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गुरुग्राम में 1970 में गुजरे बुजुर्ग की जमीन फर्जी नाम से बेची, अदालत के दखल पर दर्ज हुई प्राथमिकीहरियाणा
25 सित॰ 2026, 1:55 pm (42 दिन पहले)· 2

गुरुग्राम में 1970 में गुजरे बुजुर्ग की जमीन फर्जी नाम से बेची, अदालत के दखल पर दर्ज हुई प्राथमिकी

हरियाणा के गुरुग्राम में दिसंबर 1970 में दिवंगत हुए चमन लाल की जमीन को चमन राम नाम के हमनाम व्यक्ति के जरिए 2025 में धोखे से बेच दिया गया, जिस पर अदालत ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है।

हरियाणा के गुरुग्राम में जमीन हथियाने की एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाली साजिश का खुलासा हुआ है। लगभग 56 साल पहले दुनिया छोड़ चुके एक व्यक्ति के नाम में हेरफेर कर भूमाफियाओं ने साल 2025 में उनकी कीमती जमीन किसी अन्य व्यक्ति के नाम पंजीकृत करवा दी। इस फर्जीवाड़े की कलई खुलने के बाद जब मामला अदालत में पहुंचा, तो न्यायालय ने पूरे दस्तावेज और रजिस्ट्री को फर्जी करार देते हुए आरोपियों के खिलाफ तत्काल आपराधिक मामला दर्ज करने का कड़ा निर्देश जारी किया है।

विभाजन के दौरान पटौदी में मिली थी पुनर्वास भूमि

इस पूरे मामले की जड़ें देश के बंटवारे के दौर से जुड़ी हुई हैं। विभाजन के वक्त चमन लाल का परिवार विस्थापित होकर गुरुग्राम के पटौदी इलाके में आकर बस गया था। उस समय सरकार की पुनर्वास योजना के तहत उनके परिवार को पटौदी में भूमि आवंटित की गई थी। सरकारी राजस्व दस्तावेजों के अनुसार, मूल भूस्वामी चमन लाल का निधन दिसंबर 1970 में ही हो चुका था। दशकों तक यह जमीन पारिवारिक विरासत का हिस्सा बनी रही, लेकिन हाल ही में जमीन हड़पने वाले गिरोह की नजर इस संपत्ति पर पड़ गई।

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हमनाम बनाकर रची गई फर्जीवाड़े की साजिश

दिसंबर 1970 में चमन लाल की मृत्यु के करीब 56 वर्षों बाद, 2025 में भूमाफियाओं ने एक नया षड्यंत्र रचा। उन्होंने मूल मालिक चमन लाल के नाम से मिलता-जुलता नाम तलाशकर चमन राम नामक व्यक्ति को कागजों में खड़ा कर दिया। फर्जी दस्तावेज तैयार करवाकर उस फर्जी व्यक्ति को जमीन का असली स्वामी दर्शाया गया और फिर पूरी जमीन किसी तीसरे शख्स को बेचकर उसकी रजिस्ट्री भी करा दी गई। पीड़ित पक्ष का सीधा आरोप है कि जब राजस्व अभिलेखों में संपत्ति स्पष्ट रूप से चमन लाल के नाम दर्ज थी, तब तत्कालीन पटवारी और तहसीलदार स्तर के अधिकारियों की मिलीभगत के बिना चमन राम को मालिक दर्शाना संभव ही नहीं था।

अदालती आदेश के बाद शुरू हुई पुलिस जांच

धोखाधड़ी का पता चलने पर पीड़ित परिवार ने न्याय की गुहार लगाई, लेकिन स्थानीय स्तर पर पुलिस चौकी में उनकी सुनवाई नहीं हुई। परिवार की सदस्य आरती मेहता ने बताया कि जब स्थानीय पुलिस ने मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया, तब उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अदालत ने परिजनों द्वारा पेश किए गए ठोस साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद इसे प्रथम दृष्टया फर्जी रजिस्ट्री माना और गुरुग्राम पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का स्पष्ट आदेश दिया।

