हजारों फीट की ऊंचाई पर बादलों के बीच उड़ते किसी कमर्शियल विमान के भीतर जब सब कुछ सामान्य लग रहा हो, तब अचानक कॉकपिट से खूनी संघर्ष और मौत के मंजर की खबर आना किसी भी यात्री के रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है. करीब 180 यात्रियों को लेकर 34 हजार फीट पर उड़ान भर रहे फ्लाई दुबई के विमान में उस वक्त भारी दहशत फैल गई जब सह-पायलट ने मुख्य पायलट पर धारदार चाकू से जानलेवा हमला कर दिया और विमान का नियंत्रण अपने कब्जे में लेने का प्रयास किया. इस हिंसक झड़प के बीच विमान अनियंत्रित होकर बेहद तीव्र गति से नीचे गिरने लगा और महज एक मिनट के भीतर लगभग 17 हजार फीट नीचे आ गया. कॉकपिट में मौजूद मुख्य पायलट और कुछ यात्रियों की जांबाजी के चलते हमलावर सह-पायलट को किसी तरह काबू में किया गया, जिसके बाद विमान से आपातकालीन कोड प्रसारित कर उसे सऊदी अरब के ताबुक हवाई अड्डे पर सुरक्षित उतारा गया. इस रूह कंपा देने वाली घटना के हर तकनीकी और सुरक्षा पहलू पर अनुभवी एविएशन विशेषज्ञ कैप्टन सुजीत ओझा ने कॉकपिट के आंतरिक माहौल और संचालन के तौर-तरीकों का ब्योरा सामने रखा है.
34 हजार फीट पर उड़ान और अचानक गोता लगाने की तकनीकी चुनौती
विमानन सुरक्षा के जानकार कैप्टन सुजीत ओझा के अनुसार जब कोई पैसेंजर प्लेन 34 हजार फीट के क्रूजिंग एल्टीट्यूड पर चल रहा होता है, तो कॉकपिट में चालक दल बेहद शांत माहौल में फ्लाइट पैरामीटर्स की निगरानी करता है. कॉकपिट के मुख्य डिस्प्ले पर विमान की सटीक ऊंचाई, गति, इंजन का प्रदर्शन और दिशा लगातार रीयल-टाइम में दिखती रहती है. सामान्य तौर पर विमान के ऊपर चढ़ते समय स्क्रीन पर गति लगभग 232 नॉट तक दर्ज हो सकती है, जहां एक नॉट का पैमाना 1.852 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार के बराबर बैठता है. ऐसे स्थिर और नियंत्रित सफर के बीच अगर विमान अचानक नीचे की ओर सीधा गोता लगाने लगे, तो यह किसी भयंकर खतरे का स्पष्ट संकेत होता है.
कैप्टन सुजीत ओझा ने स्पष्ट किया कि आसमान में ऐसी विकट परिस्थिति उत्पन्न होते ही पायलटों की सर्वोच्च प्राथमिकता विमान के नियंत्रण को किसी भी कीमत पर फिर से अपने हाथ में लेना होता है. कॉकपिट की स्क्रीन पर नीचे की ओर भागते अल्टीमीटर और बढ़ती रफ्तार को भांपते हुए पायलट को तुरंत यह समझना होता है कि विमान पर किसका जोर चल रहा है और स्टेबलाइजर किस स्थिति में हैं. अनियंत्रित स्थिति को सुधारने के तुरंत बाद ही तयशुदा आपातकालीन प्रोटोकॉल को सक्रिय किया जाता है, ताकि विमान किसी संरचनात्मक नुकसान से बच सके और हवाई यातायात नियंत्रकों को स्थिति से अवगत कराया जा सके.
