भारत की तेजी से बढ़ती आर्थिक ताकत और सैन्य आत्मनिर्भरता के बीच वैश्विक मंच पर देश के खिलाफ सक्रिय बाहरी ताकतों को लेकर राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जैसे-जैसे भारत रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में अपनी क्षमताएं बढ़ा रहा है, वैसे-वैसे अंतरराष्ट्रीय हथियार लॉबी की चिंताएं गहराने लगी हैं। उपसभापति के अनुसार देश का आर्थिक और रणनीतिक उभार उन ताकतों के लिए असहज करने वाला है जो दशकों से भारत को केवल एक रक्षा आयात करने वाले बाजार के रूप में देखती आई हैं।
वैश्विक हथियार लॉबी और रक्षा उत्पादन में भारत का आत्मनिर्भर कदम
संसद और सार्वजनिक जीवन के अपने अनुभवों का हवाला देते हुए उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने इस बात पर सवाल उठाया कि वर्ष 2014 से पहले भारत अपनी लगभग सभी प्रमुख सैन्य जरूरतों के लिए विदेशी आपूर्ति पर निर्भर क्यों रहता था। उन्होंने कहा कि बीते कुछ वर्षों में स्थिति में तेजी से बदलाव आया है। आज भारत लड़ाकू विमानों, अत्याधुनिक मिसाइलों, युद्धपोतों और विविध सैन्य साजो-सामान का निर्माण अपनी सीमाओं के भीतर ही कर रहा है।
रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने की इस नीति ने अंतरराष्ट्रीय हथियार निर्माताओं और आपूर्ति कर्ताओं के आर्थिक हितों को प्रभावित किया है। उपसभापति का मानना है कि जो विदेशी संगठन और लॉबी भारत के भारी रक्षा बजट से मुनाफा कमाते थे, वे अब भारत की इस आत्मनिर्भरता से असहज महसूस कर रहे हैं और देश के आर्थिक व सामरिक विकास में रुकावटें पैदा करने की कोशिश कर सकते हैं।
पड़ोसी देशों में चीन का प्रभाव और डीप वाटर पोर्ट्स की रणनीतिक चुनौती
क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य पर चर्चा करते हुए हरिवंश नारायण सिंह ने चीन की विस्तारवादी गतिविधियों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि भारत के आसपास के समुद्री इलाकों में चीन लगभग 8 से 10 डीप वाटर पोर्ट्स का निर्माण कर रहा है। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी मुल्कों के माध्यम से की जा रही ये गतिविधियां असल में भारत को चारों तरफ से घेरने की एक सोची-समझी रणनीतिक कोशिश का हिस्सा हैं।
उन्होंने दिल्ली में हाल ही में लगे कुछ नारों का विशेष उल्लेख किया, जिनमें 'नेपाल के बाद अब भारत' जैसी बातें कही गई थीं। उपसभापति ने सवाल उठाया कि इस प्रकार के घटनाक्रमों को महज एक संयोग नहीं माना जा सकता, बल्कि इसके पीछे बाहरी ताकतों के सुनियोजित प्रभाव और हस्तक्षेप की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
संसदीय गतिरोध और पांच साल के लोकतांत्रिक जनादेश का सम्मान
देश की आंतरिक राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं के संचालन पर बात करते हुए उपसभापति ने संसद में सरकार और विपक्ष के बीच बने गतिरोध पर गहरा अफसोस जताया। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एक ऐतिहासिक संदेश का स्मरण कराया, जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि वैचारिक और राजनीतिक मतभेदों के बावजूद राष्ट्रीय महत्व की बड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए सभी दलों को एक साथ मिलकर काम करना चाहिए।
हरिवंश नारायण सिंह ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों का विरोध करना और चुनाव के माध्यम से उसे चुनौती देना विपक्ष का अधिकार है। हालांकि संसद की कार्यवाही को ठप करना देश के हित में नहीं है। देश की जनता ने सरकार को 5 साल का स्पष्ट जनादेश दिया है और उसे अपना काम करने का पूरा अवसर मिलना आवश्यक है।
मॉनसून सत्र की पृष्ठभूमि और रणनीतिक संदेश
संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक संचालित हुआ था। इस पूरे सत्र के दौरान लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के विभिन्न मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन के कारण लगातार हंगामा और स्थगन देखने को मिला था। दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई के मामले में विपक्ष गृह मंत्री अमित शाह के आधिकारिक बयान की मांग पर अड़ा रहा। हालांकि सरकार चर्चा के लिए तैयार थी, लेकिन दोनों पक्षों के बीच आम सहमति नहीं बन पाई थी।
उपसभापति की यह टिप्पणी केवल संसदीय कार्यवाही के संचालन तक सीमित नहीं है। उन्होंने देश के भीतर होने वाले राजनीतिक गतिरोध को अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य, रक्षा क्षेत्र की आत्मनिर्भरता और सीमा पार चीन के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव से जोड़कर एक बड़े राष्ट्रीय विमर्श को जन्म दिया है।




















