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मुर्गी पालन में मानसून की मार, इन पांच बातों का रखें खास ख्यालराजस्थान
18 सित॰ 2026, 11:44 am (7 दिन पहले)· 0

मुर्गी पालन में मानसून की मार, इन पांच बातों का रखें खास ख्याल

बारिश के मौसम में मुर्गी पालन करने वालों को मुर्गियों की सेहत और शेड की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। नमी, गीले बिछावन और फफूंद लगे चारे से मुर्गियों में बीमारियां फैल सकती हैं, इसलिए समय पर टीकाकरण और डॉक्टर की सलाह लेना बेहद जरूरी है।

बारिश के दिनों में मुर्गी पालकों की मुश्किलें काफी बढ़ जाती हैं। इस मौसम में वातावरण में नमी का स्तर बढ़ने से मुर्गियों के शेड के अंदर सीलन की समस्या पैदा हो जाती है। यह बहुत जरूरी है कि शेड के अंदर किसी भी तरह से बारिश का पानी न पहुंचे और छत या दीवारों में अगर कोई लीकेज है, तो उसे समय रहते ठीक करवा लिया जाए। इसके अलावा, शेड के भीतर ताजी हवा का सही आवागमन होना भी उतना ही आवश्यक है। शेड को चारों तरफ से पूरी तरह बंद रखने की भूल न करें, बल्कि उसमें पर्याप्त मात्रा में हवा के आने और जाने की उचित व्यवस्था बनाकर रखें ताकि उमस से बचा जा सके।

बिछावन और लीकेज की रोजाना निगरानी

वर्षा ऋतु के दौरान मुर्गियों के नीचे बिछाए जाने वाले लिटर यानी बिछावन पर खास ध्यान देना बहुत जरूरी होता है। यदि भूसा, लकड़ी का बुरादा या फिर धान की भूसी किसी भी तरह से गीली हो जाती है, तो उसे तुरंत बाहर निकाल देना चाहिए और उसकी जगह पर सूखी सामग्री डालनी चाहिए। इसके साथ ही, लिटर को समय-समय पर उलटते-पलटते रहना चाहिए ताकि वह अंदर से सूखे। अगर लिटर गीला रह जाता है, तो उससे न केवल तेज बदबू और अमोनिया गैस बढ़ती है, बल्कि खतरनाक बीमारियां फैलने का खतरा भी कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा, फार्म के अंदर पानी की टंकी, पानी के पाइप और ड्रिंकर में किसी प्रकार की लीकेज तो नहीं है, इसकी रोज नियमित रूप से जांच करते रहना चाहिए।

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बीमारियों के लक्षण और बचाव के उपाय

इस बरसात के सीजन में मुर्गियों के भीतर दस्त लगना, सांस लेने में तकलीफ होना, आंख और नाक से पानी बहना, कमजोरी आना और कोक्सीडियोसिस जैसी गंभीर बीमारियों के चपेट में आने का खतरा काफी ज्यादा रहता है। यदि आपके फार्म में कोई भी मुर्गी सुस्त दिखाई दे, वह अन्य मुर्गियों से अलग कोने में बैठी रहे या फिर उसका मल सामान्य स्थिति में न हो, तो उसे तुरंत बाकी स्वस्थ मुर्गियों से अलग कर देना चाहिए। यदि बीमारी के शुरुआती लक्षण नजर आएं, तो अपने मन से किसी भी तरह की दवा देने के बजाय किसी योग्य पशु चिकित्सक की सलाह लेना सबसे समझदारी का कदम होता है।

चारा और पानी की शुद्धता का रखें ध्यान

मुर्गियों को हमेशा पूरी तरह से साफ और ताजा पानी पीने के लिए देना चाहिए और उनके दाने यानी चारे को हमेशा किसी सूखी और सुरक्षित जगह पर ही रखना चाहिए। बारिश के इन दिनों में मुर्गियों को कभी भी गीला या फिर जिस पर फफूंद लग चुकी हो ऐसा चारा बिल्कुल नहीं खिलाना चाहिए। फीडर और ड्रिंकर की नियमित रूप से सफाई करना बहुत आवश्यक है। इसके अलावा, मक्खियों, मच्छरों और चूहों को शेड से दूर रखने के पुख्ता इंतजाम करें। नीम की पत्तियों के इस्तेमाल जैसे घरेलू नुस्खे आजमाए जा सकते हैं, लेकिन इन्हें किसी भी बीमारी का पक्का इलाज नहीं माना जाना चाहिए। शेड को सूखा रखना और साफ-सफाई बनाए रखना ही सबसे बड़ा और जरूरी बचाव है।

टीकाकरण और जैव-सुरक्षा के नियम

मुर्गियों को सभी आवश्यक टीके समय पर जरूर लगवाएं और फार्म के भीतर साफ-सफाई के साथ-साथ जैव-सुरक्षा के नियमों का भी पूरी सख्ती से पालन करें। फार्म के अंदर बाहर से आने वाले अनजान लोगों और दूसरे पक्षियों के अनावश्यक प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगाई जानी चाहिए। यदि किसी बीमारी का प्रकोप फैल जाए, तो बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से एंटीबायोटिक या अन्य दवाएं देने की गलती से बचना चाहिए। रोज सुबह और शाम के वक्त शेड का अच्छी तरह निरीक्षण करने से किसी भी बीमारी को उसके शुरुआती चरण में ही आसानी से पहचाना जा सकता है। अगर अचानक ज्यादा संख्या में मौतें होने लगें, गंभीर सांस की परेशानी दिखे या बीमारी बहुत तेजी से फैले, तो बिना देर किए अपने नजदीकी पशु चिकित्सक से तुरंत संपर्क करना चाहिए।

