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मुथंगा आदिवासी आंदोलन हिंसा पर 23 साल बाद आया अदालत का फैसला, 4 दोषियों को 5 साल की जेल और 56 आरोपी हुए बरीकेरल
31 जुल॰ 2026, 10:05 pm (16 दिन पहले)· 0

मुथंगा आदिवासी आंदोलन हिंसा पर 23 साल बाद आया अदालत का फैसला, 4 दोषियों को 5 साल की जेल और 56 आरोपी हुए बरी

केरल के वायनाड स्थित मुथंगा में 2003 के आदिवासी जमीन अधिकार आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा मामले में कोर्ट ने फैसला सुना दिया है। अदालत ने 56 आरोपियों को बरी करते हुए 4 प्रमुख लोगों को 5 साल जेल की सजा सुनाई है।

केरल के वायनाड जिले में स्थित मुथंगा के जंगलों में दो दशक से भी अधिक समय पहले हुए ऐतिहासिक आदिवासी जमीन अधिकार आंदोलन और उसके बाद भड़की हिंसा के मामले में अदालत ने अपना अंतिम फैसला सुना दिया है। 23 वर्षों के लंबे कानूनी इंतजार के बाद वायनाड की प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड स्पेशल कोर्ट द्वारा आए इस निर्णय ने जहां दर्जनों लोगों को गंभीर आरोपों से राहत दी है, वहीं दूसरी तरफ पुलिस अधिकारियों पर हमले और अपहरण के दोषियों को कारावास की सजा भी मुकर्रर की है। वर्ष 2003 की यह दुखद घटना न केवल दो जिंदगियों के नुकसान का कारण बनी थी, बल्कि इसने राज्य के प्रशासनिक रुख और आदिवासी अधिकारों पर लंबे समय तक चलने वाले सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को जन्म दिया था।

मुथंगा जमीन अधिकार आंदोलन की शुरुआत और पृष्ठभूमि

इस पूरे मामले की शुरुआत 5 जनवरी 2003 को हुई थी, जब आदिवासी गोत्र महासभा के झंडे तले सैकड़ों आदिवासी परिवारों ने अपने बुनियादी जमीन अधिकारों की मांग को लेकर एक बड़ा प्रदर्शन शुरू किया। अपनी मांगों को रेखांकित करने के लिए इन परिवारों ने मुथंगा वन क्षेत्र की संरक्षित भूमि पर अस्थायी झोपड़ियां बनाकर डेरा डाल दिया था। आंदोलनकारियों का मुख्य उद्देश्य सरकार से अपने जीवनयापन के लिए भूमि आवंटन का कानूनी अधिकार प्राप्त करना था। कई हफ्तों तक चले इस शांत गतिरोध ने राज्य सरकार और वन विभाग के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी, क्योंकि प्रदर्शनकारी बिना जमीन का अधिकार मिले वहां से हटने को तैयार नहीं थे।

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19 फरवरी 2003 की भीषण हिंसा और दो जानें जाना

आंदोलन को खत्म कराने और वन भूमि को खाली कराने के मकसद से 19 फरवरी 2003 को राज्य प्रशासन की ओर से एक बड़ा पुलिस अभियान चलाया गया। इसी पुलिस कार्रवाई के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच तीखी झड़पें शुरू हो गईं, जो देखते ही देखते हिंसक संघर्ष में बदल गईं। पुलिस द्वारा प्रस्तुत विवरण के अनुसार, उग्र हुए प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाकर्मियों पर धावा बोल दिया और कई जवानों को अपने कब्जे में ले लिया। इस झड़प में केरल आर्म्ड पुलिस के जवान केवी विनोद गंभीर रूप से घायल हो गए और अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। दूसरी ओर, भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में जोगी नाम के एक आदिवासी युवक की भी जान चली गई। इन दो मौतों ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया था।

स्थानीय पुलिस से लेकर सीबीआई तक जांच का हस्तांतरण

घटना की संवेदनशीलता को देखते हुए इसकी शुरुआती जांच स्थानीय पुलिस द्वारा शुरू की गई थी, लेकिन मामले की गंभीरता और उठते सवालों के बीच जांच को जल्द ही क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया। बाद में व्यापक और निष्पक्ष जांच की मांग उठने पर पूरे मामले की जिम्मेदारी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो अर्थात सीबीआई को दी गई। सीबीआई ने अपनी जांच पूरी कर विशेष अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। कानूनी प्रक्रिया के दौरान केरल हाईकोर्ट के एक आदेश के तहत इस केस की सुनवाई को एर्नाकुलम स्थित सीबीआई स्पेशल कोर्ट से स्थानांतरित करके वायनाड की प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड स्पेशल कोर्ट में भेजा गया, जहां 23 सालों तक साक्ष्यों और गवाहों की जांच के बाद आखिरकार फैसला आया।

