हरियाणा के झज्जर निवासी पर्वतारोही और प्रेरक वक्ता टिंकेश कौशिक ने बचपन में हुए एक भयानक बिजली हादसे के 23 साल बीत जाने के बाद भी न्याय और उचित मुआवजे के लिए अपनी निरंतर लड़ाई साझा की है। दोनों पैर और एक हाथ न होने के बावजूद माउंट एवरेस्ट के बेस कैंप तक पहुंचने वाले दुनिया के पहले व्यक्ति बनने का गौरव हासिल करने वाले टिंकेश आज भी बिजली विभाग की लापरवाही का भारी आर्थिक और शारीरिक खामियाजा उठा रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर विस्तार से बताया कि कैसे बचपन में झेली गई स्थायी दिव्यांगता ने उनके पूरे जीवन को प्रभावित किया है और अदालत द्वारा तय की गई राहत राशि उनके बुनियादी चिकित्सकीय खर्चों को पूरा करने में भी पूरी तरह असमर्थ रही है।
पतंग उड़ाते वक्त 11,000 वोल्ट की हाईटेंशन लाइन से हुआ था हादसा
यह हृदयविदारक घटना 29 दिसंबर 2002 को घटी थी, जब टिंकेश कौशिक महज 9 वर्ष के बालक थे। उस दिन वह अपने घर की छत पर पतंग उड़ा रहे थे। घर की छत से केवल 2 फीट की ऊंचाई पर 11,000 वोल्ट की हाईवोल्टेज बिजली की तारें गुजर रही थीं। पतंग उड़ाने के दौरान वह अचानक इन घातक तारों के संपर्क में आ गए। करंट की चपेट में आने के बाद वह मदद के लिए जोर-जोर से चिल्लाते रहे, परंतु उस वक्त किसी ने उनकी पुकार नहीं सुनी। कुछ समय बाद कोई व्यक्ति उन्हें कार में बैठाकर अस्पताल ले गया। जब उन्हें होश आया तो असहनीय पीड़ा हो रही थी और उसी वक्त उन्हें यह अहसास हुआ कि इस हादसे ने उनके दोनों पैर और हाथ छीन लिए हैं। इस घटना ने उन्हें जीवन भर के लिए गंभीर दिव्यांगता के हवाले कर दिया।
अदालती लड़ाई और मुआवजे की अपर्याप्त रकम
हादसे के उपरांत टिंकेश के परिवार ने बिजली विभाग की इस खुली लापरवाही के खिलाफ न्याय पाने के लिए अदालत की शरण ली। कानूनी प्रक्रिया में उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम को इस दुर्घटना के लिए उत्तरदायी ठहराया गया। शुरुआत में अदालत की ओर से केवल 2 लाख रुपये का मुआवजा तय किया गया था। इस फैसले के खिलाफ परिवार ने अपील दायर की, जिसके पश्चात मुआवजे की राशि बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दी गई। परिवार ने 8 लाख रुपये की मांग रखी थी, लेकिन उस मांग को स्वीकार नहीं किया गया। टिंकेश का कहना है कि दो दशक से अधिक का समय बीतने के बाद भी यह सवाल जस का तस बना हुआ है कि क्या एक बच्चे के पूरे जीवन की बर्बादी और शारीरिक क्षति की कीमत इतनी ही होती है।
कृत्रिम अंगों का खर्च और जीवन भर की चिकित्सा चुनौतियां
टिंकेश कौशिक ने रेखांकित किया कि उनके कृत्रिम अंगों की केवल एक बार की फिटमेंट का खर्च ही अदालत द्वारा दिए गए कुल मुआवजे से कहीं अधिक बैठता है। हर 3 साल के अंतराल पर इन कृत्रिम अंगों को बदलना पड़ता है। इसके अलावा कृत्रिम अंगों के वार्षिक रखरखाव, निरंतर जरूरी दवाओं, पुनर्वास और दिव्यांगता से जुड़े अन्य मेडिकल खर्चों का भारी वित्तीय बोझ हर साल उनके ऊपर पड़ता है। उनका कहना है कि किसी बच्चे को हुई स्थायी दिव्यांगता के मुआवजे का आकलन केवल एकमुश्त छोटी राशि देकर नहीं किया जा सकता। इसके तहत शिक्षा, रोजगार, आजीविका के अवसरों के नुकसान और दैनिक जीवन में दूसरों पर निरंतर निर्भरता जैसे गंभीर पहलुओं का मूल्यांकन होना चाहिए।
कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से सहयोग की अपील
अब एक प्रेरक वक्ता के तौर पर समाज में अपनी पहचान बना चुके टिंकेश कौशिक ने वकीलों, दिव्यांग अधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों से मार्गदर्शन और कानूनी सहायता की गुहार लगाई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 23 वर्ष का लंबा समय बीत जाने के बाद भी उनका देश की न्याय व्यवस्था पर विश्वास अडिग है। वह किसी विशेष उपकार की मांग नहीं कर रहे, बल्कि केवल एक निष्पक्ष सुनवाई चाहते हैं ताकि उनके जीवन पर पड़े 23 वर्षों के प्रभाव को समझा जा सके और स्थायी दिव्यांगता की वास्तविकता के आधार पर उन्हें न्यायसंगत राहत मिल सके।























