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गया के बतसपुर में गंदे पानी का प्राकृतिक उपचार, WSP मॉडल से तालाब बना सिंचाई और मछली पालन का जरियाबिहार
9 सित॰ 2026, 11:03 am (16 दिन पहले)· 5

गया के बतसपुर में गंदे पानी का प्राकृतिक उपचार, WSP मॉडल से तालाब बना सिंचाई और मछली पालन का जरिया

बिहार के गया जिले में स्थित बतसपुर गांव ने सीवेज के गंदे पानी को साफ करने के लिए प्राकृतिक डब्ल्यूएसपी तकनीक अपनाई है। इस मॉडल से तालाब की दुर्गंध दूर हुई है और पानी सिंचाई व मछली पालन के काम आ रहा है।

बिहार के गया जिले अंतर्गत बोधगया प्रखंड में मौजूद बतसपुर गांव ने जल प्रदूषण और सीवेज निस्तारण की गंभीर चुनौती का एक टिकाऊ समाधान ढूंढ निकाला है। लगभग 350 घरों की आबादी वाले इस ग्रामीण क्षेत्र में लंबे समय से नालियों और शौचालयों से निकलने वाला दूषित पानी खुले में बहकर गांव के मुख्य तालाब में जमा होता था। लगभग चार एकड़ के विशाल दायरे में फैले इस जलाशय का पानी अत्यधिक जहरीला और बदबूदार हो चुका था, जिससे आसपास रहने वाले निवासियों का दैनिक जीवन कठिन हो गया था। स्थानीय पंचायत और ग्रामीणों ने अब इस समस्या को दूर करने के लिए पर्यावरण-अनुकूल अपशिष्ट जल उपचार प्रणाली को सफलता पूर्वक लागू किया है।

वेस्ट वाटर स्टेबलाइजेशन पॉन्ड तकनीक की कार्यप्रणाली

गांव में प्रदूषण नियंत्रण के लिए वेस्ट वाटर स्टेबलाइजेशन पॉन्ड (WSP) नामक एक विशेष जैविक तकनीक को अपनाया गया है। यह तकनीक पूरी तरह प्राकृतिक सिद्धांतों पर आधारित है, जिसमें कम लागत में दूषित जल का शोधन किया जाता है। इस व्यवस्था के अंतर्गत गांव के गंदे पानी को एक निश्चित समय सीमा के लिए तालाबनुमा संरचना में एकत्रित किया जाता है। इसके पश्चात सूर्य की किरणों, प्राकृतिक ऑक्सीजन, वातावरण में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया और जैविक प्रक्रियाओं की परस्पर क्रिया से पानी में घुले हानिकारक प्रदूषकों और जैविक कचरे को नष्ट किया जाता है। जल को निरंतर शुद्ध करने के लिए तालाब के एक छोर से पानी निकालकर उसे विशेष रूप से तैयार किए गए चार अलग-अलग चैंबरों से गुजारा जाता है, जिसके बाद शोधित जल पुनः तालाब में वापस चला जाता है।

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कृषि और मछली पालन से ग्रामीणों को दोहरा आर्थिक लाभ

चार स्तरीय चैंबर प्रक्रिया से गुजरने के बाद तालाब का पानी पूरी तरह से साफ और दुर्गंधमुक्त हो जाता है। इस बदलाव से गांव के पर्यावरण में बड़ा सुधार आया है और पहले से मौजूद बदबू की समस्या समाप्त हो गई है। शुद्ध किए गए इस पानी का उपयोग अब गांव के किसान अपने आसपास के खेतों में फसलों की सिंचाई के लिए कर रहे हैं। इसके अलावा स्वच्छ हो चुके तालाब के जल में व्यावसायिक स्तर पर मछली पालन भी शुरू कर दिया गया है। गंदे पानी का उपचार करके उसे आय के साधन में बदलने की इस अनूठी पहल को राज्य के ग्रामीण विकास और जल संरक्षण मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।

बिना रसायन और कम ऊर्जा खपत वाली पर्यावरण-अनुकूल प्रणाली

इस अपशिष्ट जल प्रबंधन मॉडल की सबसे बड़ी खासियत इसकी परिचालन सरलता और न्यूनतम लागत है। इस संपूर्ण उपचार प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल नहीं किया जाता और भारी मशीनों की जरूरत न के बराबर होती है। बिजली की खपत अत्यंत सीमित होने के कारण ग्रामीण पंचायतों के लिए इसे संचालित करना बेहद आसान है। इस प्रणाली के निरंतर कार्य करने से स्थानीय स्तर पर भूमिगत जल स्तर के रीचार्ज होने की संभावनाएं भी काफी बढ़ गई हैं। पंचायत के पूर्व उपमुखिया मनोरंजन प्रसाद समदर्शी ने इस बारे में बात करते हुए कहा, "बिहार का यह पहला मॉडल है जहां गंदे पानी को प्राकृतिक तरीके से साफ कर उपयोग करने लायक बनाया गया है।" यह पहल राज्य के अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।

सवाल-जवाब

बतसपुर गांव में गंदे पानी की क्या समस्या थी?
गांव के करीब 350 घरों की नालियों और शौचालयों का पानी चार एकड़ में फैले तालाब में गिरता था, जिससे पानी प्रदूषित हो गया था और भारी दुर्गंध आती थी।
गंदे पानी को साफ करने के लिए किस तकनीक का इस्तेमाल किया गया है?
पानी को साफ करने के लिए वेस्ट वाटर स्टेबलाइजेशन पॉन्ड (WSP) तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जो सूर्य की रोशनी, ऑक्सीजन और बैक्टीरिया की मदद से पानी शुद्ध करती है।
साफ किए गए पानी का उपयोग किन कामों में हो रहा है?
शोधित पानी का इस्तेमाल गांव के किसान खेतों की सिंचाई के लिए कर रहे हैं और तालाब में मछली पालन भी शुरू किया गया है।
क्या इस पानी को साफ करने में रासायनिक पदार्थों का प्रयोग होता है?
नहीं, यह पूरी तरह से प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें किसी रसायन या भारी बिजली और मशीनों की जरूरत नहीं पड़ती।
चैंबर प्रणाली किस प्रकार काम करती है?
तालाब के पानी को एक तरफ से निकालकर विशेष रूप से बनाए गए चार चैंबरों से गुजारा जाता है, जिससे जैविक गंदगी साफ होकर शुद्ध पानी वापस तालाब में चला जाता है।
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