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कोटा में खाद संकट पर फूटा किसानों का गुस्सा, सरकार और प्रशासन को दी कड़ी चेतावनीराजस्थान
4 सित॰ 2026, 8:55 am (21 दिन पहले)· 2

कोटा में खाद संकट पर फूटा किसानों का गुस्सा, सरकार और प्रशासन को दी कड़ी चेतावनी

राजस्थान के कोटा में खाद वितरण की जटिल व्यवस्था से परेशान किसानों ने मोर्चा खोल दिया है। दूर-दराज के केंद्र और फार्मर आईडी की अनिवार्यता से नाराज किसानों ने चेतावनी दी है कि मांगें पूरी न होने पर आगामी चुनावों में नेताओं को जूतों की माला पहनाई जाएगी।

राजस्थान के कोटा जिले में अन्नदाताओं के सामने इस समय फसलों की सिंचाई और पोषण के लिए सबसे जरूरी माने जाने वाले खाद का संकट गहराता जा रहा है। स्थानीय स्तर पर कृषि विभाग और प्रशासन द्वारा शुरू की गई खाद वितरण की नई प्रणाली किसानों के लिए राहत के बजाय एक बड़ी मुसीबत बन चुकी है। हालात यह हैं कि अपनी फसलों को बचाने के लिए खाद जुटाना किसानों के लिए किसी संघर्ष से कम नहीं रह गया है। वितरण प्रक्रिया में लाई गई जटिलताओं के कारण किसानों का गुस्सा अब सड़कों पर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है और वे लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

जटिल नियम और लंबी दूरियों से बढ़ी परेशानी

किसानों का कहना है कि प्रशासन द्वारा थोपी गई फार्मर आईडी की अनिवार्यता, ऑनलाइन टोकन सिस्टम और सेंटरों के अटैचमेंट ने खाद खरीदने की प्रक्रिया को बेहद पेचीदा और उलझा हुआ बना दिया है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि किसानों को उनके अपने गांवों के स्थानीय केंद्रों के बजाय पचास से सत्तर किलोमीटर दूर स्थित सेंटरों पर खाद आवंटित की जा रही है। इतनी दूर जाने के कारण किसानों का न सिर्फ कीमती समय बर्बाद हो रहा है, बल्कि अनावश्यक रूप से भारी किराया और शारीरिक श्रम भी खर्च हो रहा है। किसानों ने पुरजोर मांग की है कि इस पूरी प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से सरल बनाया जाए और उन्हें उनके नजदीक के क्रय-विक्रय केंद्रों पर ही आसानी से पर्याप्त खाद उपलब्ध कराई जाए।

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प्रशासन को सौंपा ज्ञापन और रखी प्रमुख मांगें

इस गंभीर समस्या से त्रस्त होकर जिले के किसानों ने एकजुट होकर मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपा है। इस ज्ञापन के जरिए किसानों ने अपनी मुख्य मांगों को स्पष्ट रूप से सामने रखा है, जिसमें फार्मर आईडी की अनिवार्यता को पूरी तरह समाप्त करना, टोकन व्यवस्था को बंद करना और दूर-दराज के सेंटरों से किए गए अटैचमेंट को तत्काल प्रभाव से रद्द करना शामिल है। किसानों का तर्क है कि जिस समय उनकी फसलों को खाद की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, उस वक्त वे खेतों में काम करने के बजाय लंबी लाइनों में खड़े होने और दूर-दराज के चक्कर काटने को मजबूर हो रहे हैं.

चुनावी बहिष्कार और कड़े विरोध की चेतावनी

प्रशासन की लचर व्यवस्था और खाद संकट से बुरी तरह भड़के किसानों का असंतोष अब अपने चरम पर पहुंच चुका है। किसानों ने कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि उनकी इन जायज मांगों पर जल्द से जल्द विचार नहीं किया गया और व्यवस्था में सुधार नहीं लाया गया, तो आने वाले चुनावों में उनके गांवों में आने वाले राजनीतिक नेताओं का कड़ा विरोध किया जाएगा। किसानों ने दो टूक शब्दों में यह भी कहा है कि वे राजनेताओं का पूरी तरह से बहिष्कार करेंगे और जरूरत पड़ने पर उन्हें जूतों की माला पहनाकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराएंगे।

सवाल-जवाब

कोटा में किसान किस बात से नाराज हैं?
किसान खाद वितरण की नई और जटिल व्यवस्था, फार्मर आईडी की अनिवार्यता तथा दूर-दराज के केंद्रों पर खाद मिलने से नाराज हैं।
किसानों को कितनी दूर खाद लेने जाना पड़ रहा है?
किसानों को उनके अपने गांवों के बजाय 50 से 70 किलोमीटर दूर स्थित केंद्रों पर खाद लेने के लिए भेजा जा रहा है।
किसानों ने प्रशासन को क्या ज्ञापन सौंपा है?
किसानों ने मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर फार्मर आईडी और टोकन सिस्टम को खत्म करने की मांग की है।
किसानों ने राजनेताओं के लिए क्या चेतावनी दी है?
किसानों ने चेतावनी दी है कि मांगें पूरी न होने पर आगामी चुनावों में गांवों में आने वाले नेताओं को जूतों की माला पहनाई जाएगी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·20 दिन पहले

कोटा में खाद वितरण प्रणाली की पेचीदगियों के कारण भड़का यह आक्रोश केवल प्रशासनिक नाकामी नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था के लिए भी एक संवेदनशील स्थिति बन गया है। जब अन्नदाताओं को अपनी फसलों को बचाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़े और वे जनप्रतिनिधियों के बहिष्कार या हिंसक विरोध की चेतावनी दें, तो पुलिस और स्थानीय प्रशासन को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। यदि इन प्रशासनिक खामियों और दूरी के संकट को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो यह असंतोष किसी बड़े सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष में बदल सकता है, जिससे क्षेत्र में सार्वजनिक शांति प्रभावित होने का पूरा खतरा है।

Rohan Verma@rohan-verma·20 दिन पहले

अन्नदाताओं का यह बढ़ता गुस्सा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि नीति निर्माताओं और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच एक बड़ी खाई बन चुकी है। जब डिजिटल सुधार और ऑनलाइन टोकन जैसी व्यवस्थाएं किसानों की सुविधा के बजाय उनके समय और संसाधनों की बर्बादी का कारण बनने लगें, तो प्रशासनिक विफलता स्वतः जगज़ाहिर हो जाती है। यदि समय रहते वितरण केंद्रों की दूरी कम नहीं की गई और किसानों की व्यावहारिक समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो यह क्षेत्रीय रोष आने वाले दिनों में राज्य के अन्य हिस्सों में भी एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है, जिससे राजनीतिक दलों के लिए चुनावी मैदान में गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

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