माता-पिता के नाम दर्ज मकान पर सिर्फ रहने या निर्माण कार्य में आर्थिक मदद देने के आधार पर कोई संतान उस संपत्ति पर अपना मालिकाना हक नहीं जता सकती। दिल्ली उच्च न्यायालय ने करावल नगर के एक पारिवारिक संपत्ति विवाद में यह स्पष्ट निर्णय सुनाया है। अदालत ने उस बेटे और बहू के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जो अपनी ही मां को घर से निकालने की कोशिश में लगे थे। अदालत ने दोनों को आदेश दिया है कि वे कमरों पर लगाए गए अपने ताले तुरंत हटाएं और मकान का कब्जा बिना किसी शर्त के मां को सौंपें। इस व्यवस्था ने साफ कर दिया है कि संपत्ति का स्वतंत्र कानूनी दस्तावेज ही मालिकाना हक तय करता है, पारिवारिक रिश्ते या मौखिक दावे नहीं।
1996 में बचत से खरीदी गई थी संपत्ति
इस पूरे मामले की शुरुआत वर्ष 1996 में हुई थी, जब परिवार के मुखिया ने अपनी पत्नी के नाम पर करावल नगर में एक रिहायशी मकान खरीदा था। महिला के अनुसार, उनके पति नौकरीपेशा थे और उन्होंने अपने जीवन भर की जमा पूंजी से यह घर अपनी पत्नी के नाम रजिस्टर्ड करवाया था। अपने मालिकाना हक को सिद्ध करने के लिए महिला ने अदालत में खरीद से जुड़े पुख्ता कागजात प्रस्तुत किए। इन दस्तावेजों में 1 नवंबर 1996 की तारीख वाले पॉवर ऑफ अटॉर्नी, सेल एग्रीमेंट और विधिवत खरीद की रसीद शामिल थी। खरीदारी के दिन से ही महिला अपने परिवार के साथ उसी मकान में रह रही थी।
कालांतर में बेटे का विवाह हुआ और नई बहू भी उसी घर में आकर रहने लगी। महिला ने अपने बेटे और बहू को घर में छत केवल एक पारिवारिक रिश्ते और आपसी स्नेह के नाते दी थी। घर की व्यवस्था के तहत महिला ग्राउंड फ्लोर के एक कमरे, किचन और उससे जुड़ी एक दुकान का इस्तेमाल करती थी। दूसरी तरफ, बेटा और बहू ग्राउंड फ्लोर के दूसरे कमरे के अलावा पहली मंजिल पर स्थित एक कमरे और किचन में रह रहे थे। शुरुआत में सब कुछ शांति से चलता रहा, लेकिन धीरे-धीरे बेटे और बहू के तेवर बदलने लगे और उन्होंने पूरी संपत्ति पर अपना दबदबा बनाने की कोशिशें शुरू कर दीं।
उत्पीड़न, कमरों में ताले और फर्जीवाड़े के आरोप
महिला ने अदालत को बताया कि बेटे और बहू का बर्ताव उनके प्रति दिन-प्रतिदिन आक्रामक और अपमानजनक होता गया। वे दोनों लगातार उनके साथ झगड़ा करते थे, मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे और उन्हें उसी घर से बेदखल करने की फिराक में थे। जब विवाद असहनीय स्तर पर पहुंच गया, तो महिला ने दोनों को घर खाली करने का स्पष्ट निर्देश दिया। दोनों घर से बाहर तो चले गए, लेकिन जाते समय उन कमरों में अपने ताले जड़ गए जिनका वे इस्तेमाल कर रहे थे। इस तरह महिला को अपनी ही संपत्ति के एक बड़े हिस्से से वंचित कर दिया गया और यह घरेलू कलह सीधे तौर पर कब्जे की लड़ाई में बदल गई।
विवाद के दौरान बेटे ने संपत्ति पर कब्जा जमाने के लिए एक कथित दस्तावेज भी सामने रखा। इस कागजात के आधार पर बेटे ने दावा किया कि यह मकान 1.5 लाख रुपये के बदले उसके नाम ट्रांसफर कर दिया गया था। महिला ने इस दस्तावेज को सिरे से खारिज करते हुए इसे पूरी तरह फर्जी और मनगढ़ंत करार दिया। उन्होंने अदालत का ध्यान इस तथ्य की ओर दिलाया कि उक्त दस्तावेज पर 12 जनवरी 2003 की तारीख दर्ज थी, जो कि रविवार का दिन था। महिला ने तर्क दिया कि रविवार के दिन ऐसे आधिकारिक लेन-देन और कागजात तैयार होने का दावा ही इसकी प्रामाणिकता पर गहरा संदेह पैदा करता है।
बैंक खाते से रकम की निकासी और बिजली कनेक्शन की तकरार
