सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित छात्र विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले एक विद्यार्थी को कारण बताओ नोटिस भेजने पर ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस प्रशासनिक कार्रवाई पर गंभीर आपत्ति व्यक्त करते हुए सवाल किया कि शीर्ष अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद एक मजिस्ट्रेट ऐसा कदम उठाने का दुस्साहस कैसे कर सकता है। मामला गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी (जीबीयू) में पढ़ने वाले छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है, जिन्हें स्थानीय पुलिस रिपोर्ट के आधार पर शांति भंग करने की आशंका जताते हुए भारी-भरकम आर्थिक मुचलका भरने के निर्देश दिए गए थे।
सीजेआई सूर्यकांत ने मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र और आदेश की वैधता पर उठाए सवाल
उच्चतम न्यायालय में जब एक अधिवक्ता ने एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की ओर से जारी इस नोटिस की प्रति पीठ के समक्ष रखी, तो सीजेआई सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी की। सीजेआई ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही छात्र आंदोलन से जुड़ी प्राथमिकियों (एफआईआर) को निरस्त कर चुका है और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व वाले प्रदर्शनों में भाग लेने वाले किसी भी विद्यार्थी के विरुद्ध दंडात्मक कदम उठाने पर रोक लगा चुका है। पीठ ने दोहराया कि जब शीर्ष अदालत का आदेश सभी संबंधित प्राधिकरणों पर बाध्यकारी है, तब कोई भी कार्यकारी अधिकारी उसका उल्लंघन कर किसी छात्र को कारण बताओ नोटिस जारी करने का साहस नहीं कर सकता।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत जारी 5 लाख रुपये के मुचलके का मामला
प्रशासकीय तंत्र की ओर से यह विवादित आदेश 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा आयुक्तालय के तृतीय कार्यकारी मजिस्ट्रेट कार्यालय से जारी किया गया था। यह कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 130 के अंतर्गत की गई, जिसकी नींव सहायक पुलिस आयुक्त की धारा 126 और 135 के तहत प्रस्तुत की गई कार्यवाही पर रखी गई थी। नोटिस में छात्र अक्षत त्रिपाठी को निर्देश दिया गया था कि वे 5 सितंबर को प्रस्तुत होकर स्पष्टीकरण दें कि उनसे अगले 6 महीनों तक शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये का निजी मुचलका तथा समान राशि के दो स्थानीय सक्षम जमानतदार क्यों न जमा कराए जाएं। हालांकि, प्रशासनिक हलकों में विवाद बढ़ने पर पुलिस ने दावा किया कि इस आदेश को 4 सितंबर को ही वापस ले लिया गया था।
पुलिस रिपोर्ट के गंभीर दावे और छात्र अक्षत त्रिपाठी का स्पष्टीकरण
स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा तैयार दस्तावेज के अनुसार, उपनिरीक्षक शिव पांडेय द्वारा तैयार और थाना प्रभारी इकोटेक-1 द्वारा आगे बढ़ाई गई रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि प्रयागराज के झूंसी निवासी अक्षत त्रिपाठी, जो वर्तमान में इकोटेक-1 इलाके में रहकर गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी में अध्ययनरत हैं, परिसर के अन्य विद्यार्थियों को उकसा रहे थे। पुलिस ने दावा किया कि त्रिपाठी सरकार विरोधी और भ्रामक जानकारी प्रसारित कर विश्वविद्यालय में तनावपूर्ण वातावरण निर्मित कर रहे थे, जिससे कानून-व्यवस्था प्रभावित होने का जोखिम था। इसके उलट, अक्षत त्रिपाठी ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर सभी आरोपों का खंडन किया। त्रिपाठी ने कहा कि उन्होंने केवल शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन में भाग लिया था और उस अवधि में विश्वविद्यालय लगभग 3 महीने से बंद था। उन्होंने यह भी बताया कि 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्रवाई में वे चोटिल भी हो गए थे।
न्यायालय का रुख और प्रशासनिक स्तर पर नोटिस निरस्तीकरण की स्थिति
सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि सर्वोच्च अदालत के पूर्व आदेश के आलोक में किसी भी छात्र के खिलाफ दंडात्मक या उत्पीड़नकारी कदम उठाने पर पूर्ण प्रतिबंध लागू है। यद्यपि इकोटेक-1 थाने की पुलिस ने यह स्पष्टीकरण दिया कि मामला संज्ञान में आने के बाद 4 सितंबर को ही संबंधित मजिस्ट्रेट कार्यालय को सूचित कर नोटिस निरस्त करा दिया गया था, लेकिन न्यायपीठ ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि न्यायिक आदेशों की अवहेलना करते हुए ऐसे नोटिस प्रक्रिया में कैसे लाए गए। सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी से यह साफ संदेश गया है कि छात्रों के लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर प्रशासनिक दबाव बनाने की कोशिशों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।



















