कर्नाटक में इस बार मानसून की कमजोर स्थिति ने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है, जिसके कारण राज्य में खेती और बिजली दोनों क्षेत्रों में गंभीर चुनौतियां पैदा हो गई हैं। सामान्य से बहुत कम बारिश होने की वजह से राज्य के प्रमुख जलाशयों का जलस्तर काफी नीचे चला गया है, जिससे ग्रामीण इलाकों में त्राहि-त्राहि मची हुई है। राज्य के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कनकपुरा के अपने दौरे के दौरान इस गंभीर स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले समय में कर्नाटक के लोगों को पीने के पानी और बिजली की भारी किल्लत का सामना करना पड़ सकता है। सरकार ने वर्तमान स्थिति को देखते हुए अब तक 100 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है, जबकि अन्य क्षेत्रों की स्थिति का आकलन करने के लिए सर्वे का काम तेजी से किया जा रहा है। फसलों के सूखने और भूजल स्तर के पाताल में चले जाने से संकट दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है, जिससे निपटने के लिए प्रशासनिक अमला लगातार कोशिशें कर रहा है।
सूखे की मार से बेहाल ग्रामीण कर्नाटक और दम तोड़ती फसलें
कर्नाटक के ग्रामीण अंचलों में सूखे का असर अब साफ तौर पर दिखने लगा है, जिससे किसानों की कमर टूट गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य के 100 तालुकों को पहले ही आधिकारिक तौर पर सूखा प्रभावित घोषित किया जा चुका है। अन्य बचे हुए हिस्सों में भी मिट्टी की नमी और फसलों की स्थिति का वैज्ञानिक आधार पर मूल्यांकन किया जा रहा है ताकि उन्हें भी जरूरत पड़ने पर राहत सूची में शामिल किया जा सके। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बताया कि इस साल भूजल स्तर ऐतिहासिक रूप से काफी नीचे चला गया है, जिससे सिंचाई के पारंपरिक साधन भी पूरी तरह से सूख गए हैं। इस सूखे का सबसे बड़ा असर खरीफ फसलों पर पड़ा है। राज्य के कई जिलों में बारिश समय पर न होने के कारण किसान खेतों में बुवाई तक नहीं कर पाए। वहीं, जिन किसानों ने बैंकों या साहूकारों से कर्ज लेकर फसलों की बुवाई की थी, उनकी खड़ी फसलें पानी की कमी के कारण खेतों में ही सूखकर बर्बाद हो गई हैं। इसके अलावा, राज्य के बड़े बांधों और जलाशयों में पानी का भंडारण अपने न्यूनतम स्तर पर आ गया है, जिससे आने वाले महीनों में शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में पेयजल संकट गहराने की पूरी आशंका है।
बिजली की भारी किल्लत और 19,000 मेगावाट से पार पहुंची मांग
बारिश की कमी का सीधा और सबसे बड़ा प्रहार कर्नाटक के ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ा है। कर्नाटक अपनी बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी हद तक जल विद्युत परियोजनाओं पर निर्भर रहता है। लेकिन इस साल जलाशयों में पानी की भारी कमी के कारण इन संयंत्रों में बिजली का उत्पादन बहुत ज्यादा घट गया है। दूसरी तरफ, खेतों में लगी अपनी सूखती फसलों को बचाने के लिए किसानों को मजबूरन दिन-रात ट्यूबवेल और सिंचाई पंप चलाने पड़ रहे हैं। इन दोहरे कारणों से राज्य में बिजली की मांग अचानक बढ़कर 19,000 मेगावाट के स्तर को भी पार कर गई है। शाम के समय, जब बिजली की खपत अपने चरम पर होती है, तब इस भारी लोड को संभालना राज्य के ऊर्जा विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। ग्रिड को ट्रिप होने या ब्लैकआउट की स्थिति से बचाने के लिए ऊर्जा विभाग को हर संभव प्रयास करने पड़ रहे हैं।
महंगे दामों पर बिजली खरीदने की मजबूरी और वैकल्पिक उपाय
