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नूंह अधिवेशन में मौलाना महमूद मदनी का बड़ा बयान, कहा देश में मुसलमान किरायेदार नहीं बराबर के हिस्सेदार हैंहरियाणा
31 अक्तू॰ 2026, 3:28 pm (6 दिन पहले)· 2

नूंह अधिवेशन में मौलाना महमूद मदनी का बड़ा बयान, कहा देश में मुसलमान किरायेदार नहीं बराबर के हिस्सेदार हैं

हरियाणा के नूंह में जमीयत उलमा-ए-हिंद के सम्मेलन में मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि मुसलमान इस देश के किरायेदार नहीं बल्कि बराबर के हिस्सेदार हैं और आजादी के लिए उनके बुजुर्गों ने कुर्बानियां दी हैं।

हरियाणा राज्य के नूंह, मेवात इलाके में आयोजित जमीयत उलमा-ए-हिंद की मजलिस-ए-मुन्तजिमा के सम्मेलन के दूसरे दिन राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने देश के मौजूदा हालात पर अपनी बात रखी। सम्मेलन के मंच से बोलते हुए उन्होंने देश के लोकतांत्रिक ढांचे, संविधान की मूल भावना और सामाजिक समरसता को लेकर कई अहम सवाल खड़े किए। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि देश का मुस्लिम समाज किसी की मेहरबानी पर यहां नहीं रह रहा है, बल्कि इस मुल्क की तरक्की और आजादी में उनकी पीढ़ियों का खून-पसीना शामिल है।

संवैधानिक अधिकारों और कानून के शासन पर चिंता

सम्मेलन में उपस्थित प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि मौजूदा समय बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। देश की लोकतांत्रिक भावना को कमजोर करने और संविधान की मूल आत्मा को नुकसान पहुंचाने के लगातार प्रयास देखे जा रहे हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि समाज में ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है जिससे दलितों, अल्पसंख्यकों और मुसलमानों के संवैधानिक अधिकारों पर संकट खड़ा हो गया है। उनके मुताबिक इस समय देश में कानून का शासन और न्याय की पूरी व्यवस्था बेहद दबाव में नजर आ रही है, जिसे दुरुस्त करना पूरे मुल्क के हित में जरूरी है।

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1947 का ऐतिहासिक फैसला और साझा विरासत

मेवात के ऐतिहासिक महत्व का जिक्र करते हुए महमूद मदनी ने कहा कि इस धरती से पूरे देशवासियों को यह संदेश जाता है कि हमारा नाता सीधे इस सरजमीं से जुड़ा हुआ है। साल 1947 के बंटवारे के नाजुक मोड़ पर भारतीय मुसलमानों ने दो राष्ट्रों के सिद्धांत को सिरे से खारिज किया था और इसी सरजमीं को अपना वतन चुना था। उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई में दी गई कुर्बानियों की गवाही यहां की मिट्टी देती है। स्वतंत्रता संग्राम में अपने पूर्वजों के सर्वस्व न्योछावर करने का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जो ताकतें नागरिकों को दोयम दर्जे का बनाने की कोशिश में लगी हैं, वे असल में संविधान, लोकतंत्र और स्वतंत्रता की मूल भावना के खिलाफ काम कर रही हैं।

किरायेदार नहीं बल्कि इस मुल्क के हिस्सेदार

मौलाना महमूद मदनी ने अपने भाषण में जोर देकर कहा कि आज अल्पसंख्यकों और हाशिए पर खड़े वर्गों के सामने वैचारिक और संवैधानिक संकट खड़ा कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि कुछ ताकतें ऐसी साजिशें रच रही हैं जिससे मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक समझा जाने लगे। इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए उन्होंने साफ किया कि मुसलमान इस मुल्क के किरायेदार नहीं हैं बल्कि पूरी तरह बराबर के हिस्सेदार हैं। देश में उनकी मौजूदगी किसी राजनीतिक दल के एहसान का नतीजा नहीं है, बल्कि बुजुर्गों के अनगिनत बलिदानों की बुनियाद पर टिकी है।

