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जयपुर का 250 साल पुराना मंदिर जहाँ सिंदूर नहीं, दूध से होता है बप्पा का अभिषेक और सूर्य किरणें छूती हैं चरणराजस्थान
12 सित॰ 2026, 10:01 am (13 दिन पहले)· 1

जयपुर का 250 साल पुराना मंदिर जहाँ सिंदूर नहीं, दूध से होता है बप्पा का अभिषेक और सूर्य किरणें छूती हैं चरण

जयपुर के सूरजपोल मंडी में स्थित श्रीश्वेत सिद्धिविनायक मंदिर अपने अनूठे दुग्धाभिषेक और सूर्य की पहली किरण द्वारा गणपति के चरणों को छूने की अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है।

जयपुर को अपनी भव्य ऐतिहासिक इमारतों, सुंदर महलों और अनूठी सांस्कृतिक विरासत के कारण पूरी दुनिया में 'गुलाबी नगरी' के रूप में जाना जाता है। लेकिन इस शहर की एक और पहचान है जो इसे बेहद खास बनाती है। अपनी गहरी धार्मिक आस्था और असंख्य प्राचीन मंदिरों की मौजूदगी के कारण इस ऐतिहासिक शहर को 'छोटी काशी' के नाम से भी पुकारा जाता है। गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर यहाँ के देवालयों में श्रद्धा का एक अनूठा सैलाब देखने को मिलता है। इसी भक्तिमय माहौल के बीच, जयपुर के सूरजपोल मंडी क्षेत्र में स्थित श्रीश्वेत सिद्धिविनायक मंदिर श्रद्धालुओं के आकर्षण का एक बहुत बड़ा केंद्र बना हुआ है। ढाई सौ वर्षों से भी अधिक पुराने इस मंदिर की अपनी कुछ ऐसी अलौकिक विशेषताएं हैं जो इसे राजस्थान के अन्य सभी गणेश मंदिरों से पूरी तरह अलग और विशिष्ट बनाती हैं।

सफेद संगमरमर से निर्मित भव्य मंदिर और सूर्य किरणों का चमत्कार

सूरजपोल मंडी के समीप जयपुर के पुराने परकोटे के भीतर स्थापित श्रीश्वेत सिद्धिविनायक मंदिर की ऐतिहासिकता अत्यंत गौरवशाली है। इस मंदिर का निर्माण पूरी तरह से सफेद संगमरमर से किया गया है, जिसके कारण इसे श्वेत सिद्धिविनायक के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की स्थापत्य कला की सबसे बड़ी विशेषता भगवान गणेश की प्रतिमा की स्थिति और सूर्य की किरणों के साथ उसका तालमेल है। प्रतिदिन सुबह जब सूर्य देव उदित होते हैं, तो उनकी सबसे पहली किरण सीधे गर्भगृह में प्रवेश करती है। यह चमकीली किरण सीधे विघ्नहर्ता गणपति की प्रतिमा के चरणों का स्पर्श करती है। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए लोग सुबह-सुबह मंदिर में एकत्र होते हैं। श्रद्धालुओं का दृढ़ विश्वास है कि सूर्य की इन पहली किरणों का प्रभु के चरणों को छूना भगवान गणेश का सीधे ब्रह्मांड से मिलने वाला एक विशेष आशीर्वाद है, जो भक्तों के जीवन के अंधकार को दूर करता है।

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सिंदूर के स्थान पर दुग्धाभिषेक की अनूठी परंपरा

आमतौर पर जब भी हम किसी गणेश मंदिर में जाते हैं, तो वहां भगवान गणेश की मूर्ति पर सिंदूर और चोला चढ़ाने की प्रथा देखते हैं। सनातन धर्म में सिंदूर को गणपति पूजा का एक अनिवार्य हिस्सा माना गया है। परंतु, इस प्राचीन श्रीश्वेत सिद्धिविनायक मंदिर में परंपराएं थोड़ी भिन्न और बेहद सौम्य हैं। यहाँ भगवान गणेश का अभिषेक सिंदूर से नहीं किया जाता है। इसके विपरीत, यहाँ प्रतिदिन बप्पा का अभिषेक शुद्ध दूध से करने की प्राचीन परंपरा चली आ रही है। दूध के साथ-साथ भगवान को दूब यानी हरी घास अर्पित करना यहाँ की पूजा पद्धति का सबसे मुख्य अंग माना जाता है। विशेष रूप से गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर इस दुग्धाभिषेक का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस पावन दिन पर सुबह के समय से ही मंदिर के कपाट खुलते ही भक्तों की लंबी कतारें लग जाती हैं। हर कोई बप्पा के इस अनोखे रूप के दर्शन करने और उनके दुग्धाभिषेक की रस्म का गवाह बनने के लिए व्याकुल रहता है।

