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डूसू चुनाव नतीजों के बाद ईवीएम और निष्पक्षता पर कांग्रेस ने खड़े किए सवाल, तीन प्रमुख मांगें रखींदिल्ली
19 सित॰ 2026, 7:53 pm (40 दिन पहले)· 1

डूसू चुनाव नतीजों के बाद ईवीएम और निष्पक्षता पर कांग्रेस ने खड़े किए सवाल, तीन प्रमुख मांगें रखीं

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 2026 में एनएसयूआई का खाता न खुलने के बाद कांग्रेस ने ईवीएम में गड़बड़ी और प्रशासन के पक्षपातपूर्ण रवैये का आरोप लगाया है। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने पूरी चुनावी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच की मांग की है।

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव 2026 के परिणाम घोषित होते ही राजधानी में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। छात्र संघ के मुख्य पदों में से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के पदों पर 3-0 से बाजी मारी है, जबकि एक पद निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गया है। कांग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) इस चुनाव में एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी। इस निराशाजनक प्रदर्शन के तुरंत बाद कांग्रेस ने दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन और सत्ता पक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिसमें ईवीएम कार्यप्रणाली और चुनावी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।

प्रचार और कॉलेज परिसरों में दोहरे मापदंड के आरोप

दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि पूरी चुनावी प्रक्रिया ने लोकतांत्रिक परंपराओं को नुकसान पहुंचाया है। उनका आरोप है कि अभियान के दौरान एबीवीपी और एनएसयूआई के प्रत्याशियों के साथ स्पष्ट तौर पर अलग-अलग बर्ताव किया गया। कई कॉलेज परिसरों में एनएसयूआई उम्मीदवारों को प्रवेश करने और विद्यार्थियों से संवाद करने से कथित तौर पर रोका गया, जबकि एबीवीपी के उम्मीदवारों को खुली छूट और हर तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं।

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देवेंद्र यादव ने यह मुद्दा भी उठाया कि जब चुनाव आचार संहिता प्रभावी थी, तब भी एबीवीपी को अपनी बैठकों और गतिविधियों के लिए कॉलेज परिसरों और विश्वविद्यालय के बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल करने की छूट कैसे मिली। उन्होंने कहा कि यह दोहरा रवैया प्रशासन की निष्पक्षता पर बहुत बड़ा सवालिया निशान लगाता है।

लिंगदोह समिति के दिशा-निर्देशों और ईवीएम पर उठाए गए सवाल

विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कामकाज को कटघरे में खड़ा करते हुए कांग्रेस की ओर से लिंगदोह समिति की सिफारिशों के खुले उल्लंघन का आरोप भी लगाया गया। देवेंद्र यादव के अनुसार, तय नियमों और लिंगदोह समिति के दिशा-निर्देशों की अनदेखी करने वाले उम्मीदवारों को भी चुनाव लड़ने और प्रचार करने का पूरा अवसर दिया गया। इसके साथ ही उन्होंने मतदान के लिए इस्तेमाल की गई ईवीएम और मतगणना प्रक्रिया की पारदर्शिता पर विद्यार्थियों और उम्मीदवारों द्वारा जताई गई शंकाओं को रेखांकित किया और कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन को इन सभी बिंदुओं पर जवाब देना होगा।

नतीजों के बाद कांग्रेस ने रखीं तीन स्पष्ट मांगें

चुनाव परिणामों के बाद दिल्ली कांग्रेस ने विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष तीन प्रमुख मांगें रखी हैं

  • डीयू चुनाव के दौरान सामने आई तमाम शिकायतों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और पूरी तरह पारदर्शी जांच सुनिश्चित की जाए।
  • आने वाले समय में सभी छात्र संगठनों और प्रत्याशियों के लिए एक समान नियम और बराबरी के अवसर पूरी ईमानदारी से लागू किए जाएं।
  • चुनाव आचार संहिता तथा स्थापित नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों और उम्मीदवारों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

छात्र अधिकारों पर रुख और एबीवीपी का पलटवार

देवेंद्र यादव ने जोर देकर कहा कि विद्यार्थियों के लोकतांत्रिक अधिकारों और छात्र संघ चुनावों की साख के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जाएगा। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि नियम सभी के लिए एक समान क्यों नहीं रहे। हालांकि, एबीवीपी ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे चुनावी हार के बाद कांग्रेस की हताशा करार दिया है।

इस वर्ष के चुनाव परिणाम कई मायनों में अप्रत्याशित रहे। सोशल मीडिया और प्रचार के दौरान एनएसयूआई बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही थी, क्योंकि जंतर-मंतर की घटना और दिल्ली पीजी हॉस्टल हादसे के बाद एबीवीपी पर दबाव माना जा रहा था। इसके बावजूद बीजेपी के स्थानीय नेताओं की सक्रिय भागीदारी और मजबूत प्रचार अभियान ने एबीवीपी को बढ़त दिला दी। दूसरी ओर, कांग्रेस का कोई प्रमुख नेता एनएसयूआई उम्मीदवारों का हौसला बढ़ाने नहीं पहुंचा। इसके अलावा, एनएसयूआई द्वारा टिकट न दिए जाने के बाद विशेष यादव जैसे उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से भी समीकरण प्रभावित हुए।

