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जोधपुर में आयोजित सम्मेलन में सीजेआई सूर्यकांत का बड़ा बयान, लॉ छात्रों को AI के इस्तेमाल पर दी महत्वपूर्ण सलाहराजस्थान
16 अग॰ 2026, 8:00 pm (39 दिन पहले)· 2

जोधपुर में आयोजित सम्मेलन में सीजेआई सूर्यकांत का बड़ा बयान, लॉ छात्रों को AI के इस्तेमाल पर दी महत्वपूर्ण सलाह

जोधपुर में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज के कुलपति सम्मेलन- 2.0 को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने एआई पर पूर्ण प्रतिबंध के बजाय जिम्मेदार इस्तेमाल पर बल दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक से न्याय प्रक्रिया तेज होनी चाहिए लेकिन निष्पक्षता और मानवीय विवेक से समझौता नहीं होना चाहिए।

आधुनिक न्याय प्रणाली और कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती पैठ के बीच देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश दिया है। जोधपुर स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU) में आयोजित प्रतिष्ठित कुलपति सम्मेलन- 2.0 को संबोधित करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि कानूनी पेशा अब तकनीकी प्रगति से दूरी बनाने या उसे अपनाने में देरी करने की स्थिति में नहीं है। उन्होंने देश की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज से आह्वान किया कि वे तकनीकी बदलावों का केवल अनुसरण करने के बजाय उनकी भावी दिशा निर्धारित करने में अग्रणी भूमिका निभाएं। मुख्य न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि प्रौद्योगिकी चाहे कितनी भी अत्याधुनिक और तेज क्यों न हो जाए, कानून की आधारशिला में निहित न्याय, निष्पक्षता और मानवीय विवेक के सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया जा सकता।

एआई पर प्रतिबंध नहीं, जिम्मेदार और पारदर्शी इस्तेमाल की जरूरत

अपने संबोधन में सीजेआई सूर्यकांत ने जनरेटिव एआई तकनीक को कानून की पढ़ाई से पूरी तरह बाहर रखने या उस पर कड़े प्रतिबंध लगाने की विचारधारा को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक को रोकने के बजाय छात्रों को इसकी अपार क्षमताओं के साथ-साथ इसकी सीमाओं से भी भली-भांति अवगत कराया जाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के क्लासरूम में एआई के उपयोग को पूरी पारदर्शिता और निगरानी के साथ बढ़ावा दिया जाए। मुख्य न्यायाधीश ने स्वीकार किया कि एआई टूल्स पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहने से छात्रों की मौलिक तर्क शक्ति और विश्लेषणात्मक क्षमता कमजोर हो सकती है। इसके अतिरिक्त, एआई द्वारा अत्यंत आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किए गए गलत या भ्रामक निष्कर्षों को बिना जांचे सही स्वीकार कर लेने का जोखिम भी बना रहता है। हालांकि, इन समस्याओं का समाधान तकनीक पर पाबंदी लगाना नहीं है, बल्कि छात्रों को ऐसा व्यावहारिक प्रशिक्षण देना है जिससे वे एआई के आउटपुट पर आंख बंदकर विश्वास करने के स्थान पर उसके निष्कर्षों पर सवाल उठा सकें और स्वतंत्र निर्णय ले सकें।

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अदालती कामकाज का बदलता स्वरूप और आधुनिक तकनीकी टूल्स

भविष्य की कानूनी व्यवस्था का खाका पेश करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि आने वाले समय में वकील और कानून के छात्र ऐसे उन्नत डिजिटल साधनों का उपयोग करेंगे जो मात्र कुछ सेकंड में हजारों पुराने न्यायिक फैसलों का गहन विश्लेषण करने में सक्षम होंगे। वर्तमान में एआई तकनीक लीगल रिसर्च, कॉन्ट्रैक्ट्स तैयार करने, कानूनी जांच-पड़ताल, साक्ष्यों के डिजिटल प्रबंधन तथा विभिन्न विवादों के त्वरित समाधान जैसे जटिल कार्यों को तेजी से नया रूप दे रही है। इन क्रांतिकारी परिवर्तनों को देखते हुए कानून शिक्षण संस्थानों को इस बदलाव का मुख्य केंद्र बनना होगा। सीजेआई ने इस बात पर विशेष बल दिया कि केवल किसी एआई टूल को चलाना सीख लेना ही पर्याप्त नहीं है। जो छात्र बिना सोचे-समझे एआई के नतीजों को स्वीकार कर लेता है, वह समय के साथ पूरी तरह उस पर निर्भर हो जाता है। इसके विपरीत, जो छात्र एआई की धारणाओं की पड़ताल करना, उसके तथ्यों को सत्यापित करना और अपनी स्वतंत्र सोच से निष्कर्ष निकालना सीखता है, वही वास्तव में इस तकनीक का सही और प्रभावी उपयोग कर पाएगा।

लॉ यूनिवर्सिटीज को आगे बढ़कर तय करनी होगी बदलाव की दिशा

सीजेआई सूर्यकांत ने चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि जो शिक्षण संस्थान तकनीकी बदलावों को अपनाने से हिचकिचाएंगे या उनसे दूर भागेंगे, वे आने वाले समय में अपनी प्रासंगिकता और मुख्य भूमिका खो सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानूनी शिक्षा का उद्देश्य केवल इतना नहीं होना चाहिए कि वह तकनीक में आ रहे बदलावों के बाद स्वयं को उनके अनुसार ढाले, बल्कि लॉ यूनिवर्सिटीज को यह तय करने में नेतृत्व करना चाहिए कि तकनीक न्याय व्यवस्था को किस दिशा में मोड़ेगी। तकनीकी विकास को हमेशा कानून और उसके नैतिक मूल्यों की सेवा में काम करना चाहिए। इसका मुख्य उद्देश्य अदालती प्रक्रियाओं और न्याय वितरण को अधिक सक्षम, सुलभ और तेज बनाना होना चाहिए, लेकिन इस प्रक्रिया में निष्पक्षता और मानवीय सूझबूझ को कभी भी दांव पर नहीं लगाया जा सकता।