जयपुर के राजघराने से जुड़ा ऐतिहासिक संदर्भ

इस ऐतिहासिक मंदिर का इतिहास केवल आम लोगों की आस्था तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध जयपुर के शाही राजघराने से भी रहा है। लोक मान्यताओं के अनुसार, जयपुर के तत्कालीन राजा सवाई रामसिंह भगवान गणेश के परम भक्त थे। उनकी आस्था इस मंदिर के प्रति इतनी गहरी थी कि वे जब भी किसी अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य की शुरुआत करते थे या किसी नए अभियान पर निकलते थे, तो वे सबसे पहले सूरजपोल स्थित इस मंदिर में आते थे। राजा सवाई रामसिंह यहाँ आकर भगवान सिद्धिविनायक का अपने हाथों से दुग्धाभिषेक करते थे और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद ही अपने कार्यों को आगे बढ़ाते थे। मंदिर की स्थापना के विषय में क्षेत्र में कई तरह की लोककथाएं और प्राचीन मान्यताएं प्रचलित हैं, लेकिन बप्पा के प्रति लोगों की यह अगाध श्रद्धा पीढ़ियों से बिना किसी बदलाव के लगातार चली आ रही है।

सात बुधवार की साधना और मनोकामना पूर्ति का विश्वास

श्रीश्वेत सिद्धिविनायक मंदिर में केवल त्योहारों के समय ही नहीं, बल्कि सामान्य दिनों में भी भक्तों का तांता लगा रहता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के बीच एक बहुत ही लोकप्रिय और अटूट विश्वास जुड़ा हुआ है। मान्यताओं के अनुसार, यदि कोई भक्त लगातार सात बुधवार तक पूरी निष्ठा और सच्चे मन से मंदिर आकर भगवान गणेश के दर्शन करता है, तो उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं। बुधवार का दिन भगवान गणेश की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है, इसलिए इस दिन यहाँ विशेष रौनक रहती है। जयपुर के स्थानीय निवासियों के अलावा देश के कोने-कोने से आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु भी इस चमकारी मंदिर की ख्याति सुनकर यहाँ बप्पा के दर पर माथा टेकने आते हैं। गणेश चतुर्थी के दौरान तो मंदिर की सजावट और भव्यता देखने लायक होती है, जहाँ चारों ओर मंत्रोच्चार और बप्पा के जयकारों की गूंज सुनाई देती है।

सवाल-जवाब

श्रीश्वेत सिद्धिविनायक मंदिर जयपुर में कहाँ स्थित है?
यह मंदिर जयपुर के परकोटा क्षेत्र में सूरजपोल मंडी के पास स्थित है।
इस मंदिर को श्वेत सिद्धिविनायक क्यों कहा जाता है?
इस प्राचीन मंदिर का निर्माण पूरी तरह से सफेद संगमरमर से हुआ है, इसलिए इसे श्वेत सिद्धिविनायक कहा जाता है।
मंदिर में सूर्य की किरणों से जुड़ी क्या मान्यता है?
प्रतिदिन सुबह सूर्य की पहली किरण सीधे गर्भगृह में प्रवेश करके भगवान गणेश की प्रतिमा के चरणों का स्पर्श करती है।
यहाँ बप्पा की पूजा में कौन सी अनूठी परंपरा निभाई जाती है?
यहाँ भगवान गणेश का अभिषेक सिंदूर से नहीं बल्कि दूध से किया जाता है और उन्हें दूब अर्पित की जाती है।
इस मंदिर का जयपुर राजघराने से क्या संबंध है?
मान्यता है कि जयपुर के राजा सवाई रामसिंह भगवान गणेश के भक्त थे और किसी भी शुभ कार्य से पहले यहाँ आकर दुग्धाभिषेक करते थे।
सात बुधवार तक यहाँ दर्शन करने की क्या मान्यता है?
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि लगातार सात बुधवार तक यहाँ सच्चे मन से दर्शन करने पर मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं।
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