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त्योहारों में मिठास घोलती बिहार की पारंपरिक पिड़किया, खोया और गुड़ के देसी स्वाद के पीछे छिपी है यह कलाखानपान
20 अग॰ 2026, 3:15 pm (1 दिन पहले)· 4

त्योहारों में मिठास घोलती बिहार की पारंपरिक पिड़किया, खोया और गुड़ के देसी स्वाद के पीछे छिपी है यह कला

बिहार के ग्रामीण इलाकों में त्योहारों के अवसर पर घर पर बनने वाली पारंपरिक पिड़किया का क्रेज आज भी बरकरार है। साधारण घरेलू सामग्रियों से तैयार होने वाला यह व्यंजन अपनी खास बनावट और आत्मीय स्वाद के लिए जाना जाता है।

त्योहारों और विशेष अवसरों पर ग्रामीण रसोइयों से उठने वाली मनभावन खुशबू पूरे वातावरण को उल्लास से भर देती है। कहीं धीमी आंच पर गुड़ पिघल रहा होता है तो कहीं आटा गूंथने की तैयारी चलती है। बाजार में मिलने वाली तरह तरह की मिठाइयों के बीच घर पर तैयार होने वाले पारंपरिक पकवानों का अपना एक अलग ही महत्व रहता है। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में पिड़किया एक प्रमुख मिठास है, जो देखने में भले ही गुजिया जैसी नजर आए, लेकिन इसका देसी स्वाद और स्थानीय बनावट इसे एक खास पहचान प्रदान करती है।

साधारण सामग्रियों से रचता है बेहतरीन स्वाद

इस पारंपरिक मिठास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे तैयार करने के लिए किसी कीमती सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। घर में आसानी से उपलब्ध होने वाले साधारण सामान और महिलाओं के पाक कौशल से यह स्वादिष्ट व्यंजन तैयार होता है। ग्रामीण इलाकों में पूजा पाठ, प्रमुख पर्वों और पारिवारिक आयोजनों के समय पिड़किया बनाने की समृद्ध परंपरा रही है।

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सामग्री, भरावन और बनाने की प्रक्रिया

इस व्यंजन को बनाने की प्रक्रिया बहुत ही सरल और सहज है। सबसे पहले गेहूं के आटे या मैदे को पानी के साथ गूंथकर एक नरम लोई तैयार की जाती है। इसके बाद अंदर भरने के लिए खोया, गुड़ अथवा चीनी, कसा हुआ नारियल और सूखे मेवों का मिश्रण तैयार किया जाता है। अलग अलग क्षेत्रों और परिवारों की पसंद के अनुसार इसके भरावन की सामग्री में थोड़ा बदलाव भी देखने को मिलता है।

केवल सही सामग्री मिला देना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि आटे की छोटी पूरी बेलकर उसमें भरावन डालना और उसके किनारों को मजबूती से बंद करना एक हुनर का काम है। यदि किनारे ठीक से न बंद हों तो तलते समय भरावन बाहर निकल सकता है। सही आकार देने के पश्चात इसे देसी घी या तेल में धीमी आंच पर सुनहरा होने तक तला जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे पकाने के अन्य पारंपरिक तरीके भी अपनाए जाते हैं, जिससे हर घर की पिड़किया का स्वाद थोड़ा भिन्न और अनोखा होता है। कहीं नारियल का स्वाद ज्यादा उभरकर आता है तो कहीं गुड़ और खोये की मिठास मुख्य रहती है।

पारिवारिक यादें और सांस्कृतिक जुड़ाव

गांवों में तैयार होने वाले ऐसे व्यंजन केवल खान पान तक सीमित नहीं होते, बल्कि इनके साथ परिवार के सदस्यों का आपसी स्नेह और यादें जुड़ी होती हैं। पर्व त्योहारों के अवसर पर घर की महिलाएं एक साथ बैठकर गपशप करते हुए पिड़किया तैयार करती हैं। बच्चे पास बैठकर कभी भरावन का स्वाद चखते हैं तो कभी तैयार होती मिठाई को देखकर खुश होते हैं। आज आधुनिक दौर में पैकेटबंद मिठाइयों के अनेक विकल्प आ चुके हैं, परंतु हाथ से बनी इस मिठास का आकर्षण आज भी कम नहीं हुआ है। मशीनों और आधुनिक पैकेजिंग से इस घरेलू आत्मीयता को दोहरा पाना संभव नहीं है।

आधुनिक जीवनशैली में भी अटूट है यह पहचान

शहरों में जाकर बस चुके लोग भी विशेष मौकों पर इस पारंपरिक स्वाद को याद करते हैं। अनेक परिवार अपने घरों में इसे बनाने का प्रयास करते हैं, जबकि कई स्थानों पर स्थानीय दुकानों में भी इसकी भारी मांग बनी रहती है। यह पारंपरिक व्यंजन इस बात का प्रमाण है कि श्रेष्ठ स्वाद महंगे सामान का मोहताज नहीं होता। आटा, गुड़, खोया और नारियल जैसी साधारण चीजों को जब सही विधि और अपनेपन के साथ पकाया जाता है, तो वह एक यादगार स्वाद बन जाता है। यही कारण है कि यह देसी मिठास आज भी लोगों के दिलों और यादों में रसीली बनी हुई है।

सवाल-जवाब

पिड़किया क्या है और यह किस राज्य में मुख्य रूप से प्रसिद्ध है?
पिड़किया एक पारंपरिक देसी मिठाई है जो मुख्य रूप से बिहार के ग्रामीण और शहरी इलाकों में त्योहारों व पूजा-पाठ के अवसरों पर बनाई जाती है।
पिड़किया का भरावन तैयार करने के लिए किन सामग्रियों का उपयोग होता है?
इसके भरावन के लिए खोया, गुड़ या चीनी, कद्दूकस किया हुआ नारियल और सूखे मेवों का इस्तेमाल किया जाता है।
क्या पिड़किया और गुजिया एक ही पकवान हैं?
देखने में पिड़किया गुजिया जैसी लग सकती है, लेकिन इसके स्थानीय भरावन, बनाने की विधि और आंचलिक स्वाद के कारण इसकी अपनी अलग पहचान है।
पिड़किया को तलने के लिए किसका प्रयोग किया जाता है?
पिड़किया को सही आकार देकर किनारों से बंद करने के बाद देसी घी या तेल में मध्यम आंच पर सुनहरा होने तक तला जाता है।
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