दोषियों की गिरफ्तारी और जमीन वापसी की मांग

अदालत के निर्देश पर मामला दर्ज होने के बाद अब गुरुग्राम पुलिस इस सिंडिकेट की विस्तृत जांच कर रही है। पीड़ित परिवार की मांग है कि फर्जी रजिस्ट्री में शामिल भूमाफियाओं, गवाहों और तत्कालीन राजस्व अधिकारियों की भूमिका की बारीकी से पड़ताल की जाए। आरती मेहता का कहना है कि जालसाजों ने उनके दादा चमन लाल के अलावा परिवार के कई अन्य सदस्यों के नाम भी बदल दिए थे। पीड़ित पक्ष ने प्रशासन से मांग की है कि मामले के सभी आरोपियों को शीघ्र गिरफ्तार किया जाए और उनकी पुश्तैनी जमीन का मालिकाना हक उन्हें वापस दिलाया जाए।

सवाल-जवाब

यह जमीन विवाद किस जिले और क्षेत्र का है?
यह मामला हरियाणा के गुरुग्राम जिले के अंतर्गत आने वाले पटौदी क्षेत्र का है।
जमीन के मूल मालिक कौन थे और उनका निधन कब हुआ था?
जमीन के मूल मालिक चमन लाल थे, जिनका निधन दिसंबर 1970 में हुआ था।
आरोपियों ने जमीन हथियाने के लिए क्या तरीका अपनाया?
आरोपियों ने 56 साल पहले मृत चमन लाल के मिलते-जुलते नाम वाले चमन राम नामक व्यक्ति को मालिक दिखाकर 2025 में फर्जी दस्तावेजों से रजिस्ट्री कराई।
परिवार को यह जमीन कब और कैसे मिली थी?
विभाजन के समय जब परिवार पटौदी आया था, तब सरकार द्वारा उन्हें यह पुनर्वास भूमि आवंटित की गई थी।
पीड़ित परिवार की ओर से क्या आरोप लगाए गए हैं?
पीड़ित परिवार की आरती मेहता ने आरोप लगाया है कि इस फर्जीवाड़े में तत्कालीन पटवारी और तहसीलदार सहित कई अधिकारियों की मिलीभगत रही है।
मामले में अदालत और पुलिस ने क्या कदम उठाया है?
अदालत ने रजिस्ट्री को फर्जी मानते हुए एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए, जिसके बाद गुरुग्राम पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Vikram Yadav@vikram-yadav·41 दिन पहले

मेरे एक रिश्तेदार की पुश्तैनी जमीन के साथ भी ऐसा ही फर्जीवाड़ा हुआ था। मरे हुए आदमी की जमीन बिकते देख हैरानी होती है कि मिलीभगत कितनी गहरी होगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·42 दिन पहले

अरे भाई, 1970 में मरे आदमी की जमीन 2025 में बिक कैसे गई? बिना पटवारी और तहसीलदार की मिलीभगत के तो ये मुमकिन ही नहीं है। पुलिस ने पहले मामला दर्ज क्यों नहीं किया था, क्या उनके खिलाफ भी कोई कार्रवाई होगी?

Ravikash Gupta@ravikash·42 दिन पहले

अरे अर्जुन भाई, सही पकड़े हैं! बिना स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत के कोई मरा हुआ इंसान थोड़ी रजिस्ट्री करवा सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·42 दिन पहले

1970 में गुजर चुके शख्स की जमीन 2025 में बिक जाना और वो भी हमनाम खड़ा करके, साफ दिखाता है कि रजिस्ट्री ऑफिस और पटवारखाने में बैठे बाबूओं की मिलीभगत के बिना यह मुमकिन ही नहीं था। अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं तब जाकर सुनवाई होती है।

Rohan Verma@rohan-verma·42 दिन पहले

करण भाई, बिल्कुल सही कहा आपने! जब तक नीचे के अधिकारी नहीं मिलेंगे, तब तक कोई मरा हुआ आदमी अपनी जमीन कैसे बेच सकता है?

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