एक मिनट में 17 हजार फीट नीचे आने का वास्तविक खतरा
फ्लाई दुबई के इस विमान में जिस तेजी से गिरावट दर्ज हुई, वह सामान्य एविएशन इतिहास की सबसे डरावनी स्थितियों में से एक मानी जाती है. केवल साठ सेकंड के समय में 17 हजार फीट नीचे गिर जाना यह दर्शाता है कि विमान लगभग फ्री-फॉल जैसी खतरनाक ढलान पर आ चुका था. कैप्टन ओझा ने बताया कि ऐसी आपात स्थिति में कॉकपिट के अंदर हर एक सेकंड जिंदगी और मौत के बीच का फर्क तय करता है. विमान नीचे गिरते समय उसकी एयरस्पीड काफी तेजी से बढ़ सकती है, जिससे विमान के पंखों और ढांचे पर भयानक दबाव पड़ता है.
पायलट को इस दौरान न केवल विमान को नीचे गिरने से रोकना होता है, बल्कि उसकी गति, झुकाव और दिशा को भी बहुत बारीकी से संभालना पड़ता है ताकि विमान अत्यधिक जी-फोर्स के कारण हवा में बिखर न जाए. अगर विमान सामान्य उड़ान भरते-भरते अचानक नीचे जाने लगे तो पायलट को सबसे पहले यह पहचानना होता है कि यह किसी मानवीय हस्तक्षेप से हो रहा है या ऑटोपायलट की विफलता से. इस पूरे घटनाक्रम में विमान को एक सुरक्षित और स्थिर ऊंचाई पर वापस खींचना ही सबसे बड़ा काम होता है. कैप्टन ओझा के मुताबिक पायलटों को सिम्युलेटर ट्रेनिंग में ऐसे ही असामान्य और तनावपूर्ण हालातों का कड़ा अभ्यास कराया जाता है, जिससे कि वास्तविक जीवन में ऐसी अनहोनी होने पर उनके हाथ बिना किसी देरी के सही कंट्रोल लीवर पर पहुंच सकें.
7700 आपात संकेत का चुनाव और हवाई नियंत्रण की सक्रियता
गंभीर संकट के समय पायलट जमीनी नेटवर्क को कैसे सूचित करते हैं, इस पर रोशनी डालते हुए कैप्टन सुजीत ओझा ने 7700 आपातकालीन कोड के बारे में समझाया. हर वाणिज्यिक विमान में एक उन्नत ट्रांसपोंडर उपकरण लगा होता है, जो विमान के डेटा को सीधे रडार पर प्रसारित करता है. ट्रांसपोंडर के जरिए पायलट एयर ट्रैफिक कंट्रोल यानी हवाई यातायात नियंत्रण को बिना एक शब्द बोले भी अपनी विकट स्थिति का संदेश भेज सकते हैं. कोड 7700 दुनिया भर के विमानन क्षेत्र में एक यूनिवर्सल आपातकालीन संकेत माना जाता है.
जैसे ही पायलट कॉकपिट में ट्रांसपोंडर डायल पर 7700 कोड सेट करते हैं, जमीनी रडार स्क्रीन पर विमान का मार्कर चमकीले लाल रंग या विशेष अलार्म के साथ दिखने लगता है. यह संकेत देखते ही नियंत्रकों को तुरंत पता चल जाता है कि विमान में सवार यात्रियों और चालक दल का जीवन खतरे में है. इसके बाद एयर ट्रैफिक कंट्रोल उस पूरे वायुक्षेत्र में मौजूद अन्य सभी उड़ानों को अलग हटाकर इस प्रभावित विमान को सर्वोच्च लैंडिंग प्राथमिकता देता है. साथ ही निकटतम रनवे को खाली करवाकर वहां दमकल, एंबुलेंस और सुरक्षा बलों की आपातकालीन तैनाती तुरंत पूरी कर ली जाती है, जैसा कि इस मामले में सऊदी अरब के ताबुक हवाई अड्डे पर किया गया.
