पूर्वी राजस्थान का करौली जिला अपने खूबसूरत लाल पत्थर की वजह से पूरे देश में एक खास पहचान रखता है। इसी प्रसिद्ध पत्थर को यहां के एक हुनरमंद युवा कलाकार ने अपनी कला के जरिए एक बिल्कुल नया रूप दे दिया है। करौली के रहने वाले गजानंद सैनी लाल पत्थर पर बेहतरीन नक्काशी करके प्राचीन राजशाही दौर की तोपें तैयार कर रहे हैं, जिन्हें देखकर हर किसी की नजरें उन पर टिक जाती हैं।
युद्ध के मैदान से निकलकर राजमहलों तक पहुंचा सफर
इतिहास के पन्नों में कभी युद्ध के मैदान में बारूद बरसाने वाली और तबाही मचाने वाली तोपें आज इस युवा कलाकार के हाथों से तराशकर राजमहलों, बड़ी हवेलियों और आलीशान इमारतों की शान बढ़ा रही हैं। गजानंद पिछले कई लंबे वर्षों से लाल पत्थर पर नक्काशी के इस बारीक काम से जुड़े हुए हैं। उन्होंने यह नायाब कला अपने पूर्वजों से विरासत में सीखी है और वक्त के साथ अपनी मेहनत से इस हुनर को और अधिक निखारा है।
पत्थर को तोप का रूप देने की अनूठी कला
आमतौर पर जहां दूसरे कारीगर लाल पत्थर से पारंपरिक जालियां, आकर्षक मूर्तियां और अन्य सजावटी सामान बनाते हैं, वहीं गजानंद ने इसी सख्त पत्थर को प्राचीन तोप का आकार देने की अद्भुत कला विकसित की है। यही अनोखा काम उनकी पहचान बन गया है। गजानंद के मुताबिक पुराने समय में तोपें मुख्य रूप से विभिन्न धातुओं से बनाई जाती थीं, लेकिन वह उसी ऐतिहासिक तोप की आकृति को करौली के स्थानीय और देश भर में मशहूर लाल पत्थर पर बेहद खूबसूरती से उकेरते हैं।
मशीनों और हाथों की कला का मेल
इस तरह की कलाकृति तैयार करने की प्रक्रिया काफी मेहनत और समय मांगती है। इसके लिए पत्थर की शुरुआती कटाई और उसे भारी आकार देने के लिए मशीनों की मदद ली जाती है, जबकि तोप की बारीक डिजाइन और नक्काशी का सबसे महत्वपूर्ण काम पूरी तरह से हाथों से किया जाता है। गजानंद के अनुसार उनके हाथों से बनी लाल पत्थर की इन तोपों की डिमांड सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात समेत देश के कई अन्य राज्यों से भी खरीदार इन्हें मंगवाते हैं।
विशाल तोपों की कीमत और निर्माण का समय
करौली के ऐतिहासिक राजमहल समेत राजस्थान के कई अन्य शाही महलों और पुरानी इमारतों में गजानंद द्वारा तराशी गई लाल पत्थर की तोपों को सजाया गया है। गजानंद बताते हैं कि लाल पत्थर की एक विशाल तोप का जोड़ा तैयार करने में लगभग 30 दिन यानी पूरे एक महीने का समय लग जाता है। एक बड़ी तोप की कीमत करीब 60 हजार रुपए होती है, जबकि एक जोड़े की कुल कीमत लगभग 1.20 लाख रुपए तक रहती है।
हथियार से लेकर कला के बेजोड़ नमूने तक का सफर
गजानंद का कहना है कि अतीत के राजशाही दौर में जहां तोपों का इस्तेमाल युद्ध में दुश्मन पर गोले दागने के लिए होता था और वे धातु की बनी होती थीं, वहीं आज उनकी बनाई हुई तोपें युद्ध का साधन न होकर कला का एक बेहतरीन नमूना बन चुकी हैं। लाल पत्थर से बनी ये तोपें बड़ी इमारतों और महलों में सजावट के साथ-साथ पर्यटकों और आगंतुकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बन रही हैं। कई जगहों पर लोग इनके साथ तस्वीरें खिंचवाते और फोटोशूट करवाते नजर आते हैं।
पारंपरिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं कलाकार
करौली की माटी से निकलने वाले लाल पत्थर को अपनी रचनात्मकता से नया आयाम देकर गजानंद न सिर्फ अपनी पुश्तैनी नक्काशी की परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं, बल्कि इसी हुनर को अपनी आजीविका का मजबूत जरिया बनाकर करौली का नाम पूरे देश में रोशन कर रहे हैं। तोपों के अलावा गजानंद मंदिरों के लिए नक्काशीदार जाली और झरोखे जैसी दर्जनों अलग-अलग प्रकार की विशेष वस्तुएं भी तैयार करते हैं।



















