जापान की संसद द्वारा जुलाई 2026 में देश की एक वैकल्पिक यानी बैकअप राजधानी तैयार करने के लिए नया कानून पारित करने के बाद, पूरी दुनिया में प्रशासनिक केंद्रों की सुरक्षा और संतुलन को लेकर बहस शुरू हो गई है। जापान में यह निर्णय प्राकृतिक आपदाओं, विशेष रूप से राजधानी टोक्यो में आने वाले विनाशकारी भूकंप के खतरे को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। टोक्यो में आपदा की स्थिति में देश की संपूर्ण शासन व्यवस्था ठप न हो जाए, इसके लिए बैकअप शहर की तलाश की जा रही है। जापान के इस ऐतिहासिक कदम के बाद भारत में भी देश की दूसरी प्रशासनिक राजधानी बनाने की दशकों पुरानी वकालत और मांगों पर फिर से व्यापक चर्चा छिड़ गई है। भारत के संदर्भ में यह बहस प्राकृतिक आपदा से अधिक क्षेत्रीय एकीकरण, दक्षिण भारत के नागरिकों के लिए प्रशासनिक सुगमता और राष्ट्रीय सुरक्षा के रणनीतिक पहलुओं पर केंद्रित रही है।
जापान में बैकअप राजधानी की ज़रूरत क्यों पड़ी?
जापान की संसद द्वारा पारित नया कानूनी फ्रेमवर्क यह व्यवस्था करता है कि मुख्य राजधानी पर संकट आने की स्थिति में शासन के मुख्य अंगों को तुरंत किसी अन्य सुरक्षित शहर में स्थानांतरित किया जा सके। इस दौड़ में ओसाका, फुकुओका, आइची (नागोया) और होक्काइडो का सपोरो जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं। इनमें से ओसाका को अपनी बेहतरीन सुविधाओं, मजबूत बुनियादी ढांचे और वित्तीय ताकत के कारण सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। हालांकि कानून केवल प्रक्रिया और मापदंड तय करता है, जबकि किस शहर को आधिकारिक बैकअप राजधानी का दर्जा मिलेगा, इसका अंतिम निर्णय जापान के प्रधानमंत्री करेंगे। जापान का यह कदम दर्शाता है कि आधुनिक दौर में किसी भी देश का संपूर्ण प्रशासनिक ढांचा केवल एक ही शहर पर निर्भर रहना कितना जोखिम भरा हो सकता है।
भारत में दूसरी राजधानी की मांग और भौगोलिक कारण
भारत में समय समय पर नई दिल्ली के अलावा दक्षिण या मध्य भारत में एक दूसरी राजधानी स्थापित करने की आवाज उठती रही है। जापान और भारत की स्थिति में मुख्य अंतर यह है कि जहां जापान की मुख्य चिंता टोक्यो में भूकंपीय जोखिम है, वहीं भारत में यह मुद्दा उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच की दूरी को कम करने, क्षेत्रीय संतुलन बनाने और देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने से जुड़ा है। भारत का क्षेत्रफल अत्यधिक विस्तृत है और देश का वर्तमान प्रशासनिक केंद्र नई दिल्ली उत्तर भारत के सुदूर किनारे पर स्थित है। इस कारण देश के दक्षिणी राज्यों के निवासियों को प्रशासनिक और न्यायिक कार्यों के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
1955 में डॉ बी आर अंबेडकर ने क्यों की थी हैदराबाद की वकालत?
भारत की दूसरी राजधानी की आवश्यकता पर सबसे मजबूत और तार्किक वकालत भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार डॉ बी आर अंबेडकर ने की थी। वर्ष 1955 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स' (भाषाई राज्यों पर विचार) में उन्होंने नई दिल्ली को देश की इकलौती राजधानी बनाए रखने से जुड़ी कई गंभीर प्रशासनिक और रणनीतिक कमियों को रेखांकित किया था। डॉ अंबेडकर का मानना था कि दक्षिण भारत में रहने वाले आम नागरिकों के लिए दिल्ली की यात्रा करना न केवल समय और धन के दृष्टिकोण से कठिन है, बल्कि यह दूरी उन्हें राष्ट्रीय प्रशासनिक मुख्यधारा से दूर महसूस कराती है।
इसके अलावा डॉ अंबेडकर ने नई दिल्ली के मौसम को भी प्रशासनिक कामकाज के लिए चुनौतीपूर्ण बताया था, जहां भीषण गर्मी और कड़ाके की ठंड दोनों ही चरम सीमा पर होती हैं। सुरक्षा के दृष्टिकोण से उन्होंने सचेत किया था कि दिल्ली देश की उत्तरी सीमा के काफी करीब स्थित है, जिससे युद्ध या अंतरराष्ट्रीय तनाव की स्थिति में पड़ोसी देशों द्वारा हवाई बमबारी या हमले की आसान पहुंच के दायरे में आ जाती है। इन समस्याओं के समाधान के रूप में उन्होंने हैदराबाद को भारत की दूसरी राजधानी बनाने का ठोस प्रस्ताव रखा था। उनके अनुसार हैदराबाद भारत के केंद्र में स्थित है, जहां आधुनिक बुनियादी ढांचा मौजूद है, यह सामरिक दृष्टि से सुरक्षित है और यहां उत्तर व दक्षिण की एक मिली जुली गंगा-जमुनी संस्कृति पाई जाती है जो देश के एकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
2018 में कर्नाटक सरकार ने बेंगलुरु को लेकर प्रधानमंत्री से क्या कहा था?
