झीलों के शहर उदयपुर के भटियानी चौहट्टा क्षेत्र में स्थित प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर अपनी स्थापत्य कला और विशिष्ट स्वरूप के लिए विख्यात है. इस तीर्थ स्थल का इतिहास लगभग साढ़े चार सौ वर्षों की प्राचीन विरासत को समेटे हुए है. इस मंदिर की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यहां स्थापित देवी की पाषाण प्रतिमा है, जिसमें मां महालक्ष्मी पारंपरिक कमल पुष्प के बजाय गजराज यानी हाथी की पीठ पर विराजमान दिखाई देती हैं. सफेद पत्थर को तराश कर बनाई गई 31 इंच ऊंची यह दिव्य प्रतिमा दूर-दराज से आने वाले अनगिनत श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा का मुख्य केंद्र है.
महाराणा जगत सिंह के दौर में रानी की अभिलाषा पर हुआ था निर्माण
इस पवित्र देवालय की स्थापना का संबंध मेवाड़ के इतिहास और राजघराने की भक्ति भावना से गहराई से जुड़ा हुआ है. श्रीमाली जाति संपत्ति व्यवस्था ट्रस्ट के सदस्य हेमेन्द्र ने मंदिर के ऐतिहासिक संदर्भ की जानकारी साझा करते हुए बताया कि इसका निर्माण महाराणा जगत सिंह के शासनकाल में संपन्न हुआ था. उस कालखंड में जब उदयपुर में भगवान जगदीश के विशाल मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था, तब तत्कालीन रानी ने अपनी एक विशेष धार्मिक इच्छा प्रकट की थी. उनका मानना था कि जब नारायण का भव्य मंदिर नगर में निर्मित हो रहा है, तो उसी गरिमा के अनुरूप मां महालक्ष्मी का स्वतंत्र देवालय भी अवश्य बनना चाहिए.
रानी के इस पावन संकल्प का सम्मान करते हुए महाराणा जगत सिंह ने महालक्ष्मी मंदिर के निर्माण की आज्ञा दी. मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठापित करने के लिए मां भगवती की विशिष्ट मूर्ति राजस्थान के भीनमाल से विशेष रूप से मंगवाई गई थी. भीनमाल से लाई गई इस प्रतिमा को पूरे शास्त्रोक्त विधि-विधान, मंत्रोच्चार और अनुष्ठान के साथ गर्भगृह में प्राण-प्रतिष्ठित किया गया था, जिसके बाद से आज तक यहां नित्य पूजा-अर्चना की परंपरा निरंतर जारी है.
कमल के बजाय हाथी पर विराजित गजलक्ष्मी स्वरूप का आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक और पौराणिक संदर्भों में मां लक्ष्मी के अधिकांश विग्रह कमल के आसन पर आसीन दिखाई पड़ते हैं, किंतु इस मंदिर में उनका गजराज पर आरूढ़ होना अत्यंत दुर्लभ और विलक्षण माना जाता है. सनातन परंपरा में देवी के इस पावन स्वरूप को गजलक्ष्मी के नाम से पूजा जाता है. भारतीय संस्कृति और शास्त्रों में हाथी को अपार वैभव, शक्ति, ऐश्वर्य, गरिमा और कल्याणकारी शुभता का प्रतीक माना गया है. गजराज पर देवी का यह स्वरूप भक्तों के जीवन में संपन्नता और शक्ति के समन्वय का संदेश देता है.
भौगोलिक और स्थापत्य दृष्टि से यह संपूर्ण मंदिर परिसर लगभग 4200 वर्ग फीट के विस्तृत भूभाग में फैला हुआ है. अपनी साढ़े चार सौ साल पुरानी स्थापत्य संरचना, विशाल प्रांगण और देवी के अद्वितीय स्वरूप के संयोजन ने इस देवालय को क्षेत्र के सबसे प्रमुख धार्मिक स्थलों में प्रतिष्ठित किया है.
भक्तों की मनोकामना और उदयपुर की सांस्कृतिक पहचान
चार शताब्दियों से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी इस मंदिर के प्रति जनसाधारण की आस्था में तनिक भी कमी नहीं आई है. वर्षभर और विशेष रूप से दीपावली जैसे पावन पर्वों पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां शीश नवाते हैं. दर्शनार्थी मां गजलक्ष्मी के समक्ष नतमस्तक होकर अपने परिवार के लिए सुख, शांति, समृद्धि और पारिवारिक खुशहाली का वरदान मांगते हैं. यह ऐतिहासिक धरोहर उदयपुर की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को आज भी पूरी गरिमा के साथ जीवंत बनाए हुए है.





















