हनुमानगढ़ जिले में पंचायतीराज चुनाव की रणनीतिक तैयारी के लिए बुलाई गई कांग्रेस की बैठक में पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी और गहरा असंतोष खुलकर सतह पर आ गया. भादरा के पूर्व विधायक डॉ. सुरेश चौधरी ने चुनावी टिकट वितरण की पूरी प्रक्रिया पर सीधे प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि संगठन के समर्पित कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया जा रहा है. उन्होंने दावा किया कि भादरा क्षेत्र में कांग्रेस की उम्मीदवारी तय करने की चाबी पार्टी के मूल नेताओं के बजाय कामरेड और जननायक जनता पार्टी से जुड़े लोगों के हाथों में थमा दी गई है.
बैठक में अपनी बात रखते हुए पूर्व विधायक ने कहा कि यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है, बल्कि इससे पहले नगर पालिका चुनावों के दौरान भी इसी प्रकार का अजीबोगरीब राजनीतिक समझौता देखने को मिला था. उनका स्पष्ट आरोप था कि उस चुनाव में माकपा के कार्यकर्ताओं को कांग्रेस के आधिकारिक चुनाव चिन्ह पर टिकट बांटे गए. ऐसे में जब अब ग्रामीण स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव सिर पर हैं, पार्टी कार्यकर्ताओं के मन में भविष्य को लेकर गंभीर संशय पैदा हो गया है.
बड़े नेताओं की कार्यशैली और कामरेड से मिलने की सलाह पर तल्ख तेवर
डॉ. सुरेश चौधरी ने बैठक में मौजूद नेताओं के सामने एक घटनाक्रम का ब्योरा साझा किया. उन्होंने बताया कि जब उन्होंने खुद टिकटों के वितरण के संबंध में पार्टी के एक बड़े नेता से संपर्क साधा, तो उन्हें सीधे तौर पर कामरेड से मिलने और वहां बात तय करने की सलाह दी गई. यद्यपि उन्होंने मंच से किसी विशिष्ट नेता का नाम खुलकर नहीं लिया, लेकिन स्थानीय राजनीतिक हलकों में इस टिप्पणी को भादरा के पूर्व विधायक और माकपा नेता बलवान पूनिया से जोड़कर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है. चौधरी ने तीखे शब्दों में सवाल किया कि क्या अब कांग्रेस के आधिकारिक टिकट भी कामरेड ही तय करेंगे और बांटेंगे.
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए पूर्व विधायक ने केवल स्थानीय स्तर की कार्यप्रणाली पर ही उंगली नहीं उठाई, बल्कि प्रदेश स्तर के नेतृत्व को भी इस विवाद के घेरे में खींच लिया. उन्होंने गंभीर आरोप लगाया कि राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश स्तरीय नेताओं की मूक सहमति या साठगांठ के चलते पूरी पार्टी को कामरेड के हाथों में सौंपने जैसी दुर्गति बन चुकी है. इन तीखे आरोपों के सार्वजनिक होने के बाद पंचायतीराज चुनाव से ठीक पहले स्थानीय राजनीति में खींचतान और तेज हो गई है, हालांकि बैठक में या उसके बाद दूसरे कांग्रेसी नेताओं की ओर से इन आरोपों पर तत्काल कोई औपचारिक स्पष्टीकरण नहीं आया.
भादरा का त्रिकोणीय चुनावी इतिहास और विधानसभा के आंकड़े
भादरा विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक मिजाज हमेशा से प्रदेश की पारंपरिक राजनीति से काफी अलग और त्रिकोणीय रहा है. इस इलाके में लंबे समय से मुख्य चुनावी संघर्ष कांग्रेस, भाजपा और माकपा के बीच देखने को मिलता रहा है. वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में माकपा के प्रत्याशी बलवान पूनिया ने भादरा सीट से शानदार जीत हासिल की थी, जबकि उस मुकाबले में कांग्रेस के टिकट पर डॉ. सुरेश चौधरी स्वयं चुनावी मैदान में उतरे हुए थे.
इसके बाद के चुनावी चक्र में भी कांग्रेस का प्रदर्शन भादरा में काफी कमजोर बना रहा. वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की स्थिति और बिगड़ गई तथा आधिकारिक चुनावी आंकड़ों के मुताबिक कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. सुरेश चौधरी मुकाबले में पिछड़ते हुए तीसरे स्थान पर खिसक गए थे. यही चुनावी पृष्ठभूमि वर्तमान बैठक में कार्यकर्ताओं और पूर्व विधायक के गुस्से की प्रमुख वजह बनकर उभरी.
नगरपालिका चुनाव 2026 के नतीजे और भाजपा का ऐतिहासिक बोर्ड
अपने भाषण में डॉ. सुरेश चौधरी ने वर्ष 2026 में संपन्न हुए भादरा नगरपालिका चुनाव का विशेष उल्लेख किया. उन्होंने दोहराया कि नगर निकाय के चुनावों में भी टिकट वितरण की बागडोर कामरेडों और जननायक जनता पार्टी से जुड़े तत्वों के प्रभाव में रही थी, जिसके बेहद निराशाजनक नतीजे पार्टी को भुगतने पड़े. वर्ष 2026 के भादरा नगरपालिका चुनाव परिणामों के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कुल 40 वार्डों में से भाजपा ने 16 वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस मात्र 3 सीटों पर सिमट कर रह गई.
उस चुनाव में बड़ी तादाद में निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी विजय हासिल की थी. नतीजतन, राजनीतिक समीकरणों के चलते भादरा नगरपालिका में इतिहास में पहली बार भाजपा का बोर्ड गठित होने की स्थिति बनी. पूर्व विधायक का तर्क था कि जब गलत टिकट वितरण के कारण नगर पालिका में पार्टी का जनाधार लगभग तबाह हो गया, तो वही गलतियां आगामी पंचायत चुनावों में दोहराने की अनुमति कैसे दी जा सकती है.
पंचायतीराज चुनाव की दहलीज पर कांग्रेस संगठन के सामने कड़ी चुनौतियां
राजस्थान में अब पंचायतीराज चुनाव की सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं और कांग्रेस के लिए ग्रामीण इलाकों में अपनी साख बचाना अत्यंत आवश्यक है. ऐसे नाजुक मोड़ पर टिकट वितरण का मुद्दा ही संगठन के भीतर सबसे बड़ा टकराव बिंदु बनकर उभरा है. भादरा के पूर्व विधायक द्वारा बैठक के बीच उठाए गए सवालों ने स्थानीय कैडर को झकझोर दिया है और जमीनी कार्यकर्ताओं में असंतोष की लहर पैदा कर दी है.
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन तीखे आरोपों का आगामी पंचायत चुनावों में टिकट वितरण की कार्यप्रणाली पर क्या व्यावहारिक असर पड़ता है. वर्तमान स्थिति में कांग्रेस संगठन के सामने न केवल जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच आवश्यक तालमेल बहाल करने की परीक्षा है, बल्कि टिकट बंटवारे में बाहरी दलों के कथित दखल पर उठ रहे गंभीर सवालों का संतोषजनक समाधान तलाशने की भी बड़ी चुनौती खड़ी है. फिलहाल पार्टी के कार्यकर्ता प्रदेश और जिला नेतृत्व के रुख का इंतजार कर रहे हैं.

















