जेल में बंद सुकेश चंद्रशेखर को देश की सर्वोच्च अदालत से भी कोई कानूनी राहत नहीं मिल सकी है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 2 नवंबर 2026 को चंद्रशेखर की उस अर्जी पर विचार करने से साफ मना कर दिया, जिसमें उसने आपराधिक मामले में तय की गई अपनी दोषसिद्धि और सजा के अमल पर रोक लगाने का अनुरोध किया था। यह मामला एक विशेष न्यायाधीश को प्रभावित करने के मकसद से खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज बताकर फोन करने से जुड़ा है।
शीर्ष अदालत में चुनौती और उच्च न्यायालय का पुराना फैसला
जस्टिस जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की और दोषी की मांग को खारिज कर दिया। इससे पहले चंद्रशेखर ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी, जिसमें उसकी दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाने की मांग नामंजूर कर दी गई थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 16 अक्टूबर को उसकी याचिका का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया था कि दोषसिद्धि के आदेश पर रोक लगाने का कोई वैध आधार नहीं बनता है।
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में रेखांकित किया था कि निचली अदालत के मूल निर्णय के खिलाफ अपील पहले से ही लंबित है। ऐसी स्थिति में ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों, प्रतिकूल निष्कर्षों और फैसले में प्रयुक्त शब्दों को लेकर उठाई गई आपत्तियों की विधिवत जांच अपीलीय अदालत के स्तर पर होनी चाहिए। अदालत ने उसे अपनी बात और कानूनी दलीलें संबंधित अपीलीय अदालत के समक्ष रखने की पूरी छूट दी थी।
निचली अदालत का फैसला और आठ साल की सजा का गणित
इस पूरे मामले की जड़ दिल्ली की एक अदालत के फैसले में है, जिसने 20 अगस्त को चंद्रशेखर को सुप्रीम कोर्ट के जज का फर्जी रूप धारण करने के जुर्म में दोषी करार दिया था। इसके बाद अदालत ने 29 अगस्त को सजा का ऐलान करते हुए उसे कुल आठ साल के कारावास का दंड सुनाया था। निचली अदालत ने अपने फैसले में उसकी इस हरकत को ‘संस्थागत अपवित्रता’ करार दिया था।
सजा तय करते समय अदालत ने विभिन्न कानूनी धाराओं के तहत अलग-अलग दंड निर्धारित किए थे। चंद्रशेखर को सार्वजनिक सेवक का रूप धारण करने और एक सार्वजनिक सेवक को डराने-धमकाने के अपराध में दो-दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। इसके अतिरिक्त, गुमनाम संचार के माध्यम से आपराधिक धमकी देने के जुर्म में उसे चार साल की जेल की सजा दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि ये सभी सजाएं एक के बाद एक भुगतनी होंगी, जिससे उसकी कुल जेल अवधि बढ़कर आठ साल हो गई।
2017 का फोन कॉल और न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप का प्रयास
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह समूचा घटनाक्रम 28 अप्रैल, 2017 को किए गए एक फोन कॉल से संबंधित है। उस दौरान चंद्रशेखर भ्रष्टाचार के एक अन्य मामले में पुलिस हिरासत में बंद था। हिरासत में रहते हुए उसने एक पुलिस कांस्टेबल के मोबाइल फोन तक पहुंच बना ली और उसी उपकरण का उपयोग करके विशेष न्यायाधीश पूनम चौधरी के आधिकारिक लैंडलाइन और मोबाइल फोन पर कॉल की। पूनम चौधरी उस समय भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े मुकदमों की सुनवाई कर रही थीं।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, फोन कॉल के दौरान चंद्रशेखर ने शुरुआत में खुद को सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश का निजी सचिव बताया। कुछ ही देर बाद उसने अपनी पहचान बदलकर खुद को सीधे सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बताना शुरू कर दिया। इस धोखाधड़ी का मुख्य उद्देश्य वर्ष 2017 के भ्रष्टाचार मामले में खुद के लिए अनुकूल जमानत आदेश हासिल करना था। निचली अदालत ने निष्कर्ष निकाला था कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी संदेह के यह साबित कर दिया कि अभियुक्त ने न्यायिक प्रक्रिया में अनुचित हस्तक्षेप करने के इरादे से जानबूझकर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की झूठी पहचान अपनाई थी।

















