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नई दिल्ली में जुटे दुनिया भर के दिग्गज, आखिर क्यों ब्रिक्स बैठक में शामिल नहीं हुए ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा?दुनिया
13 सित॰ 2026, 3:20 pm (47 दिन पहले)· 0

नई दिल्ली में जुटे दुनिया भर के दिग्गज, आखिर क्यों ब्रिक्स बैठक में शामिल नहीं हुए ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा?

नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में रूस के पुतिन और चीन के शी जिनपिंग सहित कई बड़े नेता शामिल हुए, लेकिन ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा चुनाव प्रचार और सख्त कानूनी नियमों के कारण इस बैठक से दूर रहे।

भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मंच पर दुनिया भर के शीर्ष राजनयिक और राष्ट्राध्यक्ष एकत्रित हुए। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के शीर्ष नेता व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन सहित कई महत्वपूर्ण वैश्विक हस्तियों की मौजूदगी ने इस सम्मेलन को खासा महत्वपूर्ण बना दिया। हालांकि, वैश्विक कूटनीति के इस विशाल आयोजन में एक प्रमुख संस्थापक देश के राष्ट्रप्रमुख की अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी रही। ब्रिक्स समूह की नींव रखने वाले शुरुआती नेताओं में गिने जाने वाले ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा इस सम्मेलन में व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हुए। भारत यात्रा के बजाय उन्होंने अपने देश के विदेश मंत्री माउरो विएरा को ब्राजील का प्रतिनिधित्व करने के लिए नई दिल्ली भेजा। इस बड़े घटनाक्रम के बाद हर तरफ यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी क्या वजह रही जिसके कारण लूला ने नई दिल्ली आने के बजाय स्वदेश में रहने का विकल्प चुना।

संस्थापक सदस्य की गैरमौजूदगी और ऐतिहासिक संदर्भ

लूला दा सिल्वा की इस सम्मेलन से दूरी इसलिए भी अधिक ध्यान खींचती है क्योंकि वे ब्रिक्स समूह के सबसे पुराने और शुरुआती निर्माताओं में से एक हैं। साल 2009 में जब रूस के येकातेरिनबर्ग शहर में पहली ब्रिक बैठक आयोजित की गई थी, तब लूला उस ऐतिहासिक मंच का हिस्सा थे। उस समय उनके साथ भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति दिमित्रि मेदवेदेव और चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति हू जिंताओ मौजूद थे। उस शुरुआती दौर में इस समूह में केवल चार देश ही शामिल थे। समय के साथ इस संगठन का स्वरूप और दायरा काफी व्यापक हो चुका है। वर्तमान में दक्षिण अफ्रीका के अलावा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, मिस्र और इथियोपिया जैसे प्रमुख राष्ट्र भी ब्रिक्स परिवार के पूर्ण सदस्य बन चुके हैं। ऐसे विस्तारित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली हो चुके मंच से इसके एक संस्थापक देश के राष्ट्रपति का दूर रहना स्वाभाविक रूप से वैश्विक मीडिया और कूटनीतिक विशेषज्ञों के लिए उत्सुकता का कारण बना है। लेकिन इस दूरी के पीछे कोई रणनीतिक मतभेद नहीं, बल्कि ब्राजील का अंदरूनी राजनीतिक समीकरण है।

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घरेलू चुनाव प्रचार को दी सर्वोच्च प्राथमिकता

ब्राजील में राष्ट्रपति चुनाव के प्रथम चरण की वोटिंग 4 अक्टूबर को निर्धारित की गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन ठीक उसी समय हुआ जब ब्राजील में चुनावी मुकाबला अपने बेहद नाजुक और अंतिम मोड़ पर पहुंच चुका था। लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा एक और कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति पद की रेस में दोबारा मैदान में उतरे हैं। इस चुनाव में उन्हें ब्राजील के दक्षिणपंथी सीनेटर फ्लावियो बोल्सोनारो से बेहद कड़ी चुनौती मिल रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे कड़े चुनावी मुकाबले में एक-एक दिन और एक-एक रैली बेहद निर्णायक होती है। यही वजह रही कि लूला ने सात समंदर पार अंतरराष्ट्रीय बैठक में भाग लेने की तुलना में अपने देश की जनता के बीच रहना ज्यादा जरूरी समझा। वे ब्राजील के दक्षिणी राज्यों में लगातार जनसभाएं, रैलियां और अन्य प्रचार कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं ताकि अधिक से अधिक मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद कर सकें।