बुलडोजर कार्रवाई और राजनीतिक विमर्श पर सवाल

प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर बोलते हुए मौलाना महमूद मदनी ने बुलडोजर की कार्रवाई को न्याय के तौर पर पेश किए जाने की प्रवृत्ति पर गंभीर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि जब कोई बुलडोजर चलता है तो वह केवल ईंट, गारे या सीमेंट के मकानों को नहीं गिराता, बल्कि वह न्याय व्यवस्था और कानून की मर्यादा पर प्रहार करता है। इसके साथ ही उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए गढ़े जा रहे बयानों पर चिंता जताते हुए कहा कि सौ करोड़ की बड़ी आबादी वाले बहुसंख्यक समाज के भीतर बेवजह असुरक्षा का काल्पनिक डर पैदा किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी राजनीति और वोटों के नफा-नुकसान को साधने के लिए इस प्रकार के विमर्श खड़े किए जा रहे हैं, जो देश की साझी विरासत के लिए चिंताजनक हैं।

सवाल-जवाब

जमीयत उलमा-ए-हिंद का यह अधिवेशन कहां और किस अवसर पर आयोजित हुआ?
यह सम्मेलन हरियाणा के नूंह, मेवात में जमीयत उलमा-ए-हिंद की मजलिस-ए-मुन्तजिमा के दो दिवसीय अधिवेशन के तहत आयोजित हुआ।
मौलाना महमूद मदनी ने देश में मुसलमानों की स्थिति को लेकर क्या कहा?
उन्होंने कहा कि मुसलमान इस देश के किरायेदार नहीं बल्कि बराबर के हिस्सेदार हैं और उनकी मौजूदगी किसी राजनीतिक पार्टी के एहसान पर निर्भर नहीं है।
महमूद मदनी ने 1947 के बंटवारे के संदर्भ में क्या ऐतिहासिक बात रखी?
उन्होंने कहा कि 1947 में भारतीय मुसलमानों ने दो राष्ट्रों के सिद्धांत को ठुकराकर इस धरती को अपना वतन चुना और आजादी के लिए अपने बुजुर्गों का खून-पसीना बहाया।
बुलडोजर कार्रवाई को लेकर मौलाना मदनी ने क्या आपत्ति जताई?
उन्होंने कहा कि बुलडोजर केवल सीमेंट या गारे के मकानों पर नहीं चलता, बल्कि वह सीधे न्याय व्यवस्था और कानून के शासन पर प्रहार करता है।
मौलाना मदनी ने बहुसंख्यक समाज से जुड़े किस विमर्श पर सवाल उठाया?
उन्होंने कहा कि चुनावी लाभ और वोटों के लिए 100 करोड़ की बहुसंख्यक आबादी को अचानक काल्पनिक खतरे में दिखाकर असुरक्षा का माहौल बनाया जा रहा है।
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टिप्पणियाँ 5

Sophie Laurent@sophie-laurent·5 दिन पहले

मदनी साहब की ये बात तो सही है कि आज़ादी में सबका योगदान है, लेकिन क्या ज़मीनी स्तर पर ऐसा माहौल बनाने के लिए सरकार या समाज कोई ठोस कदम उठाएगा?

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

बंटवारे के वक्त का वो फैसला आज भी हमारे इतिहास की सबसे मजबूत नींव है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

रविकेश जी, बात तो सही है आपकी, लेकिन आज के हालात में क्या ये पुरानी बातें किसी को याद भी हैं?

Rohan Verma@rohan-verma·5 दिन पहले

मुद्दों पर खुलकर बात होना सही है, पर ज़मीनी हक़ीक़त और आपसी भरोसे की बात भी होनी चाहिए। महज़ भाषणों से हालात नहीं बदलते, दोनों तरफ़ से पहल की ज़रूरत है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 दिन पहले

रोहन भाई, भाषण तो ठीक हैं पर अदालतें और पुलिस जब तक ज़मीन पर निष्पक्ष नहीं दिखेंगी, तब तक माहौल में डर बना रहेगा।

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