पश्चिम बंगाल की सियासत में नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव को लेकर एक अप्रत्याशित मोड़ सामने आया है। इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस के आंतरिक संकट और अपने उम्मीदवार के हटने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विपक्षी कांग्रेस के प्रत्याशी मिलन प्रधान की दावेदारी का खुला समर्थन कर दिया है। राजनीतिक जानकारों की नजर में यह फैसला केवल एक सीट पर भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रोकने की कवायद भर नहीं है, बल्कि अपनी कमजोर पड़ती संगठनात्मक स्थिति के बीच विपक्ष की गोलबंदी को नया आकार देने का दांव भी है।
मैदान से उम्मीदवार का हटना और बदला चुनावी गणित
नंदीग्राम उपचुनाव के लिए मतदान छह अक्टूबर को तय किया गया है। शुरुआत में ममता बनर्जी के धड़े ने संचिता प्रधान डे को अपना उम्मीदवार बनाकर चुनावी समर में उतारा था। हालांकि, कोलकाता में मुख्यमंत्री शुवेंदु अधिकारी के साथ हुई एक बैठक के तुरंत बाद संचिता प्रधान डे ने अचानक अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। अपने ही प्रत्याशी के पीछे हट जाने के कारण बनर्जी के धड़े के सामने चुनावी अखाड़े में शून्य पैदा हो गया, जिसके बाद उन्होंने अलग से दूसरा प्रत्याशी उतारने के बजाय कांग्रेस प्रत्याशी की पीठ थपथपाने का रास्ता चुना।
ममता ने कांग्रेस को बताया स्वाभाविक सहयोगी
इस अप्रत्याशित कदम का ऐलान अठारह सितंबर को करते हुए ममता बनर्जी ने कांग्रेस को एक स्वाभाविक और अहम सहयोगी के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने अपने इस निर्णय को देश के बड़े हितों और विपक्षी 'इंडिया' मोर्चे को ताकत देने वाला बताया। उनका तर्क था कि बंगाल की धरती से यह एकजुटता पूरे देश के विपक्षी खेमे के लिए एक स्पष्ट संदेश साबित होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लंबे समय बाद राज्य के भीतर भाजपा के खिलाफ बनाई जा रही रणनीति में कांग्रेस को इतने केंद्रीय स्थान पर रखकर बनर्जी ने एक बड़ा राजनीतिक बदलाव दिखाया है।
घोषणा के तुरंत बाद कांग्रेस प्रत्याशी की गिरफ्तारी
इस पूरे चुनावी घटनाक्रम में उस वक्त नया तनाव जुड़ गया जब ममता बनर्जी के समर्थन के तुरंत बाद कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। यह गिरफ्तारी वर्ष 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़े एक पुराने आपराधिक मामले के सिलसिले में की गई, जिसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया। कांग्रेस नेतृत्व ने इस पुलिसिया कार्रवाई का कड़ा विरोध किया है। पार्टी नेता राहुल गांधी ने इस गिरफ्तारी को राजनीतिक दुर्भावना करार देते हुए संकल्प जताया कि उनकी पार्टी लड़ेगी और जीतेगी।
गठबंधन और कड़वाहट का पुराना इतिहास
दोनों दलों का सियासी सफर दशकों से आपसी टकराव और मजबूरी के गठबंधनों का मिला-जुला इतिहास रहा है। नब्बे के दशक के अंतिम वर्षों में ममता बनर्जी ने वाम मोर्चे के खिलाफ कांग्रेस के रुख को नरम मानते हुए अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। इसके बावजूद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग होने पर दोनों दलों ने 2001 का विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ा और फिर 2009 के आम चुनाव में भी साझा मंच बनाया। वर्ष 2011 में इस साझेदारी ने राज्य से वाम दलों के चौतीस साल पुराने शासन को उखाड़ फेंका था। हालांकि, सत्ता में आने के बाद मंत्रालयों, नीतियों और सीट बंटवारे पर पैदा हुए तनाव के कारण यह गठबंधन बिखर गया था।
अधीर रंजन चौधरी का तंज और प्रदेश कांग्रेस का रुख
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने ममता बनर्जी की इस नई राजनीतिक दरियादिली पर गंभीर संदेह जताया है। चौधरी ने कहा कि वह कांग्रेस को “गिरे हुए पत्ते की तरह कमजोर न समझें, बल्कि उसे बरगद की तरह मजबूत मानकर उसका साथ दें।” उन्होंने समर्थन के समय पर उंगली उठाते हुए कहा कि तृणमूल के गुटीय विवाद के बाद चुनाव आयोग से आवंटित फुटबॉल खिलाड़ी चुनाव चिह्न तो उनके पास है, मगर मैदान में उतारने के लिए कोई खिलाड़ी नहीं बचा। दूसरी तरफ, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने अधिक व्यावहारिक रुख अपनाते हुए कहा कि पार्टी राज्य की सभी धर्मनिरपेक्ष और भाजपा विरोधी शक्तियों की तरफ से मिलने वाले समर्थन का स्वागत करती है, जिससे भविष्य में विपक्ष की एकता के नए द्वार खुल सकते हैं।


