कड़े चुनावी कानून और खर्च से जुड़े जटिल नियम

भारत की लंबी यात्रा न करने के पीछे सिर्फ चुनाव प्रचार की व्यस्तता ही एकमात्र कारण नहीं है, बल्कि इसके पीछे ब्राजील के सख्त चुनावी और कानूनी प्रावधान भी शामिल हैं। ब्राजील के निर्वाचन नियमों के तहत सरकारी मशीनरी, सार्वजनिक संसाधनों और सरकारी फंड के उपयोग को लेकर अत्यंत कड़े दिशानिर्देश लागू होते हैं। ये नियम विशेष रूप से तब और अधिक सख्त हो जाते हैं जब देश का वर्तमान राष्ट्रपति खुद दोबारा चुनाव लड़ रहा हो। यद्यपि राष्ट्रपति के रूप में किसी आधिकारिक विदेशी दौरे का खर्च सामान्य प्रशासनिक बजट के तहत वहन किया जा सकता है, लेकिन चुनाव के ठीक मुहाने पर की गई ऐसी यात्राओं को राजनीतिक विरोधी चुनावी लाभ से जोड़कर चुनौती दे सकते हैं। इससे यात्रा के खर्च और सरकारी साधनों के उपयोग पर कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़े होने का अंदेशा बना रहता है।

चुनावी बजट की सीमा और संभावित राजनीतिक विवाद

ब्राजील की निर्वाचन प्रणाली में राष्ट्रपति पद के सभी प्रत्याशियों के लिए प्रचार खर्च की एक पारदर्शी और सख्त सीमा तय की जाती है। वर्ष 2026 के चुनावी चक्र के लिए लागू नियमों के अनुसार, प्रथम चरण के प्रचार के दौरान राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी अधिकतम 88.9 करोड़ ब्राजीलियाई रियाल ही खर्च कर सकता है। वहीं, अगर मुकाबला दूसरे चरण यानी रन-ऑफ वोटिंग तक खिंचता है, तो उम्मीदवार को लगभग 44.4 करोड़ ब्राजीलियाई रियाल का अतिरिक्त खर्च करने की अनुमति मिलती है। ऐसे माहौल में जब चुनाव प्रचार का आखिरी दौर चल रहा हो, तब प्रत्याशी द्वारा किया जाने वाला हर एक पाई का हिसाब बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि भारत के लंबे विदेशी दौरे को चुनाव आयोग या विपक्षी दल चुनावी गतिविधियों का हिस्सा मान लेते, तो इसका खर्च राष्ट्रपति के तय चुनावी बजट में जोड़ा जा सकता था। लूला दा सिल्वा ऐसे समय में अपने प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो बोल्सोनारो को कोई भी राजनीतिक हथियार नहीं देना चाहते थे और किसी भी तरह के नए कानूनी या वित्तीय विवाद से बचना चाहते थे।

सवाल-जवाब

ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग क्यों नहीं लिया?
ब्राजील में 4 अक्टूबर को राष्ट्रपति चुनाव का पहला चरण होना है। कड़े चुनावी मुकाबले और सरकारी खर्च से जुड़े सख्त कानूनों के कारण लूला ने स्वदेश में रहकर चुनाव प्रचार करने का निर्णय लिया।
नई दिल्ली सम्मेलन में ब्राजील का प्रतिनिधित्व किसने किया?
राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा की जगह ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा नई दिल्ली पहुंचे और ब्रिक्स बैठकों में ब्राजील का प्रतिनिधित्व किया।
2009 के पहले ब्रिक शिखर सम्मेलन में कौन-कौन से नेता शामिल थे?
साल 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में हुई पहली बैठक में भारत के मनमोहन सिंह, रूस के दिमित्रि मेदवेदेव, चीन के हू जिंताओ और ब्राजील के लूला दा सिल्वा शामिल थे।
ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्याशी के खर्च की सीमा क्या तय की गई है?
ब्राजील में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रथम चरण में लगभग 88.9 करोड़ रियाल और दूसरे चरण में अतिरिक्त 44.4 करोड़ रियाल तक खर्च कर सकते हैं।
लूला दा सिल्वा को राष्ट्रपति चुनाव में किससे मुख्य चुनौती मिल रही है?
लूला दा सिल्वा का मुकाबला ब्राजील के दक्षिणपंथी सीनेटर फ्लावियो बोल्सोनारो से है, जो उन्हें कड़ी चुनावी टक्कर दे रहे हैं।
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