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मेड़ता के राजा को गुरु जंभेश्वर ने दी थी लकड़ी, यूं बनी नागौर के रोटू और गुलर की पहचानराजस्थान
6 सित॰ 2026, 12:43 pm (19 दिन पहले)· 2

मेड़ता के राजा को गुरु जंभेश्वर ने दी थी लकड़ी, यूं बनी नागौर के रोटू और गुलर की पहचान

नागौर के रोटू और गुलर गांव गुरु जंभेश्वर की उस कथा से जुड़े हैं, जिसमें केर की लकड़ी चमत्कार से खांडे में बदल गई और मेड़ता के राव दूदा को खोया राज्य वापस मिला।

राजस्थान के नागौर जिले में एक ऐसी लोककथा जिंदा है, जो संत परंपरा और राजपूती इतिहास को एक साथ जोड़ती है। इस कहानी की जड़ें गुरु जंभेश्वर महाराज से जुड़ी हैं, जिनका नाम पीपासर, समराथल और मुकाम जैसे स्थानों के साथ पहले से जुड़ा हुआ है, लेकिन नागौर के रोटू और गुलर गांव भी उनकी स्मृतियों के बड़े केंद्र माने जाते हैं। यही कारण है कि श्रद्धालु इन दोनों गांवों को क्रमशः रोटू धाम और गुलर धाम कहकर पुकारते हैं।

मेड़ता के राव दूदा और बालक जंभेश्वर की भेंट

कथा के अनुसार मेड़ता के राव दूदा को किसी वजह से अपना राज्य छोड़कर देश निकाला झेलना पड़ा था। वे बीकानेर की तरफ जा रहे थे और रास्ते में पीपासर के पास रात गुजारने के लिए रुके। अगली सुबह उनकी भेंट बालक रूप में मौजूद गुरु जंभेश्वर से हुई। राव दूदा ने अपनी पीड़ा और राज्य खोने का दुख उनके सामने रख दिया। बालक जंभेश्वर ने उन्हें केर के पेड़ की एक लकड़ी थमाते हुए भरोसा दिलाया कि उनका खोया राज्य उन्हें दोबारा मिलेगा। यही मुलाकात राव दूदा की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई।

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साधारण लकड़ी कैसे बनी सप्तधातु का खांडा

राव दूदा को शुरुआत में केर की मामूली लकड़ी पर भरोसा नहीं हुआ और मन में शंका उठी। तभी गुरु जंभेश्वर ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति दिखाते हुए उसी लकड़ी को सप्तधातु से बनी तलवार यानी खांडे में बदल दिया, हालांकि उसकी मूठ लकड़ी की ही रहने दी। हाथ में खांडा आते ही राव दूदा का डर आस्था में बदल गया। गुरु ने उन्हें मूण्डवा के लाखोलाव तालाब के नजदीक डेरा डालने और वहां जमीन खोदने का निर्देश दिया। लोक मान्यता कहती है कि इसके बाद राव दूदा को उनका खोया हुआ राज्य वापस मिल गया।

तीसरी पीढ़ी में हुई चूक और खांडे का दो टुकड़ों में बंटना

कहानी में सबसे नाटकीय मोड़ राव दूदा की तीसरी पीढ़ी में राव जगन्नाथ के साथ आता है। 17वीं शताब्दी में राव जगन्नाथ गुलर गांव में एक बारात में शामिल होने पहुंचे थे। वहां किसी ने ताना कसते हुए कह दिया कि मेड़तियों की सत्ता असल में गुरु जंभेश्वर के दिए खांडे के भरोसे टिकी हुई है, उनकी अपनी ताकत से नहीं। भीड़ के उकसावे में आकर राव जगन्नाथ ने उसी खांडे से एक बकरे पर वार कर दिया। एक निर्दोष जानवर पर चलाया गया यह वार भारी पड़ा, खांडे की मूठ राव के हाथ में ही रह गई जबकि तलवार का बाकी हिस्सा उछलकर दूर आसोजा की डूंगरी नाम की पहाड़ी पर जा गिरा।

संत केसोजी गोदारा और खांडे की रोटू तक की यात्रा

लोक मान्यता के मुताबिक खांडा डेगाना के पास स्थित आसोजा की डूंगरी तक जा पहुंचा, जबकि उसकी मूठ गुलर में ही छूट गई। बिश्नोई समाज में संत और साहित्यकार के रूप में पहचाने जाने वाले संत केसोजी गोदारा को कहा जाता है कि सपने में खुद गुरु जंभेश्वर का आदेश मिला कि आसोजा की डूंगरी पड़ी उस खांडे को उठाकर रोटू में सुरक्षित रख दिया जाए। इसी आदेश का पालन करते हुए संत केसोजी खांडे को रोटू ले आए। तभी से आज तक रोटू में श्रद्धालुओं को यह खांडा दर्शन के लिए दिखाया जाता है।