विवाद केवल कमरों और रजिस्ट्री तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वित्तीय धोखाधड़ी और बुनियादी सुविधाओं तक भी फैल गया। महिला ने शिकायत की कि उनके पति के निधन के बाद 2 जुलाई 2013 को बेटे ने उनके बैंक खाते से अनधिकृत रूप से 50 हजार रुपये निकाल लिए। अपने साथ हुई इस धोखाधड़ी और आर्थिक नुकसान को लेकर महिला ने अगस्त 2013 में स्थानीय पुलिस स्टेशन में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी।
इसके कुछ ही समय बाद बिजली कनेक्शन को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया। बेटे ने मां की सहमति के बिना उसी घर के लिए अलग बिजली कनेक्शन प्राप्त करने का आवेदन दिया। जैसे ही महिला को इस कदम की भनक लगी, उन्होंने 4 अक्टूबर 2013 को बीएसईएस यमुना पॉवर को एक लिखित आपत्ति पत्र सौंपा। उन्होंने बिजली वितरण कंपनी को अवगत कराया कि संपत्ति की वैधानिक मालिक वह स्वयं हैं और उनकी लिखित अनुमति के बिना किसी अन्य व्यक्ति को परिसर में अलग कनेक्शन लेने का कोई विधिक अधिकार नहीं है।
लंबी अदालती लड़ाई और झूठे दावों की पोल
मां के कड़े रुख के बाद बेटे ने वर्ष 2013 में अदालत का दरवाजा खटखटाया और एक सिविल सूट दायर कर संपत्ति में अपने हिस्से की मांग की। हालांकि, अदालत ने उसके दावों में कोई दम न पाते हुए 18 नवंबर 2015 को उसका मुकदमा खारिज कर दिया। इसके बाद महिला ने अपनी संपत्ति का पूरा कब्जा वापस पाने के लिए 25 जनवरी 2016 को अदालत की शरण ली।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान बेटे ने खुद को संपत्ति का संयुक्त मालिक साबित करने के लिए कई तर्क दिए। उसने कहा कि उसके पिता का वेतन इतना नहीं था कि वे अकेले यह मकान खरीद पाते। उसने दावा किया कि जब जमीन खरीदी गई थी, तब वह एक इलेक्ट्रीशियन के रूप में काम कर रहा था और उसने जमीन के सौदे के लिए 1.5 लाख रुपये दिए थे। इसके अलावा उसने यह भी दावा किया कि निर्माण कार्य के दौरान उसने अपनी जेब से 60 हजार रुपये खर्च किए थे। बेटे का कहना था कि चूंकि उसने जमीन की खरीद और मकान बनाने में पैसा लगाया है, इसलिए उसे संपत्ति का सह-मालिक माना जाना चाहिए। हालांकि, जब इन भुगतानों के सबूत पेश करने की बारी आई, तो बेटा अदालत में एक भी रसीद, बैंक स्टेटमेंट या वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने में पूरी तरह नाकाम रहा।
अदालत का स्पष्ट संदेश: स्वतंत्र लीगल टाइटल ही मान्य
एक दशक तक खिंचे इस लंबे कानूनी विवाद पर 8 सितंबर 2026 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया। अदालत ने बेटे की दलीलों को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए कानून की स्थिति स्पष्ट की। अदालत ने कहा कि किसी मकान के निर्माण, मरम्मत या घरेलू खर्चों में पैसा लगाने मात्र से किसी भी व्यक्ति को उस संपत्ति में सह-मालिकाना हक प्राप्त नहीं हो जाता।
अदालत ने जोर देकर कहा कि संपत्ति में अधिकार पाने के लिए एक स्वतंत्र कानूनी टाइटल या ऐसा वैधानिक दस्तावेज होना अनिवार्य है जो मालिकाना हक को प्रमाणित करे। बेटा अपने पक्ष में ऐसा कोई भी कानूनी दस्तावेज नहीं दिखा सका, जबकि मां के पास 1 नवंबर 1996 की मूल पॉवर ऑफ अटॉर्नी, सेल एग्रीमेंट और खरीद रसीद जैसे सभी वैध प्रमाण मौजूद थे। इस आधार पर अदालत ने बेटे और बहू के दावों को खारिज करते हुए उन्हें तुरंत मकान खाली करने और ताले हटाने का सख्त आदेश दिया।