राज्य में बिजली की इस भारी कमी को दूर करने और ग्रिड को सुरक्षित रखने के लिए सरकार को बहुत ऊंचे दामों पर बाहरी स्रोतों से बिजली खरीदनी पड़ रही है। डीके शिवकुमार ने खुलासा किया कि संकट के इस दौर में सरकार पीक आवर्स के दौरान 11 से 13 रुपये प्रति यूनिट की अत्यधिक महंगी दर पर बिजली खरीदने को मजबूर है। इस वित्तीय और ऊर्जा संकट से पार पाने के लिए राज्य के ऊर्जा मंत्री केजे जॉर्ज को पड़ोसी राज्यों से तत्काल बातचीत करने और बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके साथ ही, कर्नाटक सरकार अपने थर्मल पावर प्लांटों में उत्पादन बढ़ाने की रणनीतियों पर काम कर रही है। इसके लिए कोयला उत्पादक राज्यों से अतिरिक्त कोयला और बिजली लेने के विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है। भारत के 'वन नेशन, वन ग्रिड' सिस्टम का उपयोग करके देश के अन्य हिस्सों से कर्नाटक तक बिजली लाने की योजना बनाई गई है, हालांकि इसके लिए राज्य को आवश्यक ट्रांसमिशन शुल्क का भुगतान करना होगा। सरकार का मानना है कि राज्य में आ रहे नए निवेशकों की मांग को पूरा करने और आर्थिक विकास की गति को बनाए रखने के लिए बिजली की निर्बाध आपूर्ति बेहद जरूरी है, चाहे इसके लिए कितनी भी बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।
किसानों की समस्याओं पर चर्चा के लिए तीन दिवसीय विशेष सत्र
किसानों के इस भीषण संकट और सूखे से हुए भारी नुकसान को ध्यान में रखते हुए सरकार ने एक बड़ा विधायी कदम उठाया है। कर्नाटक सरकार ने 21 से 23 सितंबर तक राज्य विधानसभा का एक विशेष सत्र बुलाने का निर्णय लिया है। इस तीन दिवसीय विशेष सत्र में से पूरे दो दिन केवल और केवल किसानों की समस्याओं, फसल नुकसान और सूखे के हालातों पर चर्चा के लिए आरक्षित किए गए हैं। उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि इस संवेदनशील मुद्दे पर सरकार किसी भी तरह की राजनीति नहीं होने देगी। सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के विधायकों को अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों की जमीनी हकीकत और किसानों की समस्याओं को सदन के पटल पर रखने का पूरा अवसर मिलेगा। सरकार ने भरोसा दिलाया है कि जिन क्षेत्रों में सूखे के तय सरकारी मापदंड पूरे पाए जाएंगे, उन्हें बिना किसी देरी के राहत सूची में जोड़ा जाएगा और प्रभावित किसानों के लिए राहत पैकेज व मुआवजे की घोषणा की जाएगी।
प्रशासनिक सक्रियता और 'प्रजा सेवा' के जरिए जनता तक पहुंच
सूखे से निपटने के साथ-साथ कर्नाटक सरकार प्रशासनिक स्तर पर भी कई महत्वपूर्ण बदलाव और नए प्रयोग कर रही है। इसी कड़ी में, 18 सितंबर को तटीय जिले दक्षिण कन्नड़ में राज्य मंत्रिमंडल की एक विशेष बैठक आयोजित की जा रही है। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करना और ग्रामीण युवाओं को रोजगार देकर शहरों की तरफ होने वाले पलायन को रोकना है। अपने कनकपुरा दौरे के दौरान डीके शिवकुमार ने सरकारी हॉस्टलों का औचक निरीक्षण भी किया, जहां उन्होंने छात्रों के रहने की व्यवस्था और उनके भविष्य को लेकर अधिकारियों को जरूरी निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी संस्थानों के भरोसे छोड़ते हैं, इसलिए सरकार की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह इस भरोसे को पूरी तरह से कायम रखे। इसके अतिरिक्त, सरकार 'प्रजा सेवा' नाम से एक विशेष अभियान शुरू करने जा रही है, जिसके तहत विधायक और प्रशासनिक अधिकारी सीधे गांवों का दौरा करेंगे, लोगों के घर जाकर उनकी समस्याओं को सुनेंगे और सरकारी जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ तुरंत उन तक पहुंचाना सुनिश्चित करेंगे।

