अक्षय तृतीया की एक और कथा, पत्थर पर उभरे चरण चिह्न

रोटू की पहचान सिर्फ खांडे की कहानी तक सीमित नहीं है। मान्यता है कि विक्रम संवत 1572 में बैशाख सुदी तीज यानी अक्षय तृतीया के मौके पर गुरु जंभेश्वर भगवान अपनी भक्तिनी उमा बाई का मायरा भरने खुद रोटू पहुंचे थे। कहा जाता है कि उमाबाई के घर के सामने वे रथ से नीचे उतरे और जैसे ही उन्होंने एक पत्थर की शिला पर पैर रखा, वह शिला पिघल गई। इस तरह पत्थर पर भगवान के चरण चिह्न हमेशा के लिए अंकित हो गए, जो आज भी वहां बने मंदिर में श्रद्धा का सबसे बड़ा केंद्र बने हुए हैं।

आज भी कायम है रोटू और गुलर की आस्था

आज रोटू और गुलर सिर्फ नागौर जिले के दो साधारण गांव नहीं रह गए, बल्कि ये गुरु जंभेश्वर की स्मृतियों और बिश्नोई समाज की गहरी आस्था के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं। रोटू में खांडे की पूजा और दर्शन की परंपरा बिना रुके आज भी चल रही है, जबकि गुलर में खांडे की मूठ मंदिर में सुरक्षित रखी बताई जाती है। एक साधारण केर की लकड़ी से शुरू हुई यह कथा सदियों बाद भी इतिहास, लोकविश्वास और गुरु जंभेश्वर की भक्ति को एक ही धागे में पिरोए हुए है।

सवाल-जवाब

रोटू धाम और गुलर धाम किस लिए प्रसिद्ध हैं?
ये दोनों गांव गुरु जंभेश्वर से जुड़ी खांडे की कथा और उनकी भक्ति परंपरा के लिए प्रसिद्ध हैं।
राव दूदा को केर की लकड़ी क्यों दी गई थी?
देश निकाला मिलने के बाद बालक रूप में मिले गुरु जंभेश्वर ने राव दूदा को केर की लकड़ी देकर उनका राज्य वापस मिलने का भरोसा दिलाया था।
खांडा किन दो हिस्सों में बंटा और कहां-कहां है?
खांडे की मूठ गुलर में रह गई, जबकि तलवार का हिस्सा आसोजा की डूंगरी होते हुए बाद में रोटू पहुंचाया गया।
खांडा रोटू कौन लाया था?
बिश्नोई समाज के संत केसोजी गोदारा स्वप्न में मिले आदेश के बाद खांडे को आसोजा की डूंगरी से उठाकर रोटू ले आए थे।
रोटू में पत्थर पर चरण चिह्न कैसे बने?
मान्यता है कि विक्रम संवत 1572 में अक्षय तृतीया के दिन गुरु जंभेश्वर के चरण रखते ही रोटू की एक पत्थर की शिला पिघल गई थी।
रोटू और गुलर आज किसकी आस्था के केंद्र माने जाते हैं?
आज ये दोनों गांव बिश्नोई समाज और गुरु जंभेश्वर के अनुयायियों की गहरी आस्था के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·18 दिन पहले

यह खबर लोककथा और क्षेत्रीय इतिहास के उस अनूठे जुड़ाव को सामने लाती है, जो ग्रामीण पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। नागौर के इन गांवों में सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत रहना यह साबित करता है कि धार्मिक और ऐतिहासिक कथाएं किस प्रकार स्थानीय समाज की पहचान को आकार देती हैं। भविष्य में यदि इन स्थलों को राज्य के सांस्कृतिक पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए, तो इससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, बल्कि ऐतिहासिक धरोहर का दायरा भी व्यापक होगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·18 दिन पहले

यह घटना एक आपराधिक और लोक-कानूनी दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, जहाँ लोक-विश्वास और राजपूती इतिहास आपस में जुड़े हैं। हालांकि यह मुख्य रूप से सांस्कृतिक धरोहर का मामला है, लेकिन ऐसे ऐतिहासिक अवशेषों की सुरक्षा और रखरखाव एक बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी बन जाती है। जब किसी धार्मिक या ऐतिहासिक वस्तु से जुड़ी जनभावनाएं इतनी गहरी होती हैं, तो सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना जिला प्रशासन के लिए एक संवेदनशील कार्य बन जाता है। इन स्थलों पर श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ को प्रबंधित करने और प्राचीन धरोहर की चोरी या नुकसान को रोकने के लिए पुख्ता सुरक्षा उपायों और कानूनी ढांचे की आवश्यकता होती है, ताकि सांस्कृतिक संरक्षण के साथ-साथ क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनी रहे।

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