सवाल-जवाब

डूसू चुनाव 2026 में किस संगठन को सबसे ज्यादा सीटें मिलीं?
डूसू चुनाव 2026 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के पद पर 3-0 से जीत हासिल की, जबकि एक पद निर्दलीय प्रत्याशी को मिला।
चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस ने क्या मुख्य आरोप लगाए हैं?
कांग्रेस ने दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन पर पक्षपात, चुनाव प्रचार में दोहरे मापदंड और ईवीएम की पारदर्शिता को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं।
दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रशासन से क्या तीन मांगें की हैं?
उन्होंने चुनाव शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराने, भविष्य में सभी संगठनों के लिए समान नियम लागू करने और आचार संहिता उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।
कांग्रेस के आरोपों पर एबीवीपी का क्या कहना है?
एबीवीपी ने कांग्रेस और एनएसयूआई के सभी आरोपों को खारिज करते हुए इसे चुनावी हार से उपजी हताशा बताया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Kavya Nair@kavya-nair·40 दिन पहले

छात्र संघ चुनावों में इस तरह के प्रशासनिक पक्षपात और संस्थागत धांधलियों के आरोप केवल राजनीतिक सरगर्मी तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इनका सीधा असर युवा नेतृत्व और सार्वजनिक जीवन की साख पर पड़ता है। जब परिसरों में पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, तो यह शैक्षणिक संस्थानों की लोकतांत्रिक छवि को नुकसान पहुँचाता है और देश के भावी नीति-निर्माताओं के मन में प्रणालीगत निष्पक्षता को लेकर गंभीर अविश्वास पैदा करता है, जो लंबे समय में लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए एक चिंता का विषय है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·40 दिन पहले

डूसू चुनावों में एनएसयूआई की हार के बाद कांग्रेस का यह आक्रामक रुख राष्ट्रीय राजनीति के एक बड़े ट्रेंड को दर्शाता है। जब भी मुख्यधारा के छात्र संगठनों को करारी शिकस्त मिलती है, तो वे वैचारिक हार स्वीकार करने के बजाय प्रशासनिक मशीनरी और ईवीएम पर सवाल खड़े कर देते हैं। इससे छात्र राजनीति में नीतिगत बहसों के बजाय संस्थागत अविश्वास गहराता जा रहा है, जिसका दूरगामी असर विश्वविद्यालय परिसरों की लोकतांत्रिक संस्कृति पर पड़ेगा।

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·40 दिन पहले

अर्जुन के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह प्रवृत्ति सिर्फ कैंपस की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी राजनीतिक परिदृश्य में भी देखने को मिलती है जहाँ चुनाव परिणाम अनुकूल न होने पर लोकतांत्रिक संस्थाओं और मतदान प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना एक आम रणनीति बन गई है। जब छात्र दल वैचारिक पराजय को प्रशासनिक पक्षपात का रूप देते हैं, तो इससे जनता का पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था से भरोसा उठने का जोखिम पैदा होता है, जिसका असर भविष्य की नीतियों और राष्ट्रीय चुनावों पर भी पड़ सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·40 दिन पहले

डूसू चुनावों में एनएसयूआई की हार के बाद कांग्रेस का यह आक्रामक रुख राष्ट्रीय राजधानी की मुख्यधारा की राजनीति में छात्र संगठनों के बढ़ते महत्व को रेखांकित करता है। प्रशासन पर पक्षपात और ईवीएम पर सवाल उठाने से यह साफ है कि पार्टी इस झटके को केवल विश्वविद्यालय स्तर का चुनावी नुकसान नहीं मान रही, बल्कि इसे आने वाले बड़े राजनीतिक संघर्षों के पूर्वाभ्यास के रूप में देख रही है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·40 दिन पहले

डूसू चुनावों में पराजय के तुरंत बाद कानूनी और प्रशासनिक जवाबदेही की मांग करना यह दर्शाता है कि राजनीतिक दल अब छात्र चुनावों को भी मुख्यधारा के कानूनी संघर्षों की तर्ज पर लड़ने लगे हैं। यदि प्रशासन द्वारा इन शिकायतों का समय पर और पारदर्शी समाधान नहीं किया गया, तो यह मामला उच्च न्यायालय या अन्य विधिक मंचों तक खिंच सकता है, जिससे विश्वविद्यालय की साख और प्रशासनिक मशीनरी पर वैधानिक दबाव और अधिक बढ़ जाएगा।

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