डिजिटल न्याय, डेटा सुरक्षा और अंतर-विश्वविद्यालयी सहयोग पर बल

कानूनी शोध के दायरे को विस्तृत करने का आह्वान करते हुए सीजेआई ने देश की विभिन्न नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि कानून और तकनीक के इस विकसित होते संबंधों पर गंभीर और व्यापक शोध कार्य किए जाने चाहिए। इसके अंतर्गत एल्गोरिदम की जवाबदेही तय करने, डेटा सुरक्षा और गोपनीयता को मजबूत करने, डिजिटल माध्यमों से समाज के हर वर्ग तक न्याय की पहुंच आसान बनाने तथा विवाद निपटारे में तकनीक की भूमिका जैसे अहम विषयों पर काम किया जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश का अंतिम और स्पष्ट संदेश यही था कि एआई कभी भी अदालतों, जजों और वकीलों का विकल्प नहीं बन सकता, बल्कि इसका प्रयोग केवल न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए होना चाहिए। तकनीक न्याय प्रदान करने की गति को भले बढ़ा दे, परंतु उसे कभी भी न्याय की निष्पक्षता को कम नहीं करने देना चाहिए।

सवाल-जवाब

जोधपुर में सीजेआई सूर्यकांत ने किस कार्यक्रम को संबोधित किया?
उन्होंने जोधपुर स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में आयोजित कुलपति सम्मेलन- 2.0 को संबोधित किया।
एआई के इस्तेमाल को लेकर सीजेआई सूर्यकांत का क्या नजरिया है?
उन्होंने जनरेटिव एआई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के विचार को खारिज करते हुए कक्षाओं में इसके पारदर्शी और निगरानी वाले इस्तेमाल पर जोर दिया।
लॉ छात्रों के लिए एआई के इस्तेमाल में क्या जोखिम हैं?
एआई पर अत्यधिक निर्भरता से छात्रों की अपनी तर्क क्षमता कमजोर हो सकती है और वे एआई के गलत उत्तरों को भी सच मान सकते हैं।
भविष्य की कानूनी व्यवस्था में एआई कौन-कौन से काम तेजी से करेगा?
एआई पुराने फैसलों के विश्लेषण, कॉन्ट्रैक्ट ड्राफ्टिंग, लीगल रिसर्च, सबूतों के प्रबंधन और विवाद समाधान में तेजी लाएगा।
सीजेआई ने नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज से क्या भूमिका निभाने की अपील की?
उन्होंने अपील की कि लॉ यूनिवर्सिटीज केवल तकनीकी बदलावों के पीछे न चलें, बल्कि यह तय करने में नेतृत्व करें कि तकनीक कानूनी व्यवस्था को किस दिशा में ले जाएगी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Ravikash Gupta@ravikash·39 दिन पहले

सीजेआई सूर्यकांत का यह दृष्टिकोण कि एआई पर पाबंदी के बजाय पारदर्शी और जिम्मेदार इस्तेमाल होना चाहिए, कानूनी क्षेत्र में तकनीकी एकीकरण की दिशा तय करता है। जिस तरह वित्तीय बाज़ारों और डिजिटल एसेट्स में एल्गोरिदम और एआई का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है और नए विनियामक ढांचे की मांग कर रहा है, वैसा ही बदलाव अब न्यायपालिका और कॉर्पोरेट लीगल फ्रेमवर्क में भी देखने को मिलेगा। भविष्य में लीगल टेक और एआई ऑडिटिंग इंडस्ट्री में भारी निवेश और स्टार्टअप्स के लिए बड़े अवसर पैदा होंगे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·39 दिन पहले

रविकेश जी के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, मुख्य न्यायाधीश का यह संदेश भारतीय न्यायपालिका के उस दीर्घकालिक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है जहाँ तकनीक केवल गति बढ़ाती है, निष्पक्षता का विकल्प नहीं बनती। शैक्षणिक संस्थानों को इस दिशा में कैरिकुलम रिफॉर्म की तत्काल आवश्यकता है, जिससे तकनीकी दक्षता और मानवीय विवेक का संतुलन बना रहे।

Rohan Verma@rohan-verma·39 दिन पहले

प्रधान न्यायाधीश का यह दृष्टिकोण केवल अकादमिक चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जिला अदालतों से लेकर उच्च न्यायपालिका तक डिजिटल बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण की अनिवार्य आवश्यकता को रेखांकित करता है। भविष्य में वकीलों और न्यायाधीशों के लिए एआई आधारित साक्ष्य प्रबंधन और त्वरित अनुसंधान का उपयोग न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और गति दोनों लाएगा, बशर्ते विधिक शिक्षण संस्थान इसके लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करें।

Karan Malhotra@karan-malhotra·39 दिन पहले

अपराधी अब अत्याधुनिक डिजिटल और साइबर माध्यमों से अपराध को अंजाम दे रहे हैं, ऐसे में अभियोजन पक्ष और जांच एजेंसियों के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित टूल्स का उपयोग वक्त की मांग बन चुका है। कानूनी शिक्षा में इसके जिम्मेदार समावेश से अदालतों में लंबित मामलों के त्वरित निस्तारण के साथ-साथ डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण में भी अभूतपूर्व पारदर्शिता आएगी, जो अंततः आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक मजबूत बनाएगी।

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