सवाल-जवाब

बारिश में मुर्गियों के शेड में सीलन क्यों बढ़ जाती है?
वातावरण में नमी बढ़ने और छत या दीवारों से पानी के रिसाव के कारण शेड में सीलन की समस्या पैदा होती है।
गीले लिटर या बिछावन से क्या नुकसान होता है?
गीले बिछावन से तेज बदबू, अमोनिया गैस में बढ़ोतरी और खतरनाक बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
मुर्गियों में मानसून के दौरान कौन सी बीमारियां आम हैं?
इस मौसम में दस्त, सांस लेने में परेशानी, आंख-नाक से पानी आना और कोक्सीडियोसिस जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
मुर्गियों को कैसा चारा नहीं खिलाना चाहिए?
बारिश के दिनों में मुर्गियों को गीला या फफूंद लगा हुआ चारा बिल्कुल नहीं खिलाना चाहिए।
बीमारी के लक्षण दिखने पर क्या करना चाहिए?
सुस्त या बीमार मुर्गी को तुरंत अलग कर देना चाहिए और खुद दवा देने के बजाय पशु चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ravikash Gupta@ravikash·6 दिन पहले

मानसून के दौरान मुर्गी पालन फार्मों में जैविक सुरक्षा और नमी प्रबंधन केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं है, बल्कि यह पोल्ट्री उद्योग की वित्तीय स्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला से भी सीधा जुड़ा है। यदि इस मौसम में बीमारियों के कारण उत्पादन प्रभावित होता है, तो इसका असर स्थानीय बाज़ारों में पोल्ट्री उत्पादों की कीमतों और छोटे किसानों की आय पर स्पष्ट रूप से दिखता है। पशुधन और पूंजीगत लागत को बचाने के लिए किसानों को समय रहते निवारक उपाय अपनाने होंगे ताकि बाजार में आपूर्ति बाधित न हो।

Aisha Khan@aisha-khan·6 दिन पहले

रविकाश की वित्तीय स्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला वाली बात से आगे बढ़कर देखें तो पोल्ट्री उत्पादन में गिरावट का सीधा असर हॉस्पिटैलिटी, इवेंट्स और लाइफस्टाइल सेक्टर पर भी पड़ता है। फिल्म शूटिंग कैटरिंग, बड़े-बड़े एंटरटेनमेंट आयोजनों और अर्बन डाइनिंग कल्चर में पोल्ट्री उत्पादों की निरंतर मांग रहती है। मानसून में आपूर्ति बाधित होने या कीमतें बढ़ने से इन आयोजनों और रेस्टोरेंट व्यवसाय के बजट पर दबाव बनता है, जो अंततः आम लोगों के लेज़र और एंटरटेनमेंट खर्चों को प्रभावित करता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·6 दिन पहले

लोक नीति और शासन के दृष्टिकोण से देखें तो मानसून के दौरान मुर्गी पालन क्षेत्र में पैदा होने वाली ये चुनौतियाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला से सीधे जुड़ी हैं। छोटे और मध्यम पशुपालकों को मौसमी बीमारियों और वित्तीय नुकसान से बचाने के लिए केवल व्यक्तिगत सावधानी काफी नहीं है, बल्कि नीतिगत स्तर पर ज़मीनी पशु चिकित्सा बुनियादी ढांचे और विस्तार सेवाओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। सरकारी योजनाओं के तहत पोल्ट्री क्षेत्र के लिए जैव-सुरक्षा जागरूकता और मौसमी राहत तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि ग्रामीण आजीविका और बाजार आपूर्ति दोनों सुरक्षित रहें।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 दिन पहले

सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक नियमों के नजरिए से देखें तो मानसून में पोल्ट्री फार्मों में फैलने वाली बीमारियां केवल किसानों का नुकसान नहीं हैं, बल्कि यह जनस्वास्थ्य से जुड़ा एक गंभीर विषय है। बीमार मुर्गियों को अवैध रूप से बाजार में बेचने या जैव-सुरक्षा (बायो-सिक्योरिटी) के कानूनी मानकों का उल्लंघन करने से संक्रमण फैलने का खतरा रहता है। स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों को फार्मों की सख्त निगरानी करनी चाहिए ताकि नियमों का उल्लंघन करने वालों और संक्रमित पक्षियों के अवैध व्यापार पर रोक लग सके।

Rohan Verma@rohan-verma·6 दिन पहले

करण की बात से आगे बढ़ते हुए, जमीनी रिपोर्टिंग के अनुभव से यह साफ है कि मानसून में बीमारी फैलने पर छोटे पोल्ट्री किसान भारी वित्तीय नुकसान के डर से बीमार मुर्गियों को बेचने पर मजबूर हो जाते हैं। सिर्फ कानूनी सख्ती ही काफी नहीं होगी; पशुपालन विभाग को जिला स्तर पर मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयां सक्रिय करनी होंगी और किसानों के लिए आपातकालीन हेल्पलाइन व मुआवजा नीति तय करनी होगी। पारदर्शी प्रशासनिक मदद से ही गैर-कानूनी व्यापार और जनस्वास्थ्य के जोखिम पर प्रभावी रोक लग सकती है।

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