पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद के नाम पर नई इबादतगाह तैयार करने की सियासी बयानबाजी पर अब मुस्लिम धर्मगुरुओं ने कड़ा रुख अपनाया है। मौलाना साजिद रशीदी ने इस पूरे मामले में हुमायूं कबीर की योजना पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जब अदालत के फैसले के बाद सरकार की तरफ से अयोध्या में मस्जिद के लिए बाकायदा जमीन आवंटित की जा चुकी है, तो फिर पश्चिम बंगाल में इस तरह का निर्माण कराने का क्या औचित्य है। मौलाना ने हुमायूं कबीर को सीधे अयोध्या चलने की पेशकश करते हुए भरोसा दिलाया कि वह खुद उनके साथ चलकर वहां मस्जिद की बुनियाद रखने में साथ खड़े होंगे।
अयोध्या में आवंटित जमीन के उपयोग पर जोर
पश्चिम बंगाल की धरती पर बाबरी मस्जिद बनाने को लेकर पैदा हुए ताजा विवाद पर अपनी राय जाहिर करते हुए मौलाना साजिद रशीदी ने पूछा कि बंगाल में इस नाम से मस्जिद खड़ी करने की आखिर क्या मजबूरी है। रशीदी ने स्पष्ट किया कि हुमायूं कबीर को अदालत के निर्देशानुसार अयोध्या में सरकार द्वारा दी गई निर्धारित जगह का ही इस्तेमाल करना चाहिए। उनका कहना था कि हुमायूं कबीर वहां पहुंचकर निर्माण कार्य की शुरुआत करें। साजिद रशीदी ने साथ देने का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि वह खुद उनके साथ उस निर्धारित स्थल तक जाने के लिए तैयार हैं और वहां मस्जिद की नींव रखने में भी उनका पूरा साथ देंगे। उनके अनुसार तयशुदा जमीन का उपयोग करना ही सबसे सही कदम है और बेवजह के विवादों को हवा देने से हर किसी को बचना चाहिए।
6 दिसंबर को राष्ट्रीय राजमार्ग जाम करने की योजना का विरोध
पश्चिम बंगाल के भीतर 6 दिसंबर की तारीख को एनएच-34 जाम करने की दी गई चेतावनी पर भी मौलाना साजिद रशीदी ने अपनी असहमति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि मस्जिद के निर्माण के लिए जब पहले से जमीन तय की जा चुकी है, तो उसी पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। मौलाना ने इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया कि इस संवेदनशील विषय को लेकर समाज में किसी भी तरह का तनाव या विवाद आगे नहीं बढ़ना चाहिए और न ही आम जनजीवन को प्रभावित करने वाले प्रदर्शन किए जाने चाहिए।
प्रयागराज की घटना और यूजीसी कानून पर कड़ी आपत्ति
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में यूजीसी कानून से जुड़ा सवाल पूछने वाले एक युवक पर हाथ उठाने की घटना पर मौलाना रशीदी ने गहरी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने सार्वजनिक मंच से सवाल पूछने वाले नौजवान को थप्पड़ मारे जाने को सीधे तौर पर तानाशाही करार दिया। रशीदी का कहना था कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत हर नागरिक को हुकूमत से सवाल करने और अपनी असहमति दर्ज कराने का पूरा संवैधानिक अधिकार हासिल है। सिर्फ अपनी बात रखने या सवाल उठाने पर किसी नागरिक के खिलाफ हिंसा पर उतर आना पूरी तरह अनुचित है। उन्होंने इस वाकये में संलिप्त लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग उठाई। इसी के साथ उन्होंने राजनीतिक विश्लेषण जोड़ते हुए कहा कि यूजीसी कानून के प्रभाव से भाजपा और सवर्ण हिंदुओं के बीच दूरी बढ़ती दिखाई दे रही है।
आजम खान की कानूनी लड़ाई पर समाजवादी पार्टी को घेरा
आजम खान को अदालत से जमानत मिलने के तुरंत बाद ईडी द्वारा की गई गिरफ्तारी के मसले पर भी मौलाना साजिद रशीदी ने तीखे सवाल दागे। उन्होंने समाजवादी पार्टी पर आरोप मढ़ा कि पार्टी ने आजम खान से जुड़े कानूनी मामलों को जरूरी गंभीरता के साथ नहीं लड़ा। रशीदी ने अखिलेश यादव के नेतृत्व की भूमिका पर भी उंगली उठाई और कहा कि उन्हें ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि सपा का शीर्ष नेतृत्व आजम खान को राहत दिलाने या रिहा कराने के लिए पर्याप्त मेहनत कर रहा है। मौलाना ने सरकार के सामने मांग रखी कि आजम खान को फौरन रिहा किया जाए और उन पर दर्ज सभी कानूनी मुकदमे वापस लिए जाएं। उन्होंने कहा कि आजम खान एक कद्दावर नेता हैं और यदि उनकी यूनिवर्सिटी के कामकाज में किसी तरह की खामी या गड़बड़ी पाई गई है, तो उस मसले को आमने-सामने बैठकर बातचीत के जरिए आसानी से सुलझाया जा सकता है।


