डॉ अंबेडकर के विचारों के दशकों बाद, वर्ष 2018 में भी दक्षिण भारत में दूसरी राजधानी बनाने का मुद्दा आधिकारिक रूप से उठा था। कर्नाटक के तत्कालीन आवास मंत्री एम कृष्णप्पा ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक औपचारिक पत्र लिखकर बेंगलुरु को देश की दूसरी राजधानी या दक्षिण भारत का मुख्य प्रशासनिक केंद्र घोषित करने का आग्रह किया था। इस मांग के समर्थकों का कहना था कि बेंगलुरु को दूसरी राजधानी बनाने से दक्षिण भारत के राज्यों का राष्ट्रीय राजनीति और शासन में बेहतर समावेश होगा।
कर्नाटक सरकार के पत्र में यह तर्क दिया गया था कि बेंगलुरु वैश्विक स्तर पर एक स्थापित प्रौद्योगिकी केंद्र है, जहां का मौसम पूरे वर्ष सुहावना और अनुकूल रहता है। साथ ही शहर की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर का इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित हो चुका है। इन सभी विशेषताओं के कारण बेंगलुरु दक्षिण भारत के लिए देश का आदर्श प्रशासनिक मुख्यालय बन सकता है, जिससे दिल्ली पर से दबाव भी कम होगा।
अंतरराष्ट्रीय मॉडल: दो शहरों से सरकार चलाने का तरीका
दुनिया भर के कई विकसित देशों ने शासन व्यवस्था को सुगम बनाने और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं में संतुलन बनाए रखने के लिए अपनी शक्ति और सरकारी संस्थानों को एक से अधिक शहरों में विभाजित किया है। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण नीदरलैंड्स में देखने को मिलता है। नीदरलैंड्स की आधिकारिक और संवैधानिक राजधानी एम्स्टर्डम है, लेकिन देश की संसद, कार्यकारी सरकार के मुख्य कार्यालय और सुप्रीम कोर्ट जैसे सर्वोच्च संस्थान 'द हेग' शहर में स्थित हैं। इस मॉडल से नीदरलैंड्स ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को एम्स्टर्डम में बनाए रखा है, जबकि प्रशासनिक और न्यायिक गतिविधियों को द हेग से कुशलतापूर्वक संचालित किया जाता है।
क्या नई दिल्ली की जगह पूरी राजधानी बदलना संभव है? जानिए व्यावहारिक विकल्प
यदि भारत के वर्तमान परिदृश्य की बात की जाए तो नई दिल्ली से पूरी राजधानी को किसी अन्य शहर में स्थानांतरित करने की संभावना बहुत कम है। इसका मुख्य कारण यह है कि नई दिल्ली में दशकों से प्रशासनिक बुनियादी ढांचे पर अरबों रुपये का भारी निवेश किया जा चुका है। हाल ही में सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के माध्यम से नया संसद भवन और केंद्रीय सचिवालय परिसर का निर्माण भी नई दिल्ली में ही किया गया है। इतने बड़े पैमाने पर हुए ढांचागत निवेश के बाद राजधानी को पूरी तरह से हटाना व्यावहारिक और आर्थिक रूप से अत्यधिक कठिन है।
हालांकि नई दिल्ली को पूरी तरह बदले बिना उन मूल समस्याओं का समाधान किया जा सकता है जिनके कारण दूसरी राजधानी की मांग उठती है। इसके लिए आधुनिक नीति विशेषज्ञों और विचारकों द्वारा मुख्य रूप से दो व्यावहारिक सुझाव दिए जाते हैं
- दक्षिण भारत में संसद सत्रों का आयोजन: जैसे महाराष्ट्र सरकार अपनी राज्य विधानसभा का शीतकालीन सत्र नियमित रूप से नागपुर में आयोजित करती है, ठीक उसी तर्ज पर भारत की संसद का शीतकालीन या मानसून सत्र दक्षिण भारत के किसी प्रमुख शहर में आयोजित किया जा सकता है। इससे दक्षिण भारत के राज्यों के साथ जुड़ाव बढ़ेगा।
- सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय स्थायी बेंचें: देश के सभी नागरिकों के लिए न्याय सुलभ और किफायती बनाने हेतु चेन्नई, मुंबई और कोलकाता जैसे प्रमुख महानगरों में सुप्रीम कोर्ट की स्थायी क्षेत्रीय शाखाएं स्थापित की जा सकती हैं। इससे दूर दराज के लोगों को याचिकाएं दायर करने के लिए बार बार दिल्ली आने की बाध्यता से मुक्ति मिलेगी और न्यायिक प्रक्रिया तेज होगी।



















