख्य चिंता पुराने पेड़ों को हटाने के तरीके और उससे ऊपरी उपजाऊ मिट्टी को होने वाले नुकसान को लेकर थी।

विशेषज्ञों की निगरानी और समय सीमा का महत्व

वन विभाग की तरफ से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि पेड़ों की कटाई और पौधरोपण का पूरा काम पूरी तरह से स्वीकृत योजना के तहत ही चल रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि सितंबर में मानसून समाप्त हो जाता है, और यदि उसके बाद पौधरोपण किया गया तो वह अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि पहले चरण में 9,000 आक्रामक पेड़ हटाने के बाद वहां भारी संख्या में स्थानीय पौधे सफलतापूर्वक लगाए गए हैं। अब बाकी बचे आक्रामक पेड़ों को हटाना अनिवार्य है ताकि अगले चरण का पौधरोपण समय पर पूरा किया जा सके। अदालत ने वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून से विशेषज्ञों की एक समर्पित टीम गठित करने का निर्देश देकर पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण सुनिश्चित किया है।

सवाल-जवाब

दिल्ली के सेंट्रल रिज से कुल कितने पेड़ हटाए जाने हैं?
योजना के तहत कुल 22,188 आक्रामक पेड़ों को हटाया जाना है, जिनमें से लगभग 9,000 हटाए जा चुके हैं और 13,161 पेड़ अभी हटाए जाने बाकी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना पर क्या फैसला दिया है?
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली वन विभाग के वन बहाली अभियान को हरी झंडी दे दी है और इसे तय योजना के तहत सख्ती से लागू करने को कहा है।
किन आक्रामक प्रजातियों के पेड़ों को हटाया जा रहा है?
इस अभियान के तहत मुख्य रूप से विलायती कीकर, बबूल और यूकेलिप्टस (सफेदा) जैसी आक्रामक प्रजातियों को हटाया जा रहा है।
आक्रामक पेड़ों की जगह कौन से पौधे लगाए जाएंगे?
इनकी जगह नीम, बरगद, पीपल, जामुन और अमलतास जैसी स्थानीय और स्वदेशी प्रजातियों के पौधे लगाए जा रहे हैं।
इस पूरी योजना की निगरानी कौन करेगा?
इस पूरी योजना और पौधरोपण के काम की निगरानी रिज प्रबंधन बोर्ड और वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून के विशेषज्ञों की टीम करेगी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·42 दिन पहले

यह निर्णय सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है। विलायती कीकर और यूकेलिप्टस जैसी आक्रामक प्रजातियाँ न केवल अत्यधिक भूजल सोखती हैं, बल्कि इनकी परागकण (pollen) संबंधी एलर्जी से दिल्लीवासियों में श्वसन संबंधी बीमारियाँ भी बढ़ती हैं। नीम, पीपल और बरगद जैसी स्वदेशी प्रजातियों के आने से वायु गुणवत्ता और जैव विविधता दोनों में सुधार होगा, जो अंततः नागरिकों की शारीरिक और मानसिक वेलनेस के लिए सकारात्मक साबित होगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·42 दिन पहले

यह निर्णय दिखाता है कि पारिस्थितिक सुधार में केवल पौधे लगाना ही नहीं, बल्कि आक्रामक विदेशी प्रजातियों को वैज्ञानिक तरीके से हटाना भी कितना महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट की मुहर से दिल्ली इको-रिस्टोरेशन प्लान 2026-30 के तहत रिज प्रबंधन बोर्ड की निगरानी में इस बहाली अभियान को प्रशासनिक और कानूनी मजबूती मिली है, जिससे राजधानी के भूजल और स्थानीय जैव विविधता को पुनर्जीवित करने का रास्ता साफ हो गया है।

Arshdeep Ahluwalia@arshdeep-ahluwalia·42 दिन पहले

यह फैसला उत्तर भारत के अन्य शहरी क्षेत्रों के लिए भी एक बड़ा उदाहरण है, जहाँ चंडीगढ़, गुरुग्राम और शिमला जैसे शहरों में भी विदेशी और पानी सोखने वाले पेड़ों के कारण स्थानीय जैव विविधता पर संकट गहरा रहा है। वन अनुसंधान संस्थान की इस योजना का सफल क्रियान्वयन यदि दिल्ली में होता है, तो क्षेत्रीय स्तर पर शहरी जंगलों के संरक्षण और भूजल पुनर्भरण की नीतियों में एक नया वैज्ञानिक दृष्टिकोण देखने को मिलेगा, बशर्ते इस पूरी प्रक्रिया में रिज प्रबंधन बोर्ड अपनी निगरानी और अनुपालन रिपोर्ट को लेकर पूरी तरह पारदर्शी रहे।

Rohan Verma@rohan-verma·42 दिन पहले

दिल्ली के सेंट्रल रिज से विलायती कीकर जैसे आक्रामक पेड़ों को हटाकर स्वदेशी प्रजातियां लगाने का सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक वैज्ञानिक कदम है। हालांकि, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में भी इसी तरह की विदेशी प्रजातियां भूजल स्तर को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं। वन अनुसंधान संस्थान की इस कार्ययोजना और रिज प्रबंधन बोर्ड की निगरानी से यह स्पष्ट है कि सिर्फ पौधे लगाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के लिए आक्रामक प्रजातियों का उन्मूलन और समयबद्ध अनुपालन रिपोर्ट बेहद जरूरी है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·42 दिन पहले

यह कानूनी और प्रशासनिक पहल एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करती है जहाँ पारिस्थितिकी सुधार को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रखकर रिज प्रबंधन बोर्ड की निगरानी और समयबद्ध अनुपालन रिपोर्ट के जरिए जमीन पर उतारने की बात कही गई है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से अब यह तय हो गया है कि वन विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियों को अदालत के प्रति जवाबदेह होना होगा, जिससे योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही की गुंजाइश कम बचेगी और दिल्ली के हरित क्षेत्र को बचाने की प्रक्रिया तय कानूनी और वैज्ञानिक ढांचे के भीतर ही आगे बढ़ेगी।

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