अदालत का फैसला: 56 आरोपी बरी और 4 को कारावास

वायनाड की विशेष अदालत ने मामले का निपटारा करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष अधिकांश आरोपियों के खिलाफ हत्या और आपराधिक साजिश जैसे अति गंभीर आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश करने में विफल रहा। सबूतों के अभाव के कारण अदालत ने कुल 57 आरोपियों में से 56 को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने आदिवासी गोत्र महासभा के प्रमुख नेता एम. गीथानंदन, बीनू, रमेशन कोय्यलिपुरा और अनिल कुमार को दोषी करार दिया। इन चारों पर पुलिसकर्मियों के अपहरण, हत्या के प्रयास और आपराधिक साजिश रचने के आरोप सिद्ध हुए। अदालत ने इन्हें 16 अलग-अलग धाराओं के तहत कुल 19 साल और 7 महीने की सजा सुनाई, लेकिन सभी सजाएं एक साथ चलने के कारण दोषियों को प्रभावी रूप से लगभग 5 साल जेल में बिताने होंगे। इसके साथ ही अदालत ने इन पर जुर्माना भी लगाया है।

मुख्य आरोपी की मृत्यु और पीड़ितों के लिए मुआवजे का निर्देश

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी नंबर 2 अशोकन ही वह व्यक्ति था जिसने पुलिस कांस्टेबल केवी विनोद पर वह अंतिम और जानलेवा वार किया था जिससे उनकी मृत्यु हुई। हालांकि, मुकदमे की लंबी सुनवाई के दौरान ही अशोकन का निधन हो चुका था, जिस कारण उसके खिलाफ कोई विधिक सजा घोषित नहीं की जा सकी। इसके अतिरिक्त, अदालत ने मानवीय आधार पर पीड़ित परिवारों की आर्थिक सहायता के लिए मुआवजे की सिफारिश की है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से शहीद जवान केवी विनोद के परिजनों को 7 लाख रुपये, गंभीर रूप से घायल पुलिसकर्मी अब्दुल सलाम को 3 लाख रुपये और घायल जवान शशिधरन को 2 लाख रुपये की मुआवजा राशि प्रदान करने का निर्देश दिया गया है।

केरल की राजनीति और सामाजिक इतिहास पर गहरा असर

वर्ष 2003 में जब यह भयावह घटना घटी थी, तब राज्य में कांग्रेस नेता ए.के. एंटनी की सरकार सत्ता में थी। उस दौर में पुलिस द्वारा बल प्रयोग किए जाने और उसके बाद हुई मौतों को लेकर ए.के. एंटनी प्रशासन की चौतरफा आलोचना हुई थी। 23 साल बाद आया यह न्यायिक फैसला एक तरफ पीड़ित पुलिसकर्मियों के परिवारों को आंशिक न्याय दिलाता है और कई बेगुनाह साबित हुए लोगों को राहत देता है, लेकिन वहीं दूसरी ओर यह मामला आज भी केरल के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में आदिवासी भूमि अधिकारों और राज्य की पुलिस कार्रवाई की नीतियों पर एक संवेदनशील बहस के रूप में दर्ज है।

सवाल-जवाब

मुथंगा कांड क्या है और यह घटना कब हुई थी?
मुथंगा कांड केरल के वायनाड में 2003 में हुआ एक हिंसक संघर्ष था, जहां आदिवासी जमीन अधिकारों की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच 19 फरवरी 2003 को झड़प हुई थी।
अदालत ने मुथंगा मामले में क्या फैसला सुनाया है?
वायनाड की विशेष अदालत ने 57 में से 56 आरोपियों को हत्या के मुख्य आरोपों से बरी कर दिया है और 4 प्रमुख दोषियों को करीब 5 साल जेल की सजा सुनाई है।
मुथंगा हिंसा में किन लोगों की जान गई थी?
इस हिंसक घटना में केरल आर्म्ड पुलिस के जवान केवी विनोद और आदिवासी युवक जोगी की मौत हुई थी।
घटना के समय केरल के मुख्यमंत्री कौन थे?
वर्ष 2003 में मुथंगा घटना के समय केरल में कांग्रेस नेता ए.के. एंटनी की सरकार थी।
अदालत ने पीड़ितों के लिए कितने मुआवजे की सिफारिश की है?
कोर्ट ने मृतक पुलिसकर्मी केवी विनोद के परिवार को 7 लाख रुपये, घायल अब्दुल सलाम को 3 लाख रुपये और घायल शशिधरन को 2 लाख रुपये देने की सिफारिश की है।
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