कॉकपिट में मौजूद कुल्हाड़ी का महत्व और सुरक्षा नियम
विमान के कॉकपिट में आपातकालीन औजार के तौर पर रखी जाने वाली छोटी कुल्हाड़ी को लेकर भी कैप्टन सुजीत ओझा ने अहम जानकारी साझा की. कई लोगों को यह जानकर हैरानी हो सकती है कि आधुनिक तकनीक से लैस विमानों में कुल्हाड़ी क्यों रखी जाती है. कैप्टन ओझा ने बताया कि यह औजार किसी हथियार के रूप में नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से एक जीवन रक्षक उपकरण के तौर पर रखा जाता है. उड़ान के दौरान या किसी दुर्घटना की स्थिति में अगर कॉकपिट या केबिन का कोई इमरजेंसी दरवाजा जाम हो जाए, तारों में शॉर्ट सर्किट के चलते पैनल काटने की जरूरत पड़े या मलबा हटाना हो, तो इसका इस्तेमाल किया जाता है.
बोइंग 737 जैसे लोकप्रिय यात्री विमानों में यह कुल्हाड़ी कॉकपिट के अंदर सह-पायलट की सीट के ठीक पीछे एक विशेष स्थान पर रखी जाती है. यह एक मजबूत केस में सुरक्षित तरीके से बंद रहती है ताकि सामान्य परिस्थितियों में यह हिल न सके. जब भी कोई बड़ी आपात स्थिति आती है, पायलट या क्रू मेंबर इस केस को खोलकर कुल्हाड़ी को तुरंत बाहर निकाल सकते हैं. इसके लिए किसी तरह के शीशे को तोड़ने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि यह एक सुगम और त्वरित रिलीज लॉक के साथ आती है ताकि किसी भी आपात समय में एक पल भी बर्बाद न हो.
कॉकपिट का बुलेटप्रूफ दरवाजा और पायलटों का गहन प्रशिक्षण
कैप्टन ओझा ने कॉकपिट के दरवाजे की जटिल बनावट और सुरक्षा नियमों का विश्लेषण करते हुए बताया कि आधुनिक कमर्शियल विमानों के दरवाजे साधारण दरवाजों जैसे बिल्कुल नहीं होते. 11 सितंबर की आतंकी घटनाओं के बाद विश्व स्तर पर कॉकपिट के दरवाजों को बुलेटप्रूफ और बाहर से पूरी तरह अभेद्य बनाया गया है. कॉकपिट में कौन प्रवेश कर सकता है और कौन नहीं, इसका पूरा नियंत्रण पायलटों के हाथों में मौजूद इलेक्ट्रॉनिक स्विच और पासवर्ड सिस्टम के जरिए संचालित होता है.
फ्लाई दुबई की इस अप्रत्याशित वारदात का जिक्र करते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि जब कॉकपिट के अंदर ही पायलट पर साथी क्रू द्वारा जानलेवा हमला कर दिया जाए, तो वह दुनिया की सबसे जटिल और असहाय परिस्थिति बन जाती है. एक तरफ पायलट को अपने शरीर पर हो रहे चाकू के वार से खुद को बचाना होता है, हमलावर को काबू करना होता है और दूसरी तरफ अपने हाथों से नियंत्रण स्तंभ को थामकर सैकड़ों यात्रियों से भरे भारी-भरकम विमान को नीचे गिरने से भी बचाना होता है. महज कुछ पलों में लिए गए फैसले ही पूरी उड़ान का भविष्य तय करते हैं. कैप्टन सुजीत ओझा के अनुसार एयरलाइन ट्रेनिंग में पायलटों को न केवल सामान्य रूप से उड़ान भरने और तकनीकी त्रुटियों को ठीक करने का प्रशिक्षण दिया जाता है, बल्कि उन्हें कॉकपिट रिसोर्स मैनेजमेंट और ऐसी हिंसक व असामान्य परिस्थितियों में भी मानसिक संतुलन बनाए रखकर त्वरित फैसले लेने के लिए कड़ा अभ्यास कराया